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कश्मीर में बन सकती है लाइन ऑफ पीस.. मार्क टुली

फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स का दिल्ली में सत्ता के गलियारों में खासा दबदबा रहता है, राजधानी के ड्रॉइंग रूम्स में उनकी एक अहमियत होती है। मगर बीबीसी के मार्क टुली के साथ वह बात नहीं रही। धीरे- धीरे अपने काम की वजह से उन्होंने भारतीयों के मन में जगह बनाई। कलकत्ता में जन्मे और फिर स्कूलिंग के बाद यहीं बस गए सर मार्क टुली के लिए भारतीय आजादी के 60 सालों का अपना ही मतलब है। 1985 में ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर और फिर 1992 में उन्हें भारत सरकार ने पदम श्री और 2005 में पद्म भूषण से नवाजा। इन 60 सालों में देश कहां से कहां जा पहुंचा और इसे अभी कहां जाना है, इस पर मार्क टुली से बात की भास्कर ने। आइए जानते हैं कि कया कहते हैं मार्क टुली..

इस आधी सदी से ज्यादा की यात्रा को आप किस तरह देखते हैं और क्या महसूस करते हैं? भारत के साथ सबसे अच्छी और अहम बात यह है कि यह 60 साल पहले लोकतंत्र बना, अभी तक है और आगे भी लोकतांत्रिक ही रहेगा। जबकि चीन को देखिए। भारत का मूल स्वभाव ही लोकतंत्र है और इस व्यवस्था को कोई खतरा मुझे नहीं दिखता। दूसरी ओर भारत ने तेजी से आर्थिक प्रगति की है पर गरीबी.. उसे नहीं हरा सका। 60 साल में अपनी आबादी को नियंत्रित नहीं कर पाया। लोगों को इस बारे में सोचना पड़ेगा। क्योंकि गरीबी है, इसलिए आबादी बढ़ती जाती है। भारत की मूल समस्या है गरीबी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऑक्सफोर्ड में कुछ दिन पहले कहा था कि जब ब्रिटेन ने भारत को छोड़ा तो वह दुनिया में सबसे गरीब था लेकिन अब वह ग्लोबल इकोनॉमिक पावर बनने जा रहा है। लेकिन मेरी नजर में अभी भी गरीबी बाकी है।

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत कहां खड़ा है? क्या उसे दुनिया की बड़ी ताकतों में शुमार किया जाएगा? मेरी नजर में यह एक बड़ी कमी है इस देश के लोगों में कि वे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के बारे में बहुत सोचते हैं। अरे, पहले तो यह सोचना चाहिए कि भारत अपनी अंदरूनी मुश्किलों से कैसे लड़े। आप ही बताएं कि एक रिक्शापुलर को क्या इस बात की परवाह है कि भारत की दुनिया भर में क्या छवि है? है भी या नहीं। सिक्योरिटी काउंसिल में भी अगर भारत जगह पा लेता है, तो यह सवाल बना रहेगा कि क्या इस देश के अंदर सबकुछ शांत है, लोग आराम से रह रहे हैं। भारत को इंटरनेशनल रिकॉज्नीशन से ज्यादा अंदर पनप रही समस्याओं को पहले दूर करना चाहिए।

भारत की 60 वर्षीय मुश्किलें कौन सी हैं जो इस देश की रफ्तार को रोकती हैं? सबसे बड़ी मुश्किल है यहां का एडमिनिस्ट्रेशन जो 1947 में जैसा था, कमोबेश वैसा ही आज तक चल रहा है। ब्रिटिश राज भी इस देश के आम आदमी के बारे में नहीं सोचता था, यह भी नहीं सोचता। दूसरी बात विकास ऊपर से होता है यह ठीक है लेकिन विकास नीचे से भी आना चाहिए।

कुछ लोगों को लगता है कि एक दिन क्रांति आएगी और सबकुछ बदल जाएगा। क्या लगता है आपको? भारत बहुत बड़ा देश है। यहां अलग— अलग भाषा, संस्कृति के लोग रहते हैं। इस वजह से इन्हें किसी एक आइडियोलॉजी से नहीं बांधा जा सकता। और इसीलिए इन पर कोई डिक्टेटर नहीं बैठकर रूल नहीं कर सकता। दूसरी बात, इमरजेंसी के वक्त इस बात का खतरा था कि कहीं डिक्टेटरशिप न पैदा हो जाए, लेकिन वह खतरा भी टल गया। यहां की फौज काफी अनुशासित है, वह कभी राजनीति में दखलंदाजी नहीं करती, नहीं करेगी। इसलिए इसका खतरा भी नहीं है। नक्सलिज्म देश की एकता के लिए खतरा नहीं है। इसे संभालने में दिक्कत इसलिए आ रही है क्योंकि यहां की पुलिस अभी तक ब्रिटिश परंपराओं पर चल रही है।

60 साल से हम अपनी सीमाओं को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। क्या आने वाले समय में भारत की सीमाओं में कुछ बदलाव हो सकता है? कश्मीर में कुछ बदलाव हो सकता है। लाइन ऑफ पीस बन सकती है। भारत के पड़ोसी उससे दोस्ती रखना चाहते हैं लेकिन भारत से डरते भी हैं। और इसके लिए भारत ही दोषी भी है। इस देश को ही दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए।

देश के सीमा विवादों को लेकर आपका क्या कहना है? क्या इनके पीछे कोई एक व्यक्ति ही है? क्या नेहरू? यह सिर्फ जवाहरलाल नेहरू का कुसूर नहीं कि भारत को अपनी सीमाओं पर आज भी विवादों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें ब्रिटिश राज और इंदिरा जी का भी कुसूर है। ये सभी समय रहते हल हो सकते थे। हो सकता है कि दिल्ली की कुछ मजबूरियां रही हों। दिक्कत यह है कि भारत दोस्ती का रिश्ता कायम नहीं कर पाया।

60 बरस के आजाद भारत को लेकर आपके मन में सबसे पहले कौन सी छवियां उभरती हैं? पहला इमरजेंसी के बाद चुनाव और इंदिरा की वापसी। दूसरा अयोध्या में मस्जिद का गिरना जब लोगों ने कहा कि इस देश से सेक्यूलरिज्म खत्म हो गया है। तीसरी छवि दिमाग में आती है 10 साल पहले पूर्वाचल के एक गांव में एक दलित से मुलाकात की। इस दलित ने मुझे एक गीत सुनाया था जिसके भाव थे कि देश को आजाद हुए 50 साल हो गए हैं, पर मुझे आजादी नहीं मिली।

ब्रिटेन भारत को कैसे देखता है अब? पहले ब्रिटेन ने देश को आजाद करते वक्त काफी निराशा महसूस की थी और ब्रिटेन के कई बड़े नेताओं ने कहा था कि भारत से उन्हें कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन आज, आज ब्रिटेन भारत को काफी आदर से देखता है। नए ब्रिटिश प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कहा भी है कि ब्रिटेन को अपनी विदेश नीति को बनाते वक्त भारत के बारे में खासतौर पर सोचना चाहिए।

सर मार्क टुली 24 अक्टूबर 1935 को कलकत्ता में जन्मे मार्क टुली नई दिल्ली में 22 साल तक बीबीसी वल्र्ड सर्विस के कॉरेस्पॉन्डेंट रहे हैं। इंग्लैंड में पढ़े लिखे मार्क ने पूरे दक्षिण एशिया का दौरा किया है। 1985 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने उनके काम के लिए ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से नवाजा। 1992 में भारत सरकार की ओर से उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 2002 में उन्हें ब्रिटेन ने नाइटहुड का सम्मान दिया और इसके बाद वह सर मार्क टुली बन गए। 2005 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया।

कोलकाता में ब्रिटिश जिलेंडर कॉपरेरेशन के एक संपन्न एकाउंटेंट के बेटे मार्क का लालनपालन काफी कड़े अनुशासनों के तहत हुआ। 10 साल की उम्र तक उन्होंने ब्रिटेन नहीं देखा था। बाद में उन्होंने कहीं लिखा था कि ब्रिटेन उन्हें बड़ा अजीब सा लगता था जहां भारत जैसा साफ-सुथरा खुला आकाश नहीं था। उन्होंने ब्रिटेन में मार्लबरो कॉलेज और ट्रिनिटी हॉल, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में इतिहास और धर्म की पढ़ाई की। इसके बाद वह चर्च ऑफ इंग्लैंड में पादरी हो गए। लिंकन थियोलॉजिकल कॉलेज में दो टर्म की पढ़ाई के बाद ही उन्होंने इसे छोड़ दिया। 1964 में बीबीसी ने उन्हें भारत में अपना संवाददाता नियुक्त किया। इसके बाद उन्होंने भारत पाकिस्तान युद्ध से लेकर कोलकाता में भिखारियों की जिंदगी और फिर भोपाल गैस त्रासदी और ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद अयोध्या में मस्जिद विध्वंस जैसी बड़ी घटनाएं कवर कीं। उन्हें अपने काम के दौरान काफी जनाक्रोश का सामना करना पड़ा। 1997 में उन्होंने बीबीसी छोड़ दिया। हिंदू विचारधारा को लेकर भी उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। फिलहाल वह निजामुद्दीन दिल्ली में अपनी गर्लफ्रैंड जिलियन राइट के साथ रहते हैं।





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