इंदौर.बैंकों द्वारा क्रेडिट कार्ड दिए जाने के समय किए गए वादे इतने लुभावने होते हैं कि लेने वाले बाद में मिलने वाली गालियों का अंदाजा नहीं लगा सकते। कई बार तो बिना किसी फीस के कार्ड देने की बात होती है फिर भी कार्ड बनने के बाद फीस वसूली जाती है।
निजी बैंकें क्रेडिट कार्ड देने के बाद वसूली का काम एजेंसी के माध्यम से करवाती हैं। ये एजेंसियां लोगों से पैसे वसूलने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाती हैं जिनमें किसी भी तरह से कानून का पालन नहीं किया जाता है। घर जाकर सामान उठाना भी इनका एक तरीका है जिससे मध्यमवर्गीय लोग डर के कारण कुछ रुपए देकर इन मुसीबतों से छूटना चाहते हैं फिर चाहे उसका खर्च किया हो या नहीं।
एजेंसी के माध्यम से वसूली करने वाले एजेंट ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कई बातों का खुलासा किया, जिसमें किसी के घर वसूली के लिए जाने के पहले संबंधित थाने में सूचना देना होती है जो नहीं दी जाती। सालों से यह काम करने पर यह बात सबसे ज्यादा सामने आती है कि लोगों को सही समय पर बिल नहीं मिलता और लेट फीस के साथ दूसरे चार्ज भी लग जाते हैं जो कस्टमर के मना करने के बाद भी उसके स्टेटमेंट में लगातार आते हैं और उस पर ब्याज लगता रहता है और राशि बढ़ती रहती है। जब सेटलमेंट की बात होती है तो सारा इंटरेस्ट कम कर दिया जाता है। हमें एक-दो बार फोन पर धमकाना होता है फिर जहां व्यक्ति रहता है या काम करता है वहां जाकर उसे बेइज्जात करना होता है। इससे डरकर ही 90 फीसदी लोग पैसे दे देते हैं और बाकी से दूसरे तरीकों से निपट लेते हैं।
च्सबसे पहली गलती बैंक की होती है जिसमें रिजर्व बैंक की गाइड लाइन के अनुसार बिना किसी भी डयू के उपभोक्ता को फोन कर परेशान नहीं किया जा सकता। मानव उपभोक्ता संघ रक्षक समिति के प्रदेश अध्यक्ष पंडित ज्ञानप्रकाश शर्मा ने कहा बैंकों के वसूली के लिए एक सुनिश्चित सिस्टम है जिसे आजकल बैंक नहीं मानती और उपभोक्ता को भी नहीं पता होता है। निजी बैंकों के लिए डीवेट रिकवरी ट्रिब्यूनल है जिसकी ब्रांच देश के हर शहर में है। यहां पहले दोनों पक्षों से बात कर उन्हें आपस में ही सेटलमेंट करने के लिए कहा जाता है लेकिन वह भी फेल होने की स्थिति में डिफाल्टर की प्रॉपर्टी सिज करने के आदेश दिए जाते हैं। इसकी प्रक्रिया लगभग दो साल की होती है।