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बड़ी जंजीर है पैसे का असमान वितरण : इरफान हबीब

जाने माने इतिहासकार इरफान हबीब की विशेषज्ञता मध्यकालीन इतिहास पर है, पर अगर उनकी नजर को अनदेखा किया जाता है तो कई मायनों में आजादी के बाद के 60 सालों को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि आजादी के बाद हमने सबसे बड़ी राष्ट्रीय शर्म का सामना किया- गांधी जी की हत्या और इसके बाद भी फेहरिस्त खत्म नहीं हुई है। लेकिन अच्छी बातें भी हैं इस 60 साल के सफर में और हमारे ख्वाब अभी अधूरे हैं। इन्हें पूरा होना है। इरफान हबीब पहले अकादमिक तौर पर सक्रिय थे, तो अब इतिहास की जरूरत के लिए सक्रिय हैं। आजादी के बाद 60 साल कैसे गुजरे हैं और कितनी उम्मीदें हमारी आने वाली पीढ़ियां लगा सकती हैं, ऐसे कुछ सवालों को लेकर भास्कर ने उनसे बात की.. 1947 में जब हम ब्रिटेन के पंजों से आजाद हुए, तो हमारी पहचान एक देश की थी या एक टूटी फूटी कम्यूनिटी की? देश की पहचान तो हमारी काफी समय से रही थी। विभाजन से पहले भी हम देश ही थे। और जाति, समुदाय का जहां तक सवाल है, तो इतने बड़े देश में इस तरह के विभाजन तो थे, लेकिन उनसे भारत की देश के रूप में पहचान से कोई खतरा नहीं था। 1947 तो वह साल है, जिसमें हमारा वह ख्वाब पूरा हुआ, जिसके पूरा होने का तमन्ना हम बरसों से पाले थे।

1947 से 2007 के बीच हम कितना बढ़े हैं और कहां हम पीछे हटे हैं? यूं जब किसी सफर की बात होती है, तो कहा जाता है कि अभी हम वहां नहीं पहुंचे, जहां जाना है। लेकिन सही मायने में तो हमारे पास अब जो है, वह कभी नहीं था। अंग्रेजों के दौर को देखें, तो गरीबी बेहद थी, प्रति व्यक्ति आय काफी कम थी, सरकार कोई जिम्मेदारी नहीं लेती थी। साम्राज्यवाद के दबाव थे। हमारा सामाजिक ढांचा भी उसी तरह का था, जो हर नई चीज का विरोध करता था। आज हम ऐतिहासिक तौर पर एक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मुसलमानों और दलितों की हालत तब बदतर थी और आज..। आज हम उस प्वाइंट को काफी पीछे छोड़ आए हैं। हां, इस रफ्तार में इजाफा होना चाहिए था, जो नहीं हो सका है।

60 साल में हमने ऐसी कौन सी चीजें पैदा की हैं, जो खुद हमारे ही पैरों की जंजीरें बन गई हैं? मेरी नजर में तो सबसे बड़ी जंजीर है संपत्ति का असमान वितरण। किसी के पास जरूरत से ज्यादा है तो कोई फाके कर रहा है। दूसरे नंबर पर जो हमारे विकास में बाधा है, वह है जाति, संप्रदाय के आधार पर भेदभाव। और इसके बाद तो आलोचना करने के लिए ढेरों चीजें हैं, मसलन करप्शन।

इस 60 साल के सफर में क्या ऐसी घटनाएं और बिंदु देखते हैं, जिन्होंने देश की दिशा को बदलकर रख दिया? सबसे पहला टर्निग प्वाइंट तो था पंडित नेहरू की दूसरी पंचवर्षीय योजना। यह तब भी काफी बड़ी चीज थी और आज भी उसमें देश की आर्थिक प्रगति की जड़ों को खोजा जा सकता है। इसके बाद पब्लिक सेक्टर खड़ा हुआ, इंजीनियरिंग और एजूकेशनल इंस्टीट्यूशन बने। जो कहते हैं कि पब्लिक सेक्टर बेकार की चीज है, उन्हें समझना चाहिए कि इन्फ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने में इसी योजना का हाथ था। 1947 के बाद के इंडस्ट्रियलाइजेशन के पीछे भी नेहरू की ही सोच थी। और दूसरा अहम टर्निग प्वाइंट थी नॉन अलाइनमेंट की पॉलिसी। 1953 से 1955 के बीच जाकर यह तय हुआ कि दुनिया के साथ हमारे रिश्ते क्या होंगे और कैसे होंगे।

60 सालों में हमने अपने पड़ोसियों से चार युद्ध लड़े हैं और तकरीबन हर सीमा पर हमारा कोई न कोई विवाद चल रहा है। क्या यह देश के भविष्य के लिए कोई चुनौती या खतरा तो नहीं खड़ा करते? देखिए, चीन से हमारी लड़ाई काफी दुर्भाग्यपूर्ण थी और नहीं होनी चाहिए थी। चूंकि हमने समझ लिया है कि यह जमीन हमारी है और हम ठीक हैं। उसी तरह चीन ने भी किया। जिस जमीन के लिए हम लड़े उस पर दोनों का ही कोई कब्जा ठीक ठीक नहीं है। लेकिन दोनों ही अपने अपने पक्ष को मजबूत मानते हुए लड़े।

और कश्मीर? कश्मीर की समस्या जरूर है, लेकिन इसका कोई फौरी हल तो नहीं दिखता। हालांकि इसके लिए भी भारत को ही पहल करनी होगी और कोशिश करके इस समस्या के किसी सर्वमान्य हल तक पहुंचना होगा।

आजादी के बाद की लीडरशिप ने काफी निराश किया है इस देश की जनता को? यह तो होना ही था। यह उम्मीद ही बेमानी थी कि आजादी तक हमें लेकर आई लीडरशिप की तरह बाद के नेताओं से उसी कैलीबर की उम्मीद रखी जाती। तब जज्बा था, वजह थी और परिस्थितियों की डिमांड थी कि वो लोग वैसे हों। हां, यह डैमोक्रेटिक लीडरशिप का फर्ज है कि उस जज्बे को बनाए रखा जाए और उसी कैलीबर की लीडरशिप पैदा की जाए। इसके लिए वोटर का फर्ज ज्यादा बनता है। कल्चरल धाराओं की जिम्मेदारी है कि वे रास्ता दिखाती रहें।

आजादी के बाद ऐसी कौन सी यादें हैं आपके मन में, जो मिटाए नहीं मिटतीं? गांधी की भूख हड़ताल और फिर शहादत। तब मैं स्टूडेंट ही था और यह बात मेरी याद से कभी नहीं मिट सकती कि एक व्यक्ति जो पूरी तरह कम्यूनल हो चुकी मेनस्ट्रीम के खिलाफ खड़ा हुआ और उसका पुरजोर विरोध किया। शायद यह गांधी ही कर सकते थे। जब सब लोग गलत बात के पक्ष में थे, फिर भी उन्होंने वही किया, जो उन्हें ठीक लगा। देश की शर्मिदगी के लिए भी इससे बड़ी कोई बात नहीं हो सकती। और इस वारदात के बाद तो कई ऐसे मुकाम आए हैं, जिन्होंने इस राष्ट्रीय शर्म में बढ़ोत्तरी की है.. ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार, बाबरी मस्जिद गिरना। हालांकि मुझे यकीन है कि हिंदुस्तान के लोगों ने अच्छे फैसले लिए हैं और अगले 10 साल में हालात बेहतर होंगे।

इरफान हबीब

एक मशहूर इतिहासकार और स्वतंत्रता सेनानी मो. हबीब के बेटे और महात्मा गांधी के करीबी रहे अब्बास तैयबजी के पोते इरफान हबीब ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी एमए पूरी की और इसके बाद ऑक्सफोर्ड से डीफिल। 1969 से 1994 तक वे यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, चेयरमैन ऑफ सेंटर ऑफ एडवांस स्टडी रहे। प्राचीन भारत के ऐतिहासिक भूगोल, भारतीय टैक्नोलॉजी का इतिहास, मध्यकालीन प्रशासनिक और आर्थिक इतिहास और साम्राज्यवाद जैसे विषयों पर उनकी विशेषज्ञता रही है। वह खुद को मार्क्‍सवादी मानते हैं। 1968 में जवाहरलाल नेहरू फैलो बनने वालों में वे पहले लोगों में थे। 1982 में उन्हें अमेरिकन हिस्टोरिकल एसोसिएशन की ओर से वाटुमुल प्राइज मिला। 2005 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया। 2006 में उन्हें मुजफ्फर अहमद मैमोरियल प्राइज मिला। अग्रेरियन सिस्टम ऑफ मुगल इंडिया और एटलस ऑफ मुगल एम्पायर उनकी बेहद मशहूर किताबें हैं। पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ इंडिया के पांच वॉल्यूम उन्होंने लिखे हैं। दुनिया भर में उनके रिसर्च पेपर्स छप चुके हैं। इतिहासकार अमिय कुमार बागजी के शब्दों में 12वीं से 18वीं सदी के इतिहास लेखन में इरफान हबीब जरूरी नाम है।





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