Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood जयप्रकाश चौकसे :
सलमान ने हाल में एक महंगी हाथ घड़ी अपने पिता सलीम खान को भेंट की। महंगी घड़ियों का शौक नहीं होने के बावजूद सलीम साहब ने इस भेंट को स्वीकार कर लिया, क्योंकि वे जानते थे कि विगत कुछ दिनों से सलमान इस घड़ी को किसी को गिफ्ट करने को बेताब हैं। समय और कुंडली की कद्र करने वाले सलीम साहब हीरे जड़ित अपनी घड़ी को अनावश्यक मानते हैं। सलमान के सभी दोस्त उनकी बेकरारी से वाकिफ हैं, लेकिन उनमें इस तरह की बेकरारी और बेचैनी कहां से जन्म लेती है?
कर्ण से बड़ा दानी कोई नहीं हुआ। उसने तो अपनी रक्षा के लिए मिले कवच-कुंडल भी दान कर दिए थे। कर्ण पांडव होते हुए भी कौरवों द्वारा सम्मानित हुआ और उन्हीं के पक्ष में लड़ता हुआ मारा गया। उसने मित्रता की कीमत चुकाई। वह उस कालखंड के महानायक कृष्ण की महिमा और महत्व से परिचित था, परंतु उपेक्षित जीवन में उदारता की पहली नजर का कर्ज चुकाना उसके लिए धर्म था, इसलिए उसने अपने भाइयों की ओर से सत्य के लिए लड़ने की बजाय कौरवों का साथ देना महत्वपूर्ण समझा। बहरहाल सलमान कर्ण नहीं हैं, परंतु वह अपने व्यक्तित्व में छिपे उस शैतान को जानते हैं, जिससे उनका निरंतर युद्ध चल रहा है।
अपने और पराए लोगों को भेंट देते रहना उसके बचाव कवच का एक हिस्सा है। वह जानते हैं कि कुछ न कुछ देते रहने से ही वे अपने भीतर छिपे शैतान को पराजित कर सकते हैं। गोया कि यह 'देते रहना' उनके लिए 'जागते रहो' जैसा नारा है। शैतान से जंग में रूह कहीं गाफिल न हो जाए, इसी प्रयास में वे लगे रहते हैं। कई लोग अपने भीतर जारी इसी तरह की लड़ाई में घिरे होने के बावजूद 'लेते रहने' के आदी हैं, क्योंकि उन्होंने संचय को ही सुरक्षा कवच समझ लिया है। दरअसल संचय मनुष्य को कमजोर करता है, उसके आत्मविश्वास को डिगा देता है।
सलमान अपने गुस्से से डरे रहते हैं। वे अपने प्रेम से भी भय खाते हैं, क्योंकि वह गुस्से और प्रेम दोनों में ही अपने अतिरेक से परिचित हैं। वे जानते हैं कि त्वचा में कैद उनका शरीर भीतर ही भीतर कैसे तड़पता रहता है। दुनिया में लोगों को मोटे तौर पर दो दलों में बांटा जा सकता है, एक लेने वाला और दूसरा देने वाला। मजे की बात यह है कि इन दोनों ही विपरीत क्रियाओं का संबंध सुरक्षा कवच से है। किसी को देते रहने में सुरक्षा महसूस होती है तो किसी को लेते रहने में। हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से भीतर छिपे शैतान से लड़ता है। मूल बात इसका उजागर होना नहीं है वरन खुद को खोजना है। इस कठिन यात्रा में लहूलुहान होने से शक्ति बढ़ती है और आप कमजोर नहीं होते।
सलमान का व्यक्तित्व दो विरोधाभासों से बना है, मन से दरवेश और तन से पहलवान। वे ऐसे शख्स हैं, जो एक तरफ दूसरों को गिफ्ट बांटते रहते हैं तो दूसरी तरफ भीतर के सफर में हासिल चीजों को छिपाते भी हैं। इस अनुभव और एहसास के मामले में दानी सलमान बहुत ही कंजूस हैं। वह अपनी निजता की रक्षा बड़े जतन से करते हैं। उजागर होने वाली कला, यानी अभिनय को उन्होंने चुन लिया है। यह उनका स्वाभाविक काम नहीं है, परंतु उन्होंने बयां न करने पर भी बयां हो जाने वाली शैली विकसित कर ली है और अवाम को भी यह बात रास आ गई है। वह शाहरुख और आमिर की तरह मैथड स्कूल के एक्टर नहीं हैं और न ही उनमें उनके जैसी दुनियादारी भरी है। वे स्थिर होते हुए भी गतिमान होने में उलझे रहते हैं। अभिनय भी उनके लिए अपने भीतर के शैतान को हराने का ही एक तरीका है, मानों वे कवच की सुरक्षा के लिए कवच से बाहर आने को बेताब हों। उनके जैसी शख्सियतों की भी कैसी-कैसी मजबूरियां होती हैं।
सलमान महानगर में रहते हुए भी कस्बाई सरलता को महसूस करते हैं। कमोवेश यही कस्बाई अनगढ़ता के कारण वे अवाम से भावनात्मक तादातम्य स्थापित कर लेते हैं। इसी कारण उनकी फिल्में मल्टीप्लेक्स के साथ छोटे शहरों में भी खूब लोकप्रिय होती हैं। शाहरुख और आमिर विदेशों में सलमान से ज्यादा लोकप्रिय हैं। सलमान की अभिनय शैली उनकी विचार प्रक्रिया से ही जन्मी है।