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जेहन से अंग्रेजियत की गुलामी मिटना जरूरी है : तबस्सुम

मुंबई:indiaat60हिंदू पिता और मुस्लिम पठान मां की बेटी तबस्सुम राष्ट्रीय एकता की मिसाल रही हैं। गुलाम हिंदुस्तान में जन्म लेने के बाद उन्होंने आजादी हासिल करने से लेकर आजादी के बाद गुजर 60 सालों को अपनी आंखों से देखा है। वे मानती हैं कि हमने तरक्की तो बहुत की है मगर फिर भी अभी देश में मशीनी नहीं रूहानी तरक्की की जरूरत है। वह बदलते हुए सांस्कृतिक माहौल से काफी तकलीफ महसूस करती हैं। उनका कहना है कि हम ब्रिटिश हुकूमत से भौतिक रूप से तो आजाद हो गए, मगर जहनी तौर पर अभी भी हम विदेशियों के ही गुलाम हैं। आजाद देश के 60 साल कैसे गुजर, इस बार में भास्कर ने उनसे बात की।

आजादी तो हमें मिल गई, पर क्या हमने उस रफ्तार से तरक्की की है, जिसकी हमें आजादी के वक्त उम्मीद रही थी?

मुझे तो लगता है कि हमने मशीनी तरक्की ही की है। हमार उसूल, हमारी परंपराएं और मूल्य तो कहीं खो ही गए हैं। हमने अंग्रेजों से लंबी लड़ाई लड़ी और आखिर वे हमें छोड़कर चले गए लेकिन जो विरासत वे हमें देकर गए थे वह हमने ज्यों की त्यों अपना ली। अपने देश की सांस्कृतिक परंपरा को भी भुला दिया। जहनी तौर पर हम आज भी उन्हीं के गुलाम हैं। लड़कियों ने पहला काम किया कपड़े उतारने का। बुजुर्गो की इज्‍जात छोड़ी। और पिछले कुछ सालों में तो यह सब इतनी तेजी से हुआ कि हम भूल ही गए कि हमार भी कुछ देशज संस्कार हैं, जिनके बिना हमारी दुनिया में क्या पहचान बाकी रहेगी। यह सब देखकर मुझे तो काफी तकलीफ होती है।

तो क्या होगा इसका अंजाम?

हिंदुस्तानी ने इस विदेशी संस्कृति को अपना तो लिया है पर वह विदेशी नहीं हो सकेगा। वह सोचता है कि उसे नई पहचान मिल जाएगी, ऐसा नहीं है। वह बीच में ही लटका हुआ है क्योंकि विदेशी उसे स्वीकार नहीं करगा और भारतीय उसे अपनाएगा नहीं। मैं ऐसी दो हीरोइन्स को जानती हूं जो विदेशी बन चुकी हैं, लेकिन क्या वे विदेशी बन पाईं? अब न तो वे भारतीय रह गई हैं और न ही उन्हें विदेशियों ने अपनाया ही है।

टेलीविजन की क्या भूमिका रही है इस पूर दौर में? क्या नेशनल इंटीग्रेशन में टीवी का कोई योगदान देखती हैं आप?

जब देश में टेलीविजन की शुरुआत हुई तो लोग काफी उत्साहित थे। देश के एक कोने से लेकर दूसर तक की खबरों ने लोगों को एक दूसर से जोड़ने में काफी मदद की। तब ऐसा लगता था कि पूरा हिंदुस्तान एक ड्राइंग रूम की तरह है और उसके लोग दर्शक। आज भी टीवी लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है।

मौजूदा टेलीविजन राष्ट्रीय लक्ष्यों से भटक गया है। कहां तक ठीक है?

बिल्कुल ठीक है। मेरा ख्याल है कि पहले जो प्रोग्राम्स थे हमारी वेल्यूज, हमारी आकांक्षाओं को लक्ष्य कर बनाए जाते थे। आज ढेरों चैनल्स हैं और ढेरों प्रोग्राम्स। कई गड़बड़ियां भी देखने को मिलती हैं। पहले एक मंथरा होती थी रामायण में। आज हर टीवी सीरियल में ढेरों मंथराएं नजर आती हैं, जो घरों की तोड़फोड़ में जुटी दिखती हैं। क्या यह यही राष्ट्रीय संदेश दे रही हैं कि घरों को तोड़ो, एक से दूसर को लड़ाओ।

आपने आजादी मिलने के ठीक बाद के सामाजिक ढांचे से लेकर मौजूदा सामाजिक बुनावट तक कई बदलाव देखे हैं? क्या खोया और क्या पाया है हमने?

मुझे एक बदलाव से काफी तकलीफ है। और वह है लिव इन रिलेशनशिप। सीता और राम को मानने वाले हिंदुस्तानी ऐसा सोच भी कैसे पाते हैं। कभी कभी तो मुझे इससे नॉजिया जैसी फीलिंग होने लगती है। मैं तो कहूंगी हमने चमक दमक तो खूब हासिल की है, पर इसके पीछे अपनी आध्यात्मिक उन्नति गंवा दी है।

आजाद भारत की कौन सी तस्वीरें हैं, जिन्होंने आप पर सबसे ज्यादा असर डाला है?

देश आजाद हो चुका था। हम उस दिन एक फिल्म देख रहे थे। तभी बाहर हड़बोंग की स्थिति पैदा हो गई। तब मैं बहुत छोटी थी। हल्की सी याद है कि कुछ लोग चिल्लाते हुए बाहर भागे। पता चला कि किसी ने गांधी जी को गोली मार दी है। यह याद आज तक मिटाए नहीं मिटती और मुझे लगता है कि किसी देश की याद से कैसे यह स्मृति मिट सकती है।

तबस्सुम: एक परिचय

छह दशकों से ज्यादा का समय देख चुकीं तबस्सुम गोविल फिल्म इंडस्ट्री की अकेली शख्सियत हैं जो पिछले तकरीबन 58 साल से लगातार मास मीडिया में सक्रिय हैं। TABUचार साल की उम्र में 1946 में उन्होंने फेमस पिक्चर्स की फिल्म नरगिस में अभिनय से कैरियर शुरू किया। 30 साल तक वह मुंबई दूरदर्शन पर सक्रिय रहीं। उनकी 8 किताबें छप चुकी हैं और एक हिंदी पत्रिका की वह संपादिका हैं। फिल्म, टीवी, रडियो, प्रिंट सभी विधाओं में उनका योगदान रहा है। 1972 से 1993 तक चले दूरदर्शन प्रोग्राम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन ने उन्हें मशहूर कर दिया।

भारत की शर्ले टैंपल के रूप में जानी जाने वाली तबस्सुम ने अपने फूल खिले हैं कार्यक्रम के दौरान करीब 750 फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यू किए। इसके बाद वे टैलीविजन की नंबर वन एंकर बन गईं। 1970 से 1985 के बीच तबस्सुम ने रडियो सीलोन पर चुटकुलों का एक नियमित शो भी किया। दो दशक पहले उन्होंने अपना खुद का स्टेज शो लॉन्च किया तबस्सुम हिट परड, जिसने देश ही नहीं विदेशों में भी ढेरों शो आयोजित किए हैं। पिछले कुछ सालों से वह हिंदी की एक पत्रिका गृहलक्ष्मी का संपादन भी करती रही हैं। दूरदर्शन के लिए उन्होंने जीना इसी का नाम है, हंसो मत जैसे प्रोग्राम्स बनाए हैं। वह अकेली ऐसी शख्सियत रही हैं जिनके बचपन से ही किए जा रहे फिल्मी अभिनय के कारण नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक उन्हें नाम से जानते रहे हैं। ढेरों पुरस्कार और सम्मान उनके नाम रहे हैं जिनमें से कुछ हैं कलाश्री अवार्ड (1990), महिला शिरोमणि अवार्ड (1992), मदर इंडिया इंटरनेशनल अवार्ड (1993), सहयोग फाउंडेशन अवार्ड (1998), महाराष्ट्र वैभव (1999), राजधानी कला रतन अवार्ड (1993), मंथन कला अकेडमी अवार्ड।

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