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क्रांति नहीं खुद को बदलने की जरूरत: कुणाल

kunal kapoorहमें हिंदुस्तानी होने पर गर्व है और खासकर हमारी पीढ़ी को क्योंकि हमें मालूम है कि हम एक प्रोग्रेसिव देश हैं। हम आगे बढ़ रहे हैं। रंग दे बसंती में आजादी तराने गाने वाले और बेहद सेक्युलर कवि असलम यानी कुणाल कपूर का कहना है कि हमें किसी क्रांति की जरूरत नहीं है। हमें खुद को अंदर से ही बदल डालने की जरूरत है और यही काम ऐसा है जो नहीं हो पा रहा। आजादी की थीम से युवाओं को जोड़ने वाली इस फिल्म को काफी सफलता मिली थी। आजादी के 60 साल बाद उनके लिए आजादी के क्या मायने हैं और कैसे देखते हैं वह अपने देश को, इन सवालों के साथ भास्कर ने कुणाल से बात की।

आपने रंग दे बसंती में एक युवा कवि का किरदार निभाया और अशफाक उल्लाह खान का भी। क्या खुद में वह अहसास आ पाया जो आपको लगता है जो आजादी के दीवानों में उन दिनों हुआ करते था?ये सभी आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारी बेहद सामान्य से इन्सान थे। सभी काफी कम उम्र के थे, शायद मुझसे भी कम उम्र के, जब उनमें राष्ट्रीय भावनाएं और देश के लिए मर मिटने की तमन्नाएं जाग उठी थीं। जब मैंने इस किरदार को निभाया तो सबसे बड़ा अहसास जो मुझे हुआ वह यह था कि उनमें नेशनलिस्टिक फीलिंग्स बेहद मजबूत थीं। किताबों में पढ़ने से इस बात का ज्यादा पता नहीं चलता, लेकिन जब खुद उसे अभिनय में उतारा तो पता चला कि यह कोई मामूली बात नहीं थी। और मेर लिए ही नहीं यह हम रंग दे बसंती की युवा टोली के लिए कुछ मुश्किल किरदार थे। उन लोगों का माइंड सेट वह नहीं था जो आज के लोगों का है। बेहद सामान्य होते हुए भी वे बिल्कुल दूसर ही इन्सान थे।

इन 60 सालों में हमने ऐसा क्या खो दिया है जो इन क्रांतिकारियों ने हमें सौंपा था? क्या इस अभिनय के दौरान आपको कुछ महसूस हुआ?हां, मैंने रियलाइज किया कि भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान, सुखदेव और राजगुरू बस इतना ही कह रहे थे कि हम देखें कि हम कहां खड़े हैं और अपने देश के लिए क्या कर रहे हैं। मुझे लगता है कि आज भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है कि हममें से जो भी जहां भी है, वह बस अपने स्तर पर जो कर रहा है उसे ईमानदारी से निभा दे, देश के लिए वही सबकुछ होगा। यह जरूरी नहीं है कि हम बहुत बड़े बड़े काम करके दिखाएं। बस जरा सी सर्विस अपने स्तर पर काफी है।

आपकी इस जैनरशन के हिसाब से सबसे अहम टर्निग प्वाइंट क्या रहे, जिन्हें इस देश को आगे बढ़ाने वाला कहा जा सकता है?मेर ख्याल से मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान देश में उदारीकरण की जो शुरुआत हुई, उसने देश की तस्वीर ही बदल दी है। इसके बाद हमने दुनिया भर के लिए अपनी खिड़कियां और दरवाजे खोलने शुरू किए और फिर जो शुरुआत हुई, तो आज यहां तक कहा जा रहा है कि अगले दस सालों में हम दुनिया भर के 3 प्रमुख औद्योगिक देशों में आ जाएंगे।

रंग दे बसंती की थीम ने इस देश के युवा को आजादी के कंसेप्ट से जोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन यह युवाओं को एक निराश अंत की ओर ले जाती है। अपने मूल स्वरूप में फिल्म फेल हो चुकी क्रांति है?

नहीं रंग दे बसंती में यह यूथ फेल नहीं हुआ था। यह सॉल्यूशन देती है कि हम चुप होकर न बैठ जाएं, हमें अब फिरंगियों के खिलाफ नहीं लड़ना है। हमारी लड़ाई बेशक खत्म हो गई, लेकिन महत्वपूर्ण तो वह प्रयास था, जिसकी वजह से वे 6 यूथ एक समाधान की तलाश कर रहे थे। मेर विचार में तो 60 साल पहले जो आजादी की लड़ाइयां लड़ी गईं उनमें भी ऐसे मुकाम हमार सामने आए जब हमें लगा कि सारी कोशिशें नाकाम हो गई हैं, लेकिन ऐसा नहीं था। सभी प्रयासों का महत्व था।

वास्तव में दिक्कतें और उनके हल हममें ही हैं। यह फिल्म हमें इस ओर ले जाती है, जो ऊपर से तो एक फेल सॉल्यूशन जैसा लगता है लेकिन ऐसा नहीं है। मुझसे भी बहुत से लोगों ने कहा है कि रंग दे बसंती यूथ को हथियार उठाने का समाधान सुझाती है। नहीं, बिल्कुल नहीं। बल्कि यह फिल्म हमें बताती है कि कैसे हम मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपनी कोशिशें कर सकते हैं। ये लड़के अंत में एक कोशिश के तहत ऑल इंडिया रडियो पर कब्जा कर अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश करते हैं, तो पीछे सिर्फ यही मकसद है कि अपनी बात कही जा सके।

कुल मिलाकर मैं यह कहना चाहता हूं कि पिक्चर हॉल से बाहर आते ही हमें यह अहसास न होने लगे कि सब कुछ ठीक ठाक है। रंग दे बसंती यह कहने की कोशिश करती है कि सब कुछ ठीक नहीं है। एक अनइजी सी फीलिंग देती है यह फिल्म। अब दुश्मन हमें बाहर नहीं दिखाई देता, वह हमार भीतर ही है।

तो क्या एंटी इस्टेब्लिशमेंट यूथ था यह?

नहीं इस फिल्म के जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि ये युवा किसी व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अपने आप के अंदर मौजूद बुराइयों से ही लड़ने की कोशिश कर रहा है।

कुणाल कपूररंग दे बसंती का असलम यानी कुणाल कपूर एक ऐसे परिवार का बेटा है, जिसे देश में मायनॉरिटी कहा जाता है। वह अपने समुदाय में मौजूद तमाम बुराइयों से भी लड़ रहा है। लंबे कद और खूबसूरत आंखों वाले असलम के पास एक सुंदर दिल भी है, जिससे प्यारी कविताएं निकलती हैं। वह धर्म की दीवारों से ऊपर उठ चुका है और यही वह बात है जिसकी वजह से कभी कभी उसे अपने ही परिवार में विरोध का सामना करना पड़ता है। असलम का ज्यादा वक्त भी अपने घर से बाहर अपने दोस्तों में बीतता है। यहीं वे आजादी के सपने देखते हैं।

कुणाल कपूर का कैरियर असिस्टेंट डायरक्टर के बतौर अक्स फिल्म में राकेश मेहरा के साथ शुरू हुआ लेकिन एक्टिंग के लिए उनकी चाहत ज्यादा जोरदार साबित हुई और कुणाल ने खुद को एक अलग ही जगह पाया। कुणाल नसीरुद्दीन शाह के थियेटर ग्रुप से भी जुड़े हैं।

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