देश ने आजादी के 60 साल में विज्ञान के क्षेत्र में काफी तरक्की की है। हमने अंतरिक्ष में अपना स्थान बनाया है। दो दो परमाणु विस्फोट कर अपनी ताकत का लोहा भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनवाया है। हमारी वैज्ञानिक यात्रा कैसी रही है और हमें अभी क्या पाना है? क्यों भारत की झोली में एक भी नोबेल पुरस्कार नहीं है? इन सभी मुद्दों पर भास्कर ने जाने माने एस्ट्रो फिजिसिस्ट प्रो. जयंत नार्लीकर से बात की।
60 वर्ष की विज्ञान यात्रा को आप कैसे देखते हैं? आजादी हासिल करने के ठीक बाद हम अपनी वैज्ञानिक प्रगति को लेकर कहां खड़े थे?
हमने अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, बायोटैक्नोलॉजी, एप्लाइड साइंस के क्षेत्र में, नैनो टैक्नोलॉजी, पार्टिकल फिजिक्स, एस्ट्रो फिजिक्स के क्षेत्र में काफी तरक्की की है और कई अहम मुकाम हासिल किए हैं। इसका दूसरा नकारात्मक पक्ष यह है कि हमारी यूनिवर्सिटीज में शिक्षा का स्तर गिरा है और इसकी वजह से युवा वैज्ञानिकों की कमी खल रही है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत कहां खड़ा दिखता है? क्या उसे दुनिया की सबसे बड़ी रिसर्च एंड डवलपमेंट ताकतों में जगह मिल पाएगी? इसके रास्ते में आप क्या बड़ी बाधाएं देखते हैं?
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत मिडिल बैंड में (जैसे फुटबॉल में डिवीजन बी) आता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि हम उच्चस्तरीय शोध पैदा करने में नाकाम रहे हैं। इसकी वजह केवल फंड्स की कमी नहीं है। बल्कि इसके उलट है। हम कभी-कभी फंड्स आराम से जारी कर देते हैं और यह भी नहीं देखते कि उन्हें कैसे खर्च किया जा रहा है।
60 साल में एक भी नोबेल नहीं? क्या वजह लगती है आपको?
यह सोच का कारण है। मुझे भी लगता है। हालांकि नोबेल मान्यता का एक हिस्सा अपने काम की प्रमोशन की वजह से होता है जिसे अमेरिका में काफी प्रोफेशनली किया जाता है। मेर ख्याल से अगर ठीक से और प्रोफेशनली काम को प्रमोट किया जाता तो कोई भी भारतीय शोध और योगदान को आसानी से नोबेल हासिल हो सकता था।
इस देश के लिए कौन से टर्निग प्वाइंट्स आपके देखने में आते हैं?
20वीं सदी के अंत में इसरो का अपने खुद के सेटेलाइट लॉन्च करना एक बड़ा अहम मोड़ था। दो तीन दशक पहले भारत में हरित क्रांति को भी एक अहम पड़ाव माना जाना चाहिए।
अगले 10, 20 सालों में इस देश के भविष्य को लेकर आपको क्या अहसास होता है? क्या हम कभी अंतरिक्ष में सुपर पावर हो पाएंगे?
भारत का भविष्य काफी उज्जावल है अगर इस देश के लोग अंधविश्वास जैसे एस्ट्रोलॉजी, वास्तुशास्त्र, बाबाओं के पीछे जाना छोड़ दें। वैज्ञानिक सोच से युक्त मन:स्थिति चाहिए ताकि इस देश को विकासशील स्थिति से उठकर विकसित देशों में जगह मिल सके।
बढ़ते आईटी प्रोफेशनल्स और वैज्ञानिकों की फौज के साथ जब आप देश को लगातार विकसित होते हुए देखते हैं तो कौन सी छवियां आपके दिमाग में आती हैं?
आईटी ग्रेजुएट्स और वैज्ञानिकों की उस फौज के बार में बात करना ही बेमानी है जो अगर इस प्रकार के अंधविश्वासों पर यकीन करती हो। मुझे लगता है कि किसी को इस पर सर्वे करना चाहिए कि इन प्रोफेशनल्स की कितनी शादियां इन दिनों जन्मपत्री मिलाकर की जा रही हैं।
जयंत विष्णु नार्लीकर जयंत विष्णु नार्लीकर देश के जानेमाने एस्ट्रो फिजिसिस्ट हैं। स्टीडी स्टेट कॉस्मोलॉजी का उन्हें एक्सपर्ट माना जाता है। सर फ्रैड हॉयल के साथ उन्होंने कन्फॉर्मल ग्रेविटी पर काफी काम किया है। इसे अब हॉयल नार्लीकर थियरी के नाम से जाना जाता है। इस थियरी के जरिए इन्होंने साबित करने की कोशिश की कि अल्बर्ट आइंस्टीन की थियरी ऑफ रिलेटिविटी और मैक प्रिंसीपल के बीच एक सिंथीसिस खोजी जा सकती है। प्रो. जयंत नार्लीकर को देश के दूसर सबसे बड़े नागरिक सम्मान पदम विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। प्रो नार्लीकर पुणो स्थित इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रो फिजिक्स के फाउंडर डायरक्टर हैं। उन्होंने ढेरों विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं।
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