पंजाब के जाने माने सूफी गायक हंसराज हंस के मुताबिक आजादी ऐसी चीज है जो तब तक नहीं हासिल मानी जा सकती जब तक कि लोगों की सबसे अहम जरूरतें ही पूरी नहीं हो पा रहीं। कला के संदर्भ में भी आजादी को लेकर वह अलग खयाल रखते हैं। उनका मानना है कि कलाकार को इतनी आजादी भी नहीं होनी चाहिए कि वह जैसी चाहे वीडियो बना ले। आखिर आजादी के वे क्या मायने लेते हैं और आजादी के इन 60 सालों को कैसे देखते हैं, इन सवालों पर भास्कर ने उनसे बात की।
क्या आपको लगता है कि हमार ख्वाब पूर हो गए हैं, जिन्हें हमने 60 साल पहले देखा था?नहीं, कौन कहता है। जिन्होंने ख्वाब देखा था, अगर वे आज अपने ख्वाबों का हश्र देखते तो जरूर ही रो देते। जिन्होंेने खुद आजादी के लिए काम किया, वो तो कुछ ही बचे हैं और जो बचे हैं वे भी भूखे मर रहे हैं। आजादी हमें काफी महंगे मोल से मिली थी। कुछ ही घंटों ने हमार लाखों लोगों को हमसे छीन लिया था। लेकिन आज क्या इस बात की कोई कीमत रह गई है? दरअसल आज हम खुद ही पैदा की गई बुराइयों के गुलाम हो गए हैं।
आपकी नजर में फिर किस बात की है आजादी?तरक्की हमारी काफी तेज रफ्तार है। उसका टैम्पो भी ठीक है, पर बेहद असमान रफ्तार से आबादी बढ़ रही है। यह हमारी तरक्की को खा रही है, हमें पीछे धकेल रही है। मैं पूछता हूं कि क्यों हम 60 साल में भी अपनी आबादी पर कंट्रोल नहीं कर पाए है?
कला को आजादी तो मिली है? आप अपनी बात किसी भी मनचाहे माध्यम में कह सकते हैं और रख सकते हैं? इस आजादी में बढ़ोत्तरी ही हुई है?हां, हम कलाकारों को भी आजादी मिली है। मगर यह आजादी इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि कोई भी कलाकार मनचाही वीडियो बना ले। यह वह देश नहीं कि जहां वल्गैरिटी को या नंगेज को जगह मिले। इसके बावजूद यह हो रहा है। यह कानून बनना चाहिए कि जो डिजर्व करते हैं, उन्हीं की वीडियो बन सकें।
कला के लिहाज से देखें तो पहले गानों पर काफी काम होता था और अब?आजकल तो गाने की उम्र ही हफ्ता- डेढ़ हफ्ता रह गई है। नौशाद हों या लक्ष्मीकांत प्यारलाल, मुकेश या मोहम्मद रफी, सभी को काम से जुनून की हद तक मुहब्बत थी। आजादी आई तो, मगर कला के प्रति लोगों के इस जुनून में कमी आ गई है। मैं भी इसी सिस्टम का हिस्सा हूं तो और किसी के बार में क्या कहूं।
हंसराज हंसहंसराज हंस काफी समय से सूफी और लोकगायकी के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने कई फिल्मों में भी अपने गीत गाए हैं। उनकी अब तक कई अल्बम्स आ चुकी हैं। हंसराज ने जाने माने सूफी गायक नुसरत फतेह अली खान के साथ भी काम किया है। हंसराज हंस अपनी अल्बम चोरनी के बाद देश भर में छा गए। उनका सबसे ज्यादा अहम काम है पैरां विच और पत्ता-पत्ता सिंहां दा बैरी जो उनके इस ख्याल को जाहिर करता है कि पंजाब दोनों तरफ एक है फिर वह चाहे हिंदुस्तान में हो या पाकिस्तान में। जालंधर के पास पैदा हुए हंसराज हंस ने जाने माने पंजाबी के उस्ताद गायक पूरनशाह कोटी से संगीत की शिक्षा ली। हंस को असा सिंह मस्ताना और यमला जट जैसे दिग्गज गायकों की श्रेणी में रखा जाता है।
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