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अंधेर-नगरी,चौपट राजा

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लेखन की हर विधा को अपने लेखन से रोशन किया है। सौ वर्ष से भी अधिक समय बीत चला है और 'अंधेर-नगरी' आज भी नया लगता है। व्यवस्था के chaupat_rajaअंधेर की पोल खोलता यह नाटक आज भी हमारे समय की बात करता हुआ लगता है।

प्रथम दृश्य(बाह्य प्रांत)(महंत जी दो चेलों के साथ गाते हुए आते हैं)सब- राम भजो राम भजो राम भजो भाई।राम के भजो से गनिका तर गई,राम के भजे से गीध गति पाई।राम के नाम से काम बनै सबराम के भजन बिनु सबहि नसाई।राम के नाम से दोनों नयन बिनुसूरदास भए कबिकुलराई।राम के नाम से घास जंगल की,तुलसीदास भए भजि रघुराई।

महंत- बच्चा नारायणदास! यह नगर तो दूर से बड़ा सुंदर दिखलाई पड़ता है! देख, कुछ भिच्छा-उच्छा मिलै तो ठाकुर जी को भोग लगै। और क्या।ना.दा.- गुरुजी महाराज! नगर तो नारायण के आसरे से बहुत ही सुंदर है जो है सो, पर भिक्षा सुंदर मिलै तो काड़ा आनंद होय।महंत- बच्चा गोवरधनदास! तू पश्चिम की ओर से जा और नारायणदास पूरब की ओर जाएगा। देख, जो कुछ सीधा सामग्री मिलै तो श्री शालग्राम जी का बालभोग सिद्ध हो।गो.दा.- गुरुजी! मैं बहुत सी भिच्छा लाता हूं। यहां लोग तो बड़े मालवर दिखलाई पड़ते हैं। आप कुछ चिंता मत कीजिए।महंत- बच्चा बहुत लोभ मत करना। देखना, हां-लोभ पाप का मूल है, लोभ मिटावत मानलोभ कभी नहीं कीजिए, यामैं नरक निदान।(गाते हुए सब जाते हैं)

दूसरा दृश्य(बाÊार)कबाबवाला- कबाब गरमागरम मसालेदार— चौरासी मसाला बहत्तर आंच का— कबाब गरमागरम मसालेदार— खाए सो होंठ चाटै, न खाए सो जीभ काटै। कबाब लो, कबाब का ढेर— बेच टके सेर।घासीराम- चने जोर गरम—चने बनावैं घासीराम। निज की झोली में दुकान।चना चुरमुर चुरमुर बोले। बाबू खाने को मुंह खोले।चना खावै तौकी मैना। बोलै अच्छा बना चबैना।चना खाए गफूरन मुन्ना। बोलै और नहीं कुछ सुन्ना।चना खाते सब बंगाली। जिन धोती ढीली ढाली।चना खाते मियां जुलाहे। डाढ़ी हिलती गाह बगाहे।चना हाकिम सब जो खाते। सब पर दूना टिकस लगाते।चने जोर गरम— टके सेर।नरंगीवाला- नरंगी ले नरंगी— सिलहट की नरंगी, बुटवल की नरंगी, रामबाण की नरंगी, आनंदबाग की नरंगी। भई नींबू से नरंगी। मैं तो पिया के रंग न रंगी। मैं तो भूली लेकर संगी। नरंगी ले नरंगी। कंवला नींबू, मीठा नींबू, रंगतरा, संगतरा। दोनों हाथों लो— नहीं पीछे हाथ ही मलते रहोगे। नरंगी ले नरंगी। टके सेर नरंगी।

हलवाई- जलेबियां गरमा गरम। ले सेव इमरतीस लड्डू गुलाब जामुन खुरमा बुंदिया बऱफी समोसा पेड़ा कचौड़ी दालमोट पकौड़ी घेवर गुपचुप। हलुआ हलुआ ले हलुआ मोहनभोग। मोयनदार कचौड़ी कचाका हलुआ नरम चभाका। घी में नरम चीनी में तरातर चासनी में चमाचम। ले भूरे का लड्डू। जो खाए सो भी पछताय जो न खाए सो भी पछताय। रेवड़ी कड़ाका। पापड़ पड़ाका। ऐसी जात हलवाई जिसके छत्तिस कौम हैं भाई। जैसे कलकत्ते के विलसन मंदिर के भितरिए, वैसे अंधेर नगर के हम। सब सामान ताजा। खाजा ले खाजा। टके सेर खाजा।

कुंजड़िन- ले धनिया मेथी सोआ पालक चौराई बथुआ करेमुं नोनियां कुलफा कसारी चना सरसों का साग। मरसा ले मरसा। ले बैंगन लौआ कोहड़ा आलू अरुई बंडा नेनुआं सूरन रामतरोई तोरई मुरई ले आदी मिरचा लहसुन पियाज टिकोरा। ले फालसा खिरनी आम अमरूद निबुआ मटर होरहा। जैसे काजी वैसे पाजी रैयत राजी टके सेर भाजी। ले हिंदुस्तान का मेवा फूट और बैर।

मु़गल- बादाम पिस्ते अखरोट अनार बिहीदाना मुनक्का किशमिश अंजीर आबजोश आलूबोखरा चिलगोजा सेव नाशपाती बिही सरदा अंगूर का पिटारी। आमारा ऐसा मुलक जिसमें अंगरेज का भी दांत खट्टा ओ गया। नाहक को रुपया खराब किया। हिंदोस्तान का आदमी लक लक हमारे यहां का आदमी बुंबक बुंबक लो सब मेवा टके सेर।

पाचकवालाचूरन अमल बेद का भारी। जिसको खाते कृष्ण मुरारी।मेरा पाचक है पचलोना। जिसको खाता श्याम सलोना।चूरन बना मसालेदार। जिसमें खट्टे की बहार।मेरा चूरन जो कोई खाए। मुझको छोड़ कहीं नहिं जाए।हिंदू चूरन इसका नाम। विलायत पूरन इसका काम।चूरन जब से हिंद में आया। इसका धन बल सभी घटाया।चूरन ऐसा हट्टा कट्टा। कीना दांत सभी का खट्टा।चूरन चला डाल की मंडी। इसको खाएंगी सब रंडी।चूरन अमले सब जो खावैं। दूनी रिश्वत तुरंत पचावैं।चूरन नाटकवाले खाते। इसकी नकल पचाकर लाते।चूरन सभी महाजन खाते। जिससे जमा हजम कर जाते।चूरन खाते लाला लोग। जिनको अकिल अजीरन रोग।चूरन खावै एडिटर जात। जिन के पेट पचै नहिं बात।चूरन साहेब लोग जो खाता। सारा हिंद हजम कर जाता।चूरन पुलिसवाले खाते। सब कानून हजम कर जाते।ले चूरन का ढेर, बेचा टके सेर।

मछलीवाली- मछरी ले मछरी।मछरिया एक टके कै बिकाय।लाख टका के वाला जोबन, गाहक सब ललचाय।नैन मछरिया रूप जाल में, देखतही फंसि जाय।बिनु पानी मछरी सो बिरहिया, मिले बिना अकुलाय।

जातवाला (ब्रा±मण)- जात ले जात, टके सेर जात। एक टका दो, हम अभी अपनी जात बेचते हैं। टके के वास्ते ब्रा±मण से धोबी हो जाएं और धोबी को ब्रा±मण कर दें, टके के वास्ते जैसी कहो वैसी व्यवस्था दें। टके के वास्ते झूठ को सच करें। टके के वास्ते ब्रा±मण से मुसलमान, टके के वास्ते हिंदू से क्रिस्तान। टके के वास्ते धर्म और प्रतिष्ठा दोनों बेचें। टके के वास्ते झूठी गवाही दें। टके के वास्ते पाप को पुण्य मानें, टके के वास्ते नीच को भी पितामह बनावें। वेद धम्र्म कुल मरजादा सच्चाई बड़ाई सब टके सेर। लुटाय दिया अनमोल माल ले टके सेर।

बनियां- आटा दाल लकड़ी नमक घी चीनी मसाला चावल ले टके सेर।(बाबाजी का चेला गोवर्धनदास आता है और सब बेचने वालों की आवाÊा सुन सुनकर खाने के आनंद में बड़ा प्रसन्न होता है।)गो.दा.- क्यों भाई बणिये, आटा कितणो सेर?बनियां- टके सेर।गो.दा.- औ चावल?बनियां- टके सेर।गो.दा.- औ चीनी?बनियां- टके सेर।गो.दा.- औ घी?बनियां- टके सेर।गो.दा.- सब टके सेर। सचमुच।बनियां- हां महाराज, क्या झूठ बोलूंगा।गो.दा.- (कुंजड़िन के पास जाकर) क्यों माई, भाजी क्या भाव?कुंजड़िन- बाबाजी, टके सेर। निबुआ मुरई धनिया मिरचा साग सब टके सेर।गो.दा.- सब भाजी टके सेर। वाहवाह! बड़ा आनंद है। यहां सभी चीज टके सेर। (हलवाई के पास जाकर) क्यों भाई हलवाई? मिठाई कितणो सेर?

हलवाई- बाबाजी! लडुआ हलुआ जलेबी गुलाब जामुन खाजा सब टके सेर।गो.दा.- वाह! वाह!! बड़ा आनंद है! क्यौं बच्चा, मुझसे मस़खरी तो नहीं करता? शचमुच सब टके सेर?हलवाई- हां बाबाजी, शचमुच सब टके सेर। इस नगरी की चाल ही यही है। यहां सब चीÊा टके सेर बिकती है।गो.दा.- क्यौं बच्चा! इस नगरी का नाम क्या है?

हलवाई- अंधेर नगरी।गो.दा.- और राजा का नाम क्या है?हलवाई- चौपट्ट राजा।गो.दा.- वाह! वाह! अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा (यही गाता है और आनंद से ब़गल बजाता है)।हलवाई- तो बाबाजी कुछ लेना देना हो तो लो दो।गो.दा.- बच्चा, भिक्षा मांग कर सात पैसे लाया हूं। साढ़े तीन सेर मिठाई दे दे। गुरु चेले सब आनंदपूर्वक इतने में छक जाएंगे।(हलवाई मिठाई तौलता है। बाबाजी मिठाई लेकर खाते हुए और अंधेर नगरी गाते हुए जाते हैं।) (पटाक्षेप)

तीसरा दृश्य(स्थान जंगल)(महंतजी और नारायणदास एक ओर से राम भजो इत्यादि गीत गाते हुए आते हैं और एक ओर से गोवर्धनदास अंधेर नगरी गाते हुए आते हैं।)महंत- बच्चा गोवर्धनदास! कह, क्या भिक्षा लाया? गठरी तो भारी मालूम पड़ती है।गो.दा.- बाबा जी महाराज! बड़े माल लाया हूं। साढ़े तीन सेर मिठाई है।महंत- देखूं बच्चा! (मिठाई की झोली अपने सामने रखकर खोलकर देखता है) वाह! वाह! बच्चा! इतनी मिठाई कहां से लाया? किस धर्मात्मा से भेंट हुई?गो.दा.- गुरुजी महाराज! सात पैसे भीख में मिले थे, उसी से इतनी मिठाई मोल ली है।महंत- बच्चा! नारायणदास ने मुझसे कहा था कि यहां सब चीÊा टके सेर मिलती है, तो मैंने इसकी बात का विश्वास नहीं किया। बच्चा, यह कौन-सी नगरी है और इसका कौन-सा राजा है, जहां टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा है?गो.दा.- अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।महंत- तो बच्चा! ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहां टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा हो।

दोहासेत सेत सब एक से, जहां कपूर कपासऐसे देस कुदेस में, कबहुं न कीजे बास।

कोकिल बायस एक सम, पंडित मूरख एकइंद्रायन दाड़िम विषय, जहां न नेकु विवेक।

बसिए ऐसे देन नहिं, कनक वृष्टि जो होयरहिए तो दुख पाइए, प्रान दीजिए रोय।

सो बच्चा चलो यहां से। ऐसी अंधेर नगरी में हÊार मन मिठाई मु़फ्त की मिलै तो किस काम की? यहां एक छन नहीं रहना।गो.दा.- गुरुजी, ऐसा तो संसार भर में कोई देस ही नहीं है। दो पैसा पास रहने ही से मजे में पेट भरता है। मैं तो इस नगर को छोड़कर नहीं जाऊंगा। और जगह दिन भर मांगो तो भी पेट नहीं भरता। वरंच बाजे बाजे दिन उपास करना पड़ता है। सो मैं तो यहीं रहूंगा।महंत- देख बच्चा, पीछे पछताएगा।गो.दा.- आपकी कृपा से कोई दुख न होगा, मैं तो यही कहता हूं कि आप भी यहीं रहिए।महंत- मैं तो इस नगर में अब एक क्षण भर नहीं रहूंगा। देख मेरी बात मान नहीं पीछे पछताएगा। मैं तो जाता हूं, पर इतना कहे जाता हूं कि कभी संकट पड़े तो हमारा स्मरण करना।गो.दा.- प्रणाम गुरुजी, मैं आपका नित्य ही स्मरण करूंगा। मैं तो फिर भी कहता हूं कि आप भी यहीं रहिए।(महंतजी नारायणदास के साथ जाते हैं। गोवर्धनदास बैठकर मिठाई खाता है।) (पटाक्षेप)जारी..