HomeNewsNational National

जनांदोलनों से ही हैं उम्मीदें: योगेंद्र यादव

देश के लोकतंत्र की नब्ज पर गहरी पकड़ रखने वाले प्रो योगेंद्र यादव की नजर में अब राजनीति से उतनी नहीं, जनांदोलनों से ही कुछ उम्मीदें बची हैं। 1999 से 2004 तक प्रो यादव ने कई बड़े चुनाव सर्वे डिजायन किए हैं और उन्हें संचालित किया है। भारतीय लोक की मनोदशा का अध्ययन किया है। 60 साल की लोकतंत्र की यात्रा पर उन्होंने भास्कर से बात की।

भारत के साठा हो जाने को कैसे देखते हैं आप? कहां थे हम और कहां आ गए?

यह साठवां पड़ाव न तो विलाप की घड़ी है और न ही आत्ममुग्ध होने का समय। कुछ बातों पर हम इतरा सकते हैं। आज से 60 साल पहले किसी को भरोसा नहीं था कि असंभव विविधताओं वाला यह समाज एक देश के रूप में बचा रहेगा। सोवियत संघ ढह गया, यूगोस्लाविया छिन्न-भिन्न हो गया, वहां हम आज भी एक राष्ट्र राज्य के रूप में कायम हैं। यह एक छोटी उपलब्धि नहीं है। यह उपलब्धि डंडे के सहारे हासिल नहीं की गई। यह विविधताओं को स्वीकारने और उनका सम्मान करने की हमारी नीति का सफल परिणाम है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसा बहुत कुछ है जो शर्म से हमारा माथा नीचा कर देता है। लोकतंत्र में बहुसंख्यक लोग आज भी जिस बदहाली और गरीबी में जीवन बिता रहे हैं, वह तो हमारे माथे पर कलंक है। औसत व्यक्ति को स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हम उपलब्ध नहीं करा सकते। हर आंख से आंसू पोंछने का सपना आज भी सपना ही है।

लोकतंत्र की तबियत में कितना बदलाव महसूस करते हैं? क्या होगा आगे?

अगर इमरजेंसी के 19 महीनों को छोड़ दें, तो 60 साल की इस लंबी अवधि तक एक गरीब और अल्पशिक्षित देश का लोकतंत्र बने रहना अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है। यूरोप, अमेरिका कहीं भी ऐसा नहीं होता कि अमीर की बनिस्बत गरीब लोग ज्यादा वोट डालें। वहां कम शिक्षित और अश्वेत राजनीति में भागीदारी नहीं करते। हमारे यहां गरीब, पिछड़ी जाति, दलित, गांव-देहात के लोग राजनीति में अपेक्षाकृत ज्यादा भागीदारी करते हैं। इस हकीकत ने हमारे लोकतंत्र में आम व्यक्ति को जुबान और पहचान देने की संभावना बनाई है। लेकिन हमारा लोकतंत्र इस संभावना को साकार करने में अभी सफल नहीं हुआ है। गरीब वोट तो देता है, लेकिन सरकार पर कब्जा अमीर, समर्थ और सक्षम का ही है। संविधान अधिकार तो देता है, लेकिन उन अधिकारों के इस्तेमाल करने का साधन नहीं दे सकता। लोग सरकार को गद्दी से उतार तो सकते हैं, लेकिन सरकार से अपनी मनचाही नीतियां नहीं बनवा सकते। नीतियां बन भी जाएं, तो उन पर अमल नहीं करा सकते। वोटर संप्रभु होकर भी बेचारा है। प्रधानमंत्री को हटा सकता है लेकिन कलेक्टर के दर्शन नहीं कर सकता।

अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय की पहचान का संकट हमेशा ही बना रहता है। आपकी राय क्या है?

पिछले कुछ दिनों से शहरी, अंग्रेजीदां भारतीयों में यह फितूर कुछ जोर पकड़ रहा है कि हो न हो भारत सारी दुनिया पर छा रहा है। हो सिर्फ इतना रहा है कि दुनिया के अमीर देशों में भारत की अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों की पहचान बढ़ गई है। इसके चलते यूरोप, अमेरिका के अखबारों और टीवी चैनलों में भारत की चर्चा कुछ ज्यादा हो जाती है। अमीर देशों के नेता भारत आने में अब शर्म महसूस नहीं करते। इतने भर को पूरे जगत में भारत की सफलता मानना भारतीयों की हीनभावना का परिचायक है। दुनिया के छठे हिस्से की आबादी वाला देश अगर सत्ता, प्रभाव और असर का 20वां हिस्सा पाकर संतुष्ट है तो उसे क्या कहा जाए। हकीकत यह है कि अंतर्राष्ट्रीय जगत में आज भारत की हैसियत वह नहीं है जो 50 या 60 के दशक के कहीं गरीब भारत की थी। आईटी सेक्टर से कुछ अमेरिकी डरे जरूर हैं लेकिन दुनिया में यह किसी से नहीं छिपा कि दुनिया का 2 फीसदी व्यापार भी भारत से नहीं होता, कि इस देश के दो तिहाई लोग हर दिन 2 डॉलर से भी कम में गुजर करते हैं। अपनी सांस्कृतिक विरासत का हम भले ही कितना भी बाजा बजाएं, हकीकत यह है कि हमारे देश के मालिकों और उनके बच्चों को उस संस्कृति का क-ख-ग भी नहीं पता। यहां तो राज ही वह करता है, जो इस देश की कोई भी भाषा पढ़-लिख नहीं सकता। जब तक हमारी आर्थिक वृद्धि एक आम आदमी की खुशहाली में नहीं बदलती, जब तक हम अमेरिका के पिछलग्गू बनने का सपना नहीं छोड़ते और जब तक हम देश की भाषा-भूषा का सम्मान करना नहीं सीखते, तब तक अंतर्राष्ट्रीय जगत में सम्मान मिलने की बात सोचना भी फिजूल है। गुलामों को इज्‍जत नहीं मिलती।

देश के 60 वर्ष में हम कहां गिरे, कहां उठे और कब चले?

अगर हम लोकतंत्र के उतार-चढ़ाव को देखें तो मुझे 1967 और 1990 दो बड़े मोड़ नजर आते हैं। 1967 इसलिए महत्वपूर्ण है कि उस साल देश के एक बड़े इलाके में कांग्रेस के एकछत्र राज का अंत हुआ। बहुदलीय व्यवस्था सही अर्थ में स्थापित हुई। लोकतंत्र पहले से ज्यादा गहरा हुआ। 1967 सही मायने में नेहरू युग की समाप्ति भी थी (हालांकि नेहरू की मृत्यु 1964 में हो चुकी थी) और एक नए तरह के राजनीतिक नेतृत्व की शुरुआत भी। 1967 के बाद कांग्रेस का विघटन हुआ। कांग्रेस का अपना चरित्र बदला। कई संस्थाओं का पराभव शुरू हुआ और आंदोलन की राजनीति की बुनियाद रखी गई। दूसरा बहुत बड़ा मोड़ 1990 का साल था, जब मंडल, मंदिर और मार्केट तीनों एक साथ राजनीतिक धरातल पर छा गए। इन तीनों परिवर्तनों ने लोकतांत्रिक राजनीति के धरातल को पूरी तरह बदलकर रख दिया। मंडलीकरण के चलते पिछड़ी जातियों के उभार, रामजन्मभूमि आंदोलन के चलते बीजेपी के उभार और नई आर्थिक नीतियों के चलते मध्यम वर्ग का उदय हुआ और भारतीय राजनीति की जमीन बिल्कुल बदल गई और इसी के चलते कांग्रेस का पराभव भी हुआ और उसकी जगह क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ। गठजोड़ की राजनीति स्थापित हुई। चूंकि इन सबके बीज 1990 में पड़े (या 89 से 91 के बीच कभी) इसलिए उसे एक निर्णायक मोड़ मानता हूं।

क्या हैं आगे चुनौतियां और कैसा दिखता है भविष्य?

जैसा मैंने कहा कि यह वक्त न तो अपनी पीठ ठोकने का है और न स्यापा करने का। कोई भविष्यवाणी के बजाय भविष्य को एक चुनौती और अवसर की तरह देखना ही बेहतर होगा। भविष्य के बारे में एक बात तो तय लगती है कि भारत लोकतंत्र है और रहेगा। इसका मतलब यह है कि हमें अपना भविष्य बनाने का अवसर मिलेगा। लोकतंत्र अपने आप में कोई जादू की छड़ी नहीं है। सवाल ये है कि इस लोकतंत्र में हम करते क्या हैं? मेरे विचार में असली चुनौती है पिछले कुछ सालों में आर्थिक वृद्धि की फायदा उठाकर भारत और इंडिया के बीच मुंह बाए खड़ी गहरी खाई को पाटना। सामाजिक संदर्भ में चुनौती है जातीय विषमता को कम करना और शिक्षा और रोजगार के अवसर सभी तबकों को समान रूप से उपलब्ध कराना। राष्ट्रीय चुनौती है हमारी विविधता को मजबूत करना और सीमांत प्रदेशों और हाशियाग्रस्त समुदायों को देश से जोड़ना। राजनीतिक चुनौती है लोकतंत्र में आम नागरिकों के नियंत्रण को बढ़ाना। इन सब चुनौतियों का सामना करने में देश की मुख्यधारा की राजनीति कमजोर होती जा रही है। मुझे भविष्य में आशा की किरण देश भर के जनांदोलनों में दिखाई देती है, चाहे वह नर्मदा बचाओ आंदोलन हो या सूचना के अधिकार का आंदोलन या फिर जन-जंगल और जमीन के अधिकार को लेकर चल रहे संघर्ष। इन सबने आम जनता की आवाज को मुखर किया है। गौरतलब है कि इनमें से कई आंदोलनों का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। ये आंदोलन अगर देश में राजनीति की एक वैकल्पिक धारा का निर्माण कर सकते हैं, तो वह भविष्य के लिए सबसे अच्छा संकेत होगा।

कौन सी घटनाएं ऐसी हैं जिन्होंने कभी खत्म न होने वाले निशान छोड़ दिए हैं?

मैं उस अंतिम पीढ़ी का हिस्सा हूं जिसने इमरजेंसी को अपनी आंख से देखा है। उन दिनों बच्चा था, लेकिन वह अद्भुत चुनाव मुझे याद है जब मैंने भी दीवारलेखन किया और एक दो सभाओं में भाषण भी दिए। मुझे वह दिन भुलाए नहीं भूलता, जब 1977 चुनाव का परिणाम आ रहा था। हमारे शहर (श्रीगंगानगर, राजस्थान) में कचहरी के सामने बड़ा सा हुजूम इकट्ठा था। शाम को जब बीबीसी पर इंदिरा गांधी और संजय गांधी के रायबरेली और अमेठी से पिछड़ने की खबर आई, उस रोमांच और उल्लास को मैं आज भी महसूस कर सकता हूं। अगर मुझे पूछा जाए कि लोकतंत्र क्या होता है तो मेरी आंखों के सामने आज भी वह तस्वीर आ जाती है। उस समय पैदा हुई भोली आशा और जनता प्रयोग की असफलता से उठी घोर निराशा ने राजनीति पढ़ने-समझने की प्रेरणा दी। दूसरा दिन था 6 दिसंबर 1992 का। बाबरी मस्जिद के ध्वंस की खबर से अनेक भारतीयों की तरह मुझे भी लगा कि यह मेरे भारत के सपने का ध्वंस था। उस अनुभव से उपजी असहायता के बोझ ने समकालीन राजनीति पर लिखने की ओर प्रेरित किया। उस मामले की गहरी पड़ताल ने मुझे अपनी कई बनी-बनाई मान्यताएं बदलने पर मजबूर किया। एक मायने में 2002 के गुजरात नरसंहार ने उन कुछ मान्यताओं को पुष्ट किया जिन पर मैंने 1992 में सोचना शुरू किया था। भारत के भविष्य पर जब भी विचार करता हूं, तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात नरसंहार से कैसे बचा जाए, इस पर अक्सर सोचता हूं।

संबंधित खबरें
* विकास को लेकर हम राजनीति नहीं करते: प्रिया दत्त
* नंगई की आजादी न होः हंस
* अंधविश्वास दूर हों: जयंत
* क्रांति नहीं खुद को बदलने की जरूरत: कुणाल
* जेहन से अंग्रेजियत की गुलामी मिटना जरूरी है : तबस्सुम