केएन गोविंदाचार्य का मानना है कि नई पीढ़ी के पास ज्यादा आत्मविश्वास है। उनका मानना है कि आजादी पाने के बीस बरसों के अंदर ही सबको भोजन और सबको काम जैसी समस्याओं पर काबू पा लिया गया होता, अगर हम जनता की ताकत और स्वभाव का अध्ययन करते हुए योजनाएं बनाते। अगले कुछ सालों में देश के भविष्य के प्रति वे काफी आश्वस्त हैं। उनका कहना है कि हम अपनी आंतरिक समस्याओं पर आधा भी काबू पा लें, तो भारत विश्व में अपनी भूमिका अदा करने की स्थिति में आ जाएगा। आजादी के 60 साल के सफर पर भास्कर संवाददाता नीरज कुमार ने गोविंदाचार्य से बात की।
आजादी हासिल करने के बाद 60 सालों में सबसे अच्छी लगने वाली और सर्वाधिक दुखी करने वाली स्मृतियां कौन सी हैं?
60 साल के बाद जो चीजें अच्छी लग रही हैं वो है नई पीढ़ी का उत्साह। मेरा मानना है कि नई पीढ़ी अधिक जानकार, अधिक आत्मविश्वास से भरी हुई और अधिक खुलेपन के साथ दिख रही है। साथ ही नई पीढ़ी तीन तरह की खुमारियों से उबर रही है। ये तीन खुमारियां हैं उपनिवेशवाद, भारत विभाजन और खोखला समाजवाद या इसे खोखला सरकारवाद कह सकते हैं। नई पीढ़ी में यह उत्साह भारत के भविष्य का सकारात्मक संकेत है। आजादी के बाद जो सबसे दुखद पहलू नजर आया, वो है पढ़े लिखे लोगों द्वारा समाज की आत्मनिंदा में रत रहना। ये कहना कि भारत पिछड़ा हुआ है, यहां के लोग पिछड़े हैं आदि। ऐसी बातों से यह साफ है कि उन्हें भारत की तासीर और ताकत का परिचय नहीं है।
आपके ख्याल से इन 60 सालों में सबसे ज्यादा अहम वो कौन सी चीजें हैं जिनकी वजह से हम तरक्की कर पाए?
मेरा मानना है कि आजादी के 60 सालों में सामाजिक पूंजी और सांस्कृतिक परंपरा के कारण भारत का भौतिक और आर्थिक विकास हो पाया है न कि सरकारों और देशी विदेशी पूंजी से।
तरक्की के लिहाज से आज हम कहां खड़े हैं और कहां हो सकते थे? खासकर आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के नजरिए से?
यदि हम जनता की ताकत और स्वभाव का अध्ययन करते हुए योजनाएं बनाते, तो सबको भोजन, सबको काम आजादी के बीस बरसों के अंदर ही हासिल कर लिया होता। अगर जमीन, जंगल, जल और जानवर का संपोषण किया होता, तो आज दुनिया के आर्थिक दृष्टि से अग्रणी राष्ट्रों में होते। फिर सामाजिक न्याय और एकता का संतुलन सामाजिक नेताओं द्वारा साधा गया होता न कि राजनीतिक नेताओं द्वारा। तब एकरस समाज दुनिया के सामने उदाहरण होता।
आपने अर्थव्यवस्था का गहन अध्ययन किया है। आप आर्थिक उदारीकरण के नतीजों को कितना सकारात्मक मानते हैं।
आर्थिक उदारीकरण के नतीजे साफ दिखने शुरू हो गए हैं। गांवों का बुरा हाल है और ग्रामीण गरीबी नहीं घटी है। आर्थिक उदारीकरण के बाद किसान और बदहाल हुए हैं। कारीगर और छोटे उद्यमी बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। शहरों में गरीबी तो घटी मगर इसके बदले प्रदूषण, गंदगी, अपराध, और बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी। आर्थिक सुधार के नाम पर देश में आर्थिक गैरबराबरी सुरसा की तरह फैल रही है। उदारीकरण के नाम पर नारी के प्रति दृष्टि गंदली हुई और उन्मुक्त उपभोग की अपसंस्कृति फैली।
अगले 10 सालों में भारत का भविष्य क्या दिखता है?
मेरा मानना है कि हम अपनी आंतरिक समस्याओं पर यदि आधा भी काबू पा लें, तो अगले 10 साल में भारत दुनिया में अपनी भूमिका अदा करने की स्थिति में आ जाएगा।
गोविंदाचार्य:गोविंदाचार्य का जन्म 1943 में तिरुपति में हुआ था। उन्होंने वाराणसी में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की। 1962 में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से उन्होंने एमएससी की। छात्र जीवन से ही गोविंदाचार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में सक्रिय रहते थे। 1965 में उन्होंने आरएसएस के प्रचारक का जिम्मा संभाला। 1974 के जेपी आंदोलन में भी गोविंदाचार्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1976 में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1988 में उन्हें भाजपा में भेजा गया। 2000 तक वे पार्टी के महासचिव रहे। सितंबर 2000 में वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गए और करीब दो सालों तक वैश्वीकरण का राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति पर प्रभाव का अध्ययन किया। फिलहाल भारत विकास संगम, कौटिल्य शोध संस्थान और राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के जरिए नई चुनौतियों को समझने में जुटे हैं।
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