सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह का कहना है कि हमारी लीडरशिप का स्टैंडर्ड गिर रहा है और वह फेल हो चुकी है। कुछ ही ऐसे हैं जिन पर राजनीति के चेहरे को दागदार होने से बचाने का दारोमदार है। बाकी ज्यादातर ऐसे हैं, जिनसे आम आदमी दुखी है। जोगिंदर सिंह का कहना है कि हम आजाद तो हैं मगर करप्शन के लिए और मौजूदा सरकारें कमजोर से कमजोर होती गई हैं। अगर कुछ ठीक है तो आम लोगों की वजह से, खराबी हैं तो सरकार की वजह से। इन्हीं सब मुद्दों के साथ भास्कर ने जोगिंदर सिंह से आजादी के 60 साल पर उनके नजरिए को लेकर बात की।
इस आधी सदी में हमें हमारे देश के संचालक कहां ले आए हैं?
सरकारें अब सक्षम नहीं रहीं हैं कि वे कुछ भी ठीक कर सकें। सारी पार्टीज केवल वोट बैंक के लिए काम कर रही हैं। देश को तबाह करने के लिए काम कर रही हैं। इनके पास एक अच्छी जिंदगी देने के लिए कोई प्रोग्राम नहीं है। करप्शन इनकी एक अहम पहचान बन गया है। कुछ लोगों का स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग बढ़ा है, तो बाकी वहीं के वहीं हैं।
ब्यूरोक्रेसी से कुछ उम्मीदें दिखती हैं आपको?
देखिए, ब्यूरोक्रेसी तो घोड़ा है, अगर ठीक से साधा जाएगा तो ठीक दिशा में जाएगा, वरना गिरा देगा। अब लीडरशिप को ही नहीं पता कि इसे कैसे संभाला जाए। वह पहले ही खुद को नाकाम साबित कर चुकी है। सरकार में रहते हुए किसी को नौकरी जाने का डर नहीं है। इसलिए करप्शन फैल रहा है। हालांकि शुरुआत में इतनी बुराइयां नहीं थीं, लेकिन अब निहित स्वार्थ ज्यादा हैं।
तो 60 साल बाद क्या हमने अपनी गलतियों और कमियों से कोई सबक भी लिया है?
नहीं, जब सरकार में इच्छा शक्ति ही नहीं है तो क्या सबक लेंगे। हमारा डिलीवरी सिस्टम सबसे कमजोर है। ऊपर से नीचे तक समृद्धि को पहुंचाने के बड़े बड़े वायदे होते हैं। लेकिन क्या होता है। यह राजीव गांधी ने 1988 में ही कह दिया था कि हम एक रुपए भेजते हैं तो आखिरी आदमी तक सिर्फ 15 पैसे पहुंचते हैं। मेरे ख्याल से तो अब 5 पैसे भी नहीं पहुंच रहे होंगे। 60 साल बाद भी हमारी 37 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे है, यही हमारी सफलता है? आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए हमारे पास आज भी कोई कानून नहीं है, जबकि देश के 170 जिलों में माओवादी घुसपैठ कर रहे हैं, जो देश की सिक्योरिटी के लिए बड़ा खतरा हैं। लेकिन सरकार को यह कोई समस्या नहीं लगती।
इन 60 साल में कुछ तो अच्छा भी हुआ होगा? और कुछ बुरा?
बांग्लादेश को पाकिस्तान के हाथों से छुड़ाना मेरे विचार में सबसे अच्छा मौका था। दूसरी अच्छी बात मुझे लगती है जब अटल बिहारी वाजपेयी के समय भारत ने पोखरण में परमाणु विस्फोट कर दुनिया के सामने अपनी ताकत का अहसास कराया। और बुरी बात यह है कि जातिवाद पूरी तेजी के साथ बढ़ गया है।
हमने तरक्की भी की है?
हां की है, लेकिन सरकार के बावजूद। सरकार की वजह से नहीं। यह तरक्की आम आदमी की है।
आपको जो बुराइयां दिखती हैं, उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
बुरों को बाहर करके। अब जब भी किसी विभाग में किसी घोटाले का पता चलता है तो क्या किसी अधिकारी को डिसमिस किया जाता है? क्या दिल्ली जल बोर्ड में रिश्वतखोरी का खुलासा होने पर सरकार ने अधिकारियों को डिसमिस किया? क्या डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) में वाइस चेयरमैन की गड़बड़ियों के बाद किसी को बाहर निकाला? मेरा मानना है कि अगर करप्ट ऑफिशियल्स को बाहर कर दें तो हमें कई बड़ी मुश्किलों से निजात मिल जाएगी।
जोगिंदर सिंह
सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह ने अपने कार्यकाल में देश के आधा दर्जन टॉप राजनीतिज्ञों, पूर्व प्रधानमंत्रियों, एक मुख्यमंत्री और कई पूर्व मुख्यमंत्रियों और कई मंत्रियों से जुड़े स्कैंडल्स की जांच पड़ताल की है। इसीलिए उन्हें लोग जोगिंदर टाइगर सिंह के नाम से भी जानते हैं। कई लोगों का कहना है कि जोगिंदर की पहली क्वालिफिकेशन तो उनका कर्नाटक से होना रहा जो तब प्रधानमंत्री एचडी देवेगोड़ा का राज्य था। चार्ज संभालते ही वह देश भर में हैडलाइन्स में छा गए। पीवी नरसिम्हाराव पर केस रहा हो या सुखराम के दिल्ली और मंडी स्थित आवास पर छानबीन, सीबीआई उनके समय किसी न किसी वजह से खबरों में रही। सीबीआई के ही कई अफसरों को उन्होंने उनके राजनीतिज्ञों से रिश्तों के मद्देनजर संवेदनशील केसों को स्थानांतरित कर दिया। निहित स्वार्थो ने सिर जरूर उठाया पर टाइगर सिंह टस से मस नहीं हुए। जब तक रहे उन्होंने नेताओं के दागदार दामन को उघाड़ने और उन्हें न्याय तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
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