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हमें अभी आजादी नहीं मिली है : गीलानी

Gilaniसैयद अली शाह गीलानी जम्मू कश्मीर की आजादी के सबसे पहले और पुराने समर्थकों में आते हैं और काफी समय से जम्मू कश्मीर की जनता के हकूक के लिए लड़ते रहे हैं। यहां तक कि इसके लिए उनके भारत विरोधी रवैये को निशाना बनाया जाता रहा है। गीलानी का साफ मानना है कि आजाद हिंदोस्तान और आजाद पाकिस्तान दोनों ने ही जम्मू कश्मीर की जनता के प्रति अपने तकाजों को आज तक पूरा नहीं किया है। यही वजह है कि यह घाव आज तक रिस रहा है। कश्मीर अभी तक आजाद नहीं है। अब तक 6 लाख जानें जा चुकी हैं। आजादी को लेकर गीलानी के क्या खयालात हैं, इन पर संवाददाता अजय शर्मा ने उनसे बात की।

आपके लिए आजादी के क्या मायने रहे हैं? कितने पूरे और कितने अधूरे?हिंदोस्तान और पाकिस्तान 1947 में आजाद तो हो गए लेकिन दोनों ही इस बात के गुनहगार हैं कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के लिए आजादी के तकाजे पूरे नहीं किए हैं। क्या यही आजादी है जिसने जम्मू कश्मीर की एक करोड़ 30 लाख की अवाम को अब तक उनके हकूक से महरूम रखा है। उनके पैदायशी और बुनियादी हकों को दबा रखा है। जम्मू कश्मीर के पूरे खित्ते (इलाके) पर भारत का फौजी कब्जा है, जिसे दिल से कोई तस्लीम नहीं करता। क्या इसे ही आप आजादी कहेंगे। कश्मीर हिंदोस्तान का गुलाम है।

60 साल के भारत के सफर को आप किस नजर से देखते हैं?15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और अक्टूबर-नवंबर 1947 में भारतीय नेताओं ने कहा कि सभी मुसलमान जम्मू में इकट्ठा हो जाएं। जो पाकिस्तान जाना चाहता है उन्हें वहां से पाकिस्तान भेजने की व्यवस्था कर दी जाएगी। 5 लाख मुसलमान इकट्ठे हो गए और इसके बाद वहां भारतीय और डोगरा फौजों ने उन्हें गाजर-मूली की तरह काट दिया। इस तरह हमने अपनी आजादी की शुरुआत की। आजादी के बाद 5 लाख कश्मीरियों की जानें इसी आजादी को पाने की कोशिशों में गईं हैं और पिछले 17 साल में एक लाख कश्मीरी नौजवान और अफराद मारे जा चुके हैं। 10 हजार लोग भारत की जेलों में सड़ रहे हैं किसी न किसी आरोप की बिनाह पर। आजाद कश्मीरी को पिंजरे में कैदी की तरह ठूंस दिया गया है। यही आजादी है क्या? हां, ऐसे में तो मैं यही कहूंगा कि यह आजादी भारत के दूसरे राज्यों और उनके लोगों को तो मिली, मगर कश्मीरियों को नहीं और इन हालात में भारत को आजाद नहीं माना जा सकता।

तो, कश्मीर के इंटरेस्ट पूरे देश के नेशनल इंटरेस्ट से अलग हैं? मुझे लगता है कि पूरे भारत के एक अरब से ज्यादा लोगों को इंसानी बुनियाद पर अपनी लीडरशिप से यह कहना चाहिए कि आखिर कितना जुल्म जबर करोगे कश्मीरियों पर? पूछना चाहिए कि क्यों गुलामी कराना चाहते हैं? हालांकि मुझे मालूम है कि बदकिस्मती से हिंदोस्तान के लोग भी मानते हैं कि जम्मू कश्मीर हिंदोस्तान का ही हिस्सा है और यह हमारे नेशनल इंटरेस्ट का हिस्सा है। उन्हें लगता है कि कश्मीरियों के कोई इंटरेस्ट नहीं हैं।

क्या कश्मीर समस्या का कोई फौरी हल है आपके पास? आप समझते हैं कि कश्मीर अलग हो जाएगा? इस समस्या का हल सिर्फ कश्मीर की मेजॉरिटी के सेल्फ डिटर्मिनेशन में है। मैं कहता हूं कि कश्मीरियों को अपनी किस्मत का फैसला करने दीजिए, बस। और इसके बाद कश्मीर के बहुसंख्यक जो भी फैसला करें, उसे भारत और पाकिस्तान को मंजूर करना चाहिए। और इससे भी बड़ी बात मैं कहता हूं कि राइट टु सैल्फ डिटर्मिनेशन की मांग, सिर्फ कश्मीर के मुसलमानों के लिए नहीं है, यह कश्मीर के हिंदुओं, यहां के बौद्धों, सिखों और दूसरे सभी धर्मो के लोगों के लिए है। हालांकि जैसा कि आप पूछ रहे हैं कोई और हल या फौरी हल मुझे नहीं दिखता।

कश्मीर की लीडरशिप में तो कोई एक आवाज भी ऐसी नहीं सुनाई पड़ती, जिसे आप अक्सरीयत की आवाज कह सकते हों? हां, कश्मीर की लीडरशिप में जरूर इख्तिलाफात (मतभेद) हो सकते हैं लेकिन यहां की अवाम में कोई इख्तिलाफात नहीं हैं। कुछ लीडर जरूर यहां भारत के कब्जे को जायज मानते हैं तो कुछ कहते हैं कश्मीर न तो भारत का हिस्सा है और न पाकिस्तान का। कुछ सरकार में शामिल हैं तो कुछ बाहर रहकर अपना एहतेजाज (विरोध) दर्ज करा रहे हैं।

कश्मीर की आजादी की बात को आप भारत की आजादी के संदर्भ में क्यों रखते हैं? क्या आपका यकीन है कि कश्मीर दहशतगर्दी से आजाद कराया जा सकेगा? खुद हिंदुस्तान की तारीख (इतिहास) आप उठाएं तो पाएंगे कि एक तरफ गांधी जी अमन का पैगाम देते हुए अपना आंदोलन चला रहे थे और दूसरी तरफ भगत सिंह जैसे लोग थे, जिन्होंने ताकत का इस्तेमाल किया और आज वे आपके हीरो हैं। अगर हमारे कुछ नौजवान इन हालात में हथियार का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें दहशतगर्द कैसे कहा जा सकता है?

भारत और पाकिस्तान की आजादी के 60वें साल के मौके पर आपकी सबसे बड़ी तमन्ना क्या है? हमारी जद्दोजहद के भी 60 साल हो चुके हैं। और यह लिख लीजिए कि तारीख के हर दौर में जब भी ताकत और सदाकत (सच्चई) का मुकाबला होता है तो ताकत कभी नहीं जीती। लड़ाई के मैदान में अजरुन और कृष्ण के बीच हुई बातचीत इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है। कृष्ण ने कहा था कि अजरुन, हथियार उठाओ क्योंकि यह उसूलों की लड़ाई है, रिश्तों की नहीं। तो हम उसूलों के लिए लड़ रहे हैं। भारत ने यूएन में दस्तखत किए हैं, उन पर उसे अमल करना चाहिए। भारत अपनी फौजी ताकत और तशद्दुद (हिंसा) के बल पर कभी नहीं जीत सकता और न उसे ऐसा करना चाहिए। उसे उसूलों पर टिकना चाहिए।

सैयद अली शाह गीलानी जम्मू कश्मीर की जमायते इस्लामी के सदस्य सैयद अली शाह गीलानी कश्मीर आंदोलन का सबसे जाना माना चेहरा हैं। अपनी तकरीरों की वजह से ज्यादातर वक्त वे जेल में या नजरबंद रहते हैं। गीलानी कश्मीरियों के सैल्फ डिटर्मिनेशन की मांग के पुरजोर समर्थक रहे हैं और उन्होंने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से पीछा छुड़ाकर अपनी एक पार्टी की नींव डाली- तहरीके हुर्रियत जो ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का ही एक हिस्सा है। गीलानी सबसे बड़ी मुस्लिम संस्थाओं में से एक मुस्लिम वर्ल्ड लीग में शामिल किए जाने वाले पहले कश्मीरी भी हैं। गीलानी रीनल कैंसर के शिकार रहे हैं और उन्हें इलाज के लिए बाहर भेजने की डॉक्टरों ने सलाह दी थी। अमेरिका ने उन्हें इस आधार पर वीजा देने से इनकार कर दिया था कि वे हिंसा की निंदा करने में नाकाम रहे हैं। गीलानी इस्लामिक साहित्य, इतिहास और कविता से बेहद प्रभावित हैं। उन्होंने करीब 30 किताबें लिखी हैं।