बीकानेर:
जश्ने-आजादी के 60वें साल तक ये हाल हैं कि जिन लोगों ने आजादी दिलाई उन सेनानियों की आवाज सुनने के लिए कोई तैयार ही नहीं है। आजाद भारत में रहने का सुख भोग रहे लोगों में से किसी को भी इस बात से सरोकार नहीं है कि आजादी की लड़ाई कैसे लड़ी गई, किसने लड़ी और कितनी यातनाएं सही। उन लोगों को भी नहीं है जिनके पूर्वजों ने यह लड़ाई लड़ी और फिर आजादी के आंदोलन के सेनानी कहलाए। लिहाजा, राजस्थान राज्य अभिलेखागार में राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानियों के संस्मरणों की सीडी और पुस्तकों को खरीदने वाला कोई भी नहीं है।
अब तक सिर्फ छह स्वतंत्रता सेनानियों या उनके परिजनों ने इसे प्राप्त करने में रुचि दिखाई है जिन्हें अभिलेखागार की योजना के तहत मुफ्त में सीडी उपलब्ध करवाई गई है। इसके अलावा 60 रुपए की सीडी को खरीदने वाला कोई भी नहीं है। यही हाल संस्मरणों पर आधारित जन-आंदोलन ग्रंथमाला के 'राजस्थान स्वाधीनता संग्राम के साक्षी : कुछ संस्मरण' के तीन वॉल्यूम का है जिसे किसी ने भी नहीं खरीदा है।
विदित रहे कि राजस्थान राज्य अभिलेखागार ने 1982 में एक योजना 'ओरल हिस्ट्री वर्क' शुरू की जिसके तहत स्वतंत्रता सेनानियों के संस्मरणों की रिकार्डिग की गई। रिकार्डिग 246 ऑडियो टेप पर की गई थी। इसलिए बाद में उसे सुरक्षित करते हुए 303 सीडी बनवाई गई और इसी दौरान लिपिबद्ध करने का काम भी शुरू हुआ। अब तक इस योजना के तहत जन आंदोलन ग्रंथमाला के तहत उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, भरतपुर, अलवर करौड़ी, धौलपुर आदि के स्वतंत्रता सेनानियों के संस्मरण प्रकाशित किए गए।
राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डॉ. महेंद्र खड़गावत का कहना है कि इन सीडी व पुस्तकों की खरीद के प्रति किसी ने भी खास रुचि नहीं दिखाई है लेकिन हम इस कार्य को निरंतर संचालित कर रहे हैं। अभी बीकानेर और जयपुर के स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित दो वॉल्यूम और प्रकाशित होंगे। इसके अलावा अगर कोई और स्वतंत्रता सेनानी बच गए हैं तो उसे भी इस प्रक्रिया में शामिल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इन किताबों के लिए शैक्षणिक संस्थानों से संपर्क भी किया गया। अब हम इन किताबों के लिए एजेंट नियुक्त करने पर विचार कर रहे हैं।
कैसे हुआ यह काम: राजस्थान राज्य अभिलेखागार (आर्काइव्ज) को ओरल हिस्ट्री का काम देने के पीछे एक बड़ा कारण यह था कि यहां रियासतों के सारे दस्तावेज मौजूद थे। जाहिर है कि रियासतकाल में स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों की जानकारी भी यहां थी। इसलिए आर्काइव्ज को यह काम मिला ताकि स्वतंत्रता सेनानियों से पूछे जाने वाले प्रश्नों से दस्तावेजों में दर्ज बातों को मिलाया जा सके।
जिन्होंने दिखाई रुचि: सीडी लेने में रुचि रखने वालों में लक्ष्मीदास अथक के पौत्र सुरेश कुमार और गंगादत्त रंगा के पौत्र महेंद्रप्रकाश रंगा के अलावा स्वतंत्रता सेनानी हीरालाल रंगा और मूलचंद पारीक रहे। अलावा भूरा उर्फ भूरसिंह और वीरेंद्रसिंह हाडा को डाक के माध्यम से सीडी भेजी गई। आर्काइव्ज की योजना के तहत इन सभी को सीडी निशुल्क उपलब्ध करवाई गई क्योंकि ये स्वतंत्रता सेनानी या स्वतंत्रता सेनानियों के परिजन थे।
* राजनीतिक दलों का काम जनता में नागरिकता का भाव जगाना था, वे दूसरे प्रपंचों में लग गए। नौजवानों के लिए स्वतंत्रता बड़े ही विकृत रूप में सामने आई है। इस स्थिति में असली आजादी की कहानी कोई सुने भी तो क्यों। इसी तरह के हालात रहे तो देश में इस तरह के उत्सवों की अहमियत खत्म हो जाएगी। हमने क्या किया, यह महžवपूर्ण नहीं है। महžवपूर्ण यह जानना है कि वह समय कैसा था। हीरालाल शर्मा, स्वतंत्रता सेनानी
* स्कूल-कालेजेज में स्वतंत्रता की कहानी पढ़ाई जाती तो लोगों की रुचि बनती। आज के युवकों को यह पता तक नहीं है कि आजादी के लिए कितनी यातनाएं सहनी पड़ी थी। अभी तो ऐसी स्थितियां बढ़ेंगी। जागरूक लोगों को यह समझना होगा कि संकट का काल टला नहीं है। आजादी की कहानी नहीं सुनें तो न सही। कम से कम देश के प्रति नैतिकता का भाव तो आज की पीढ़ी रखे। मूलचंद पारीक, स्वतंत्रता सेनानी