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Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे:
गुलशन कुमार के सुपुत्र ने सुभाष घई की 'कर्ज' के दोबारा निर्माण के अधिकार खरीदे हैं और हिमेश रेशमिया के साथ सतीश कौशिक के निर्देशन में फिल्म बनाने जा रहे हैं। सुना है कि थीम संगीत के साथ ये अधिकार तीन करोड़ में खरीदे गए हैं। स्वयं सुभाष घई ने बिना कोई धन दिए हालीवुड की फिल्म 'रीइन्कारनेशन ऑफ पीटर प्राउड' से प्रेरित होकर 'कर्ज' बनाई थी, अत: सतीश कौशिक भी यही कर सकते थे परंतु उन्हें सुभाष घई को 'बधाई हो बधाई' के हादसे के एवज में अलग किस्म की 'कर्ज' अदायगी करनी थी। लोभान तो किसी और का जल रहा है, अत: आरती करने में क्या हर्ज है? देवता, भक्त और पुजारी तीनों ही प्रसन्न हैं।
मजे की बात यह है कि प्राय: सफल फिल्मों के पुन: निर्माण के अधिकार खरीदे जाते हैं परंतु 'कर्ज' को रुपए पर चवन्नी का लाभ मुंबई और हैदराबाद में हुआ था, अन्य क्षेत्रों में घाटा लगा था। फिरोज खान की 'कुर्बानी' ने सुभाषघई की 'कर्ज' को पीट दिया था। निर्माण के 25 वर्ष बाद भी 'कर्ज' की चर्चा लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्षी के गीत-संगीत के लिए की जाती है। क्योंकि उन्होंने माधुर्य रचा था। इसी फिल्म में किशोर कुमार का गीत 'ओम शांति ओम' सुपरहिट रहा था तो रफी साहब का 'दर्दे दिल जगाया आपने' भी कमाल था। इसी फिल्म के पाश्र्व संगीत में पिछले जन्म की याद लौटने वाले दृश्यों के लिए थीम संगीत रचा गया जो आज भी मन में गूंजता है। अब सतीश कौशिक की नई कोशिश का संगीत हिमेश रेशमिया रचेंगे। लक्ष्मी-प्यारे का माधुर्य इस बार नाक से गाया जाएगा। बतौर संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे की तुलना में हिमेश निहायत ही कमतर साबित होते हैं। आप आनंद बक्षी कहां से लाएंगे?
फिल्म उद्योग के सारे रीति-रिवाज उल्टे हैं। औघड़ गुरु का औघड़ ज्ञान, पहले भोजन फिर स्नान। सतीश कौशिश ने 'रूप की रानी', 'प्रेम' और बधाई हो बधाई जैसे विराट हादसे रचे हैं। दक्षिण की की कुछ फिल्मों को दोबारा बनाकर आंशिक सफलता सतीश को मिली है। अभी तक इस अच्छे हास्य कलाकार ने निर्देशन के क्षेत्र में कोई तीर नहीं मारा है परंतु इस औघड़ उद्योग में कुछ लोगों को हमेशा ही काम मिलता रहता है। दरअसल उद्योग में सितारों से मित्रता या उनका अकारण दिया प्रश्रय लोगों को काम दिलाता है। काबिलियत एकमात्र कसौटी नहीं है। बहरहाल सुभाष घई को 'कर्ज' के प्रदर्शन पर उतना मुनाफा नहीं हुआ, जितना प्रदर्शन के 25 वर्ष बाद पुन: निर्माण के अधिकार बेचकर हो रहा है।
फरहा खान ने शाहरुख के लिए पुनर्जन्म आधारित 'ओम शांति ओम' बनाई है और उनकी फिल्म का नाम 'कर्ज' के गीत से उन्हें मिला। फरहा की फिल्म का नायक अच्छा है परंतु असफल अभिनेता है और नए जन्म में खराब अभिनेता परंतु सफल सितारा है। 'कर्ज' का नायक नए जन्म में पुरानी शक्ल लेकर नहीं आया है परंतु पिछले जन्म की याद आती रहती है। मूल अंग्रेजी फिल्म में नायिका दोनों जन्मों में नायक को मार देती है। सुभाष घई ने अपने अंदाज से नए खलनायक सर जुडास का पात्र डाला था।
निर्मम, सनकी और कथा पर अनावश्यक रूप से थोपे खलनायक के पात्रों से सुभाष घई ने 'परदेश' और 'ताल' में मुक्ति पाई। राकेश रोशन की 'करण-अजरुन' में दोनों नायक नए जन्म में भाइयों के रूप में पैदा नहीं होते। इस फिल्म में उनकी मां का यह विश्वास कि 'मेरे बेटे आएंगे' फिल्म को लोकप्रिय भावना प्रधान आधार प्रदान करता है। हिंदुस्तानी सिनेमा में पुनर्जन्म आधारित फिल्मों की सफलता का आधार मधुर संगीत रहा है। कमाल अमरोही की 'महल', विमलराय की 'मधुमति' सुनीलदत्त और नूतन अभिनीत 'मिलन' चेतन आनंद की 'कुदरत' और घई की 'कर्ज' में मधुर संगीत प्रबल पक्ष रहा है।
दरअसल पुनर्जन्म अविश्वसनीय कथा है और मधुर संगीत के सेतु पर दोनों जन्मों की यादें मिलती रही हैं। संगीत तर्क को खारिज कर देता है। हम भारतीय लोग धरती से भोजन से और जीवन से इतना अधिक प्रेम करते हैं कि अपने मोह और भोग के कारण मरकर भी नहीं मरना चाहते और हमारी इसी कामना से पुनर्जन्म की अवधारणा का जन्म हुआ है। इसी कारण पुनर्जन्म फिल्में बनती हैं और अब उन कथाओं का भी पुनर्जन्म हो रहा है।