किरन बेदी देश की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर हैं साथ ही रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित अधिकारी भी। किरन पूर्व ऑल इंडिया और ऑल एशियन टैनिस चैंपियन भी हैं। फिलहाल ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट में डायरेक्टर जनरल के पद पर काम कर रहीं किरन बेदी को प्रिजन रिफॉम्र्स और पुलिसिंग में मानवीय दृष्टिकोण को अमल में लाने में योगदान करने पर डॉक्टर ऑफ लॉ की उपाधि भी मिली है। उनका कहना है कि यह हम भारतीयों की खासियत रही है कि हम कभी हिम्मत नहीं हारे और हम समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं। भास्कर के साथ बातचीत में इस बोल्ड पुलिस अफसर ने साफ कहा कि इन 60 सालों की सबसे बुरी बात यह रही कि बेईमानी हमारी जिंदगी का ढर्रा बन गया है।
अगर 60 सालों का अपना खाता देखें तो भारतीयों को इस दौरान सबसे बड़ी चीज क्या मिली?
हरेक को वोट का अधिकार और इस हथियार को समझने की ताकत। हालांकि जो नहीं मिला वह है चुनाव का हक। देश के हर आदमी के पास अपने वोट का इस्तेमाल करने का हक है लेकिन उसे यह पता नहीं कि इस हथियार का सही इस्तेमाल कैसे करे। कई जगह आज भी लैंडलॉर्ड और क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले लोग मौजूद हैं। और यह समझ लीजिए कि लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात नहीं है।दूसरी बात हमने देखा है कि देश के बहुत से लोग इसलिए वोट नहीं देते कि उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। क्योंकि उन्हें अपने आसपास कोई बेदाग नहीं मिलता तो वह पूछता है किसे वोट दे। तीसरी बात, उसे यकीन नहीं है कि अगर वह इनमें से किसी को चुनता है तो कहीं यह उसकी ही कमाई तो नहीं खा जाएगा। उसके दिए टैक्स से बनी सड़क में पैसा तो नहीं खा जाएगा। और एक दिन इतना बड़ा बन जाएगा कि उसकी सिक्योरिटी उसे उसके दरवाजे तक भी नहीं फटकने देगी।
लेकिन जो बुरे भी अगर चुने गए हैं, तो उनकी भी जिम्मेदारी इसी वोटर की ही तो है?
नहीं, लोकतंत्र ने वोटर को अधिकार तो दिया पर उसके पास च्वाइसेज नहीं हैं। कई बार लोग जबर्दस्ती थोपे गए हैं। अगर हमारी डेमोक्रेसी में यह नियम हो कि इतने फीसदी वोट नहीं लेते तो वे अनइलेक्टेड (अचयनित) ही रहेंगे। दूसरी बात एक और नियम जो हमें नहीं मिला है वह है राइट टु रिजेक्शन (यानी नकारने का अधिकार)। असली लोकतंत्र तब आएगा जब हमें यह हक भी मिलेगा कि हम बुरों को नकार पाएंगे अपना वोट देकर।
ऐसा क्यों नहीं किया जाता?
क्योंकि ये संशोधन सत्ता को सूट नहीं करते। क्योंकि इससे कई बार कुर्सी पर पहुंचे हुए कई लोगों को यह खतरा हो जाएगा कि वे फिर नहीं आ पाएंगे।कई बार विधानसभाओं में जो हंगामे हम देखते हैं वह कतई शोभनीय नहीं हैं।
तो क्या हमने लोकतंत्र के रूप में कुछ भी हासिल नहीं किया?
किया है लेकिन उससे ज्यादा गंवा दिया है। हम एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो दो पीछे रख देते हैं। हमारे लोकतंत्र की सबसे बुरी बात यह हुई है कि इसमें से डायलॉग (संवाद) खत्म होता गया है। हम बायकाट बढ़ा रहे हैं, डायलॉग घटा रहे हैं। हम विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं और ऐसे में कुछ लोग कंप्रोमाइज (समझौते) कर रहे हैं।
इन 60 सालों में ऐसा क्या है जिसे सोचकर खुशी होती है, संतोष होता है?
सबसे अच्छी बात यह है कि सरकारी करप्शन के बावजूद हम समृद्धि की ओर जा रहे हैं और इसे कोई रोक नहीं सकता। इंडियननैस यही है कि हम कभी हिम्मत नहीं हारे हैं। हमने धीरे-धीरे देश को खड़ा कर ही लिया है। और इसमें खास बात है आईटी क्रांति, जिसे नौजवानों ने बेहद ईमानदारी के साथ आगे बढ़ाया। ये जो कंप्यूटर्स हैं दिमागी मशीनें हैं, इनके इस्तेमाल के साथ हमारी स्थितियां बदलीं। सरकार ने भी इसका अनुसरण किया और कहीं-कहीं पहल भी की। हालांकि ज्यादा श्रेय हमारे नौजवानों को है। इसमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नेहरू के दौर में आईआईएम और आईआईटी के लिए किया गया इन्वेस्टमेंट ही अब काम आ रहा है। यह मूवमेंट और आगे बढ़ेगा।
और क्या ऐसा है जिसे हमारी नाकामी की सबसे बड़ी वजह मानना चाहिए?
भ्रष्टाचार है वह। आम आदमी के लिए कोई श्योरिटी नहीं दे सके हैं हम। उसका चाहे जितना छोटा काम भी क्यों न हो, वह इस बात को लेकर तय नहीं है कि उसे रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी। हर काम के लिए उसे बैसाखी ढूंढनी पड़ती है। बेईमानी हमारी वे ऑफ लाइफ (जिंदगी का ढर्रा) हो गई है।
कैसे मिल सकती है निजात बेईमानी के चरित्र से?
एक रास्ता मुझे सूझता है। हमारे देश में एक आंदोलन हो कि हर अफसर, मंत्री, सांसद, नेता और सुपरवाइजर स्तर पर मौजूद लोग अपना दिन दफ्तर से नहीं जनता से शुरू करे। रोज सुबह 9 बजे से 11 बजे तक वह पब्लिक बसों में यात्रा करे, ट्रेन के जनरल क्लास में बैठकर जाए, पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करे, दफ्तरों में घूमे, बैंकों में जाए, दूरदराज के थाने में जाकर देखे तो उसे पता चलेगा कि इस देश का आम आदमी क्या मुश्किलात झेल रहा है। तब उसे पता चलेगा कि कहीं सड़क टूटी है, कहीं पानी नहीं है, कहीं कोई उससे घूस मांग रहा है, कहीं बिजली नहीं आई, कहीं माली नहीं, तो कहीं पार्को पर कब्जे हैं। तब उसे कागजी रिपोट्र्स की जरूरत नहीं पड़ेगी।अपने कामकाज के दौरान मैंने यही किया है एक आम आदमी बनकर देखा है और यही वह सीक्रेट है जिससे मुझे पता चल जाता था कि तिहाड़ में किसी को खाना नहीं मिला है तो किसी को दवा। कहां कौन नशे की गिरफ्त में है। ट्रैफिक में थी तो रोज घूमती थी, डीटीसी बसों में चढ़कर देखती थी कि कहीं जेबकतरा मेरी जेब ही तो साफ नहीं कर रहा। कागजी रिपोर्ट के बदले इस फस्र्ट हैंड अनुभव का कोई बदल नहीं हो सकता।
भारतीय पुलिस सिस्टम बरतानवी हुकूमत के चरित्र को नहीं छोड़ सका। पुलिस आज भी अपने चरित्र में रूलर ही दिखती है, दोस्त नहीं। कहां तक ठीक लगती है यह बात?
क्योंकि हमने पुलिस रिफॉम्र्स को प्राथमिकता नहीं दी। पुलिस, कचहरियां और हमारी जेलें भीड़ से टूट रहे हैं। हमने साधन नहीं जुटाए और इस पर भी अगर कोई कोशिश सामने आई भी तो हमने उसका क्या हश्र किया इसका सुबूत है पिछले साल 22 सितंबर को आया सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट। पूरी कोशिश चल रही है कि कैसे हम उसे गोलमोल कर दें और लागू न होने दें। क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट के इस जजमेंट पर अमल शुरू हुआ तो फिर पुलिस स्टेशन से लेकर ऊपर तक सभी नियुक्तियां अफसरों के हाथ से निकल जाएंगी और उनकी मनमानी खत्म हो जाएगी। तब नियुक्तियां भी इस्टेब्लिशमेंट बोर्ड ही करेगा। तब एक ही अफसर तफ्तीश और कानून और व्यवस्था सभी का काम नहीं संभालेगा। राज्य ऐसा एक्ट बनाने में लगे हैं कि इस जजमेंट पर अमल न हो सके। मुझे डर है कि कहीं बाद में यही न कहा जाए कि 1861 का पुलिस एक्ट ही इससे बेहतर था।
तमाम परेशानियों और मुश्किलों के दौर से गुजरने के बाद भी हमने आजादी के बाद अपने सफर में कुछ टर्निग प्वाइंट्स स्थापित किए हैं? क्या लगता है आपको?
इन्फॉर्मेशन टैक्नोलॉजी की क्रांति एक बड़ा मोड़ है और साथ ही साइंस एंड टैक्नोलॉजी के जरिए हम स्पेस एज की ओर जा रहे हैं। नौकरियां बढ़ीं, कम्यूनिकेशन्स बढ़ा, मोबाइल टैक्नोलॉजी हमें और आगे ले गई। फिर हमारी हिम्मत ने, खोजने की प्रवत्ति ने हमें आगे बढ़ाया। और इन सबसे ऊपर हमारा परिवार है। परिवार हमारी ताकत है, जिसने शिक्षा दिलाने में अहम रोल निभाया है। हमारी कृषि पिछड़ रही है, बेईमानी बढ़ रही है। ये भी टर्निग प्वाइंट्स हैं।
किरन बेदी
1970 में पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद अमृतसर की रहने वाली किरन बेदी ने पुलिस ज्वाइन की लेकिन पढ़ाई फिर भी जारी रखी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1988 में लॉ की डिग्री ली। आईआईटी नई दिल्ली ने उन्हें 1993 में पीएचडी की डिग्री अवार्ड की। वह नई दिल्ली की ट्रैफिक कमिश्नर रही हों या मिजोरम जैसे हिंसाग्रस्त इलाके में डीआईजी, चंडीगढ़ के गवर्नर की सलाहकार, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो में डीआईजी या फिर यूनाइटेड नेशन्स में असाइनमेंट पर, हर जगह किरन बेदी ने अपने तेवर और काम के तरीकों से अलग पहचान कायम की। पार्किग वायलेशन करने पर उन्होंने प्रधानमंत्री की गाड़ी को भी क्रेन से उठवा दिया था और इसीलिए उन्हें क्रेन बेदी भी कहा जाने लगा। दिल्ली में तिहाड़ जेल की आईजी के नाते उनके काम को खासतौर पर याद किया जाता है। वहां उन्होंने जेल सुधार के कई तरीके अपनाए। उनके द्वारा स्थापित दो एनजीओ नवज्योति और इंडिया विजन फाउंडेशन गरीबों और ड्रग एडिक्शन से जूझ रहे लोगों को मदद मुहैया कराती हैं। उनकी संस्थाओं को यूनाइटेड नेशन्स की ओर से सर्ज सॉइटीरॉफ मैमोरियल अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। सरकारी सेवा के लिए 1994 में रैमन मैगसेसे अवार्ड जीतने वाली किरन बेदी को उनके योगदान के लिए ढेरों पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें प्रेसीडेंट गैलेंट्री अवार्ड (1979), वीमेन ऑफ द ईयर (1980), एशिया रीजन अवार्ड फॉर ड्रग प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (1991), महिला शिरोमणी अवार्ड (1995), फादर मैचिस्मो ह्यूमनेटेरियन अवार्ड (1995), प्राइड ऑफ इंडिया (1999) और मदर टैरेसा मैमोरियल नेशनल अवार्ड फॉर सोशल जस्टिस (2005) आदि शामिल हैं।