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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोमवार को लोकसभा में एटमी करार पर जो बयान दिया, उसमें नया कुछ नहीं है। इसलिए न तो भाजपा के नेतृत्व वाले विपक्ष के रवैये में बदलाव आया है और न ही यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वाम दल नरम पड़े हैं। प्रधानमंत्री ने कहा है कि 123 परमाणु करार हमारी संप्रभुता या सैन्य क्षमता को सीमित नहीं करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जरूरी हुआ तो भविष्य में परमाणु परीक्षण करने का फैसला लेने का अधिकार भारत के पास है। उन्होंने यह विश्वास भी दिलाया कि इस करार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो राष्ट्र की सुरक्षा को लेकर किसी तरह सरकार के हाथ बांध सके।
प्रधानमंत्री ये सारी बातें कुछ दिनों पहले कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में भी कह चुके हैं। फर्क सिर्फ इतना ही है कि इस बार उन्होंने यह बात संसद में कही है। और यह फर्क न तो विपक्षी भाजपा के लिए मायने रखता है और न ही सहयोगी वामपंथियों के लिए, क्योंकि बात तो वही है, सिर्फ कहे जाने की जगह बदल गई है। अगर इस बयान से संतुष्ट होना होता, तो वे पहले ही हो जाते।
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री का आश्वासन सच से परे है या फिर सिर्फ 'विरोध के लिए विरोध' की राजनीति हो रही है। वैसे जहां तक प्रधानमंत्री की बात है वे पार्टी फोरम से लेकर संसद तक में जब एक ही बात को कह रहे हैं तो जरूर उसमें दम होगा। उनकी आवाज में जो आत्मविश्वास है, वह भी यही कहता है कि करार में देश के हितों के खिलाफ कुछ नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि करार का विरोध करने वालों की चिंता बेवजह है। वामपंथी तो सदा से ही अमेरिका विरोधी रहे हैं, लेकिन भाजपा ने एनडीए सरकार के दौरान खुद महसूस किया होगा कि अमेरिका किस तरह हमारी रीति-नीति में दखल देने की कोशिश करता रहता है।
सब जानते हैं कि अमेरिका बिना किसी करार के ही हमें अपनी अंगुलियों पर नचाने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि करार के हथियार से लैस हो जाने के बाद दुनिया के दारोगा का हमारे प्रति व्यवहार कैसा रहेगा। हालांकि हर तरह की मुश्किलों से निपटना भारत को आता है, लेकिन देशवासी कोई ऐसा करार मंजूर नहीं करेंगे, जिसमें हमारी संप्रभुता पर जरा भी आंच आती हो। इस करार में ऐसा कुछ नहीं है, यह विश्वास सरकार को ही दिलाना होगा। भाजपा और वामपंथियों से ज्यादा देश की जनता को इस भरोसे की दरकार है। भरोसा कैसे दिलाना है, यह सरकार को ही सोचना है, क्योंकि सिर्फ बयानों से तो विश्वास पैदा होता नजर नहीं आ रहा है।