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डिक्टेटरशिप और 'डंडा' जरूरी : ओम पुरी

मुंबई : कई पुरस्कारों से सम्मानित ग्लोबल इमेज वाले अभिनेता ओम पुरी का मानना है कि चूंकि हमने आजादी के लिए खून नहीं बहाया और हम आजाद हिंदोस्तान की पैदाइश हैं इसलिए हमें पता नहीं है कि आजादी का मतलब क्या है। और हमें आजादी की कीमत समझाने के लिए 'डंडा' बहुत जरूरी है। आजादी के बाद से अब तक हिंदोस्तान की कामयाबी और नाकामियों पर भवेश दिलशाद के सवालों के जवाब देते हुए ओम पुरी ने कहा कि देश के हालात फिलहाल ऐसे हैं कि डिक्टेटरशिप जरूरी विकल्प दिखता है।

आजाद हिंदोस्तान ने 60 सालों में क्या पाया, क्या खोया?

काफी कुछ पाया है और अभी काफी कुछ पाना बाकी है। यह हमारी उपलब्धि ही है कि हिंदोस्तान को दुनिया भर में आज इज्‍जात की नजरों से देखा जाता है। यह प्रगति हमने अपनी काबिलियत की दम पर की है। हमारे देश के ढेरों प्रशिक्षित और योग्य युवा आज विदेश जाकर नाम कमा रहे हैं और साथ ही देश का नाम भी ऊंचा कर रहे हैं। लेकिन, यही हमारा दुर्भाग्य भी है कि वे विदेश जा रहे हैं। अपने देश में ही रहकर अपनी योग्यता का इस्तेमाल कर पाने को लेकर उन्हें भरोसा नहीं हो पा रहा है।

तो, यह पलायन रोकने के लिए क्या किया जाए?

सरकार को चाहिए कि वह उन्हें यहां सुविधाएं मुहैया कराए। समाज का फर्ज है कि एक अच्छा माहौल दे और हमारे पूरे सिस्टम को इतना सक्षम होना चाहिए कि वह उनकी योग्यता की सही कीमत उन्हें अदा करे। पलायन सिर्फ इसी स्तर पर नहीं हो रहा है, आप देखिए गांवों से लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं क्योंकि वहां बिजली, पानी, मकान और सड़कें नहीं हैं। इस पलायन से शहरों की हालत खराब हो रही है। शहरों की मूल समस्या हो गई है गंदगी।

इसका दुष्परिणाम?

इसका नतीजा बहुत खतरनाक है क्योंकि गांवों की भीड़ रोजगार और अपनी सामान्य सी जरूरतें पूरी करने के लिए शहरों में दाखिल हो रही है। इससे अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ रहा है। फिर जब एक शख्स के पास रोटी, कपड़ा, मकान नहीं है और वह अय्याशी के तमाम सामानों का इस्तेमाल करते लोगों को देखता है तो उसके मन में कई इच्छाएं पनपती हैं और यही इच्छाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि वह उन्हें पूरा करने के लिए कुछ भी करने को उतारू हो जाता है। यानी क्राइम बढ़ता है।मामूली सी बात है कि एक आतंकवादी बनने से पहले हर युवक को मालूम होता है कि वह जिस राह पर जा रहा है वहां उसकी जिंदगी हर पल खतरे में है। लेकिन रोटी, कपड़े और परिवार की थोड़ी सी खुशहाली के लालच के सामने वह मजबूर हो जाता है। हमारे यहां हवाई विकास तो खूब हो रहा है लेकिन जमीन अब भी या तो सूखी पड़ी है या फिर आंसुओं से तरबतर है। बातें बहुत की जा सकती हैं लेकिन सच यह है कि गांवों की हालत बहुत खराब है।

भारत में एक स्वस्थ चरित्र का निर्माण नहीं हो पाने के क्या कारण हैं?

हुआ यूं कि जिस पीढ़ी ने आजादी के लिए आहूति दी थी, वह तो अब रही नहीं। हमें आजादी विरासत में मिल गई इसलिए हमारे दिल में उसके लिए कोई कद्र नहीं है। हमारे इतने ढीठ और बेशर्म होने के पीछे एक वजह यह है कि हमारे ऊपर कोई सख्ती भी नहीं की जाती, किसी 'डंडे' का हमें खौफ नहीं है। और हिंदोस्तान में अगर कोई चरित्र नहीं बन सका तो इसका कारण सामाजिक सुरक्षा का न होना भी है। गरीब तबके के लिए भी और मध्यम वर्ग के लिए भी। अब अगर एक सरकारी मुलाजिम को कुछ हजार रुपए की तनख्वाह दी जाए और कानूनन दो बच्चों का परिवार पालने का हक भी तो उसके पास करप्शन एक सीधा सा विकल्प है।

इस सिस्टम में कैसे सुधार लाया जाए?

मुझे लगता है कि हिंदोस्तान में अब डिक्टेटरशिप होना चाहिए। डिक्टेटरशिप से नुकसान ही होता है, ऐसा नहीं है, कई मुल्कों ने तरक्की भी की है। या फिर, जैसा कहा जाता रहा है, एक रास्ता और भी है। अगर एक आदमी जनता का हमदर्द हो तो लोकतंत्र में उसे चुनिए और उसे सारे फैसले करने के हक दीजिए, यानी प्रेसिडेंशियल रूल। अकबर और औरंगजेब दो बादशाहों की मिसाल लीजिए। दोनों के पास ताकत थी और एक, जनता का हमदर्द था और एक नहीं।एक बात और बहुत गलत है, ये जो ओबीसी और दूसरी जातियों को आरक्षण देने के मुद्दे हैं, ये सिर्फ वोटों के लिए हैं। सीधी सी बात है कि हमारे देश में सिर्फ दो ही क्लास हैं : अमीर और गरीब। तीसरा कोई क्लास नहीं है। मेरे दोस्त के बेटे को 86 प्रतिशत के बावजूद उस कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला जिसमें मेरी नौकरानी के बेटे को 46 प्रतिशत पर मिल गया? ऐसा करके सिर्फ हीन भावना को ही बल दिया जा रहा है। वह बच्च जिसे आप जातिगत आरक्षण देते हैं, वह कितना ही काबिल क्यों न हो, हर मुकाम पर उसे यही सोचना पड़ेगा कि उसे यह सब कुछ एक अछूत होने की वजह से मिला है। एजुकेशन स्वस्थ होना चाहिए।

पिछले कुछ समय से बच्चों को स्कूल में सैक्स शिक्षा दिए जाने का मुद्दा गरमाया हुआ है, क्या ऐसा करना सही है?यदि हां तो किस सलीके से दी जाए सैक्स शिक्षा?

बिल्कुल दी जाना चाहिए। सैक्स एजुकेशन बहुत जरूरी है। मैं आपको अपना उदाहरण देता हूं। जब हम 6वीं कक्षा में थे तब मेंढक के प्रजनन के बारे में कुछ पढ़ते थे और हम बड़े संदेह में रहते थे। फिर दूसरे जानवरों को देखते थे तो हम उन्हें मारते थे क्योंकि हमें वे मुद्राएं हिंसा का ही बोध कराती थीं। मां से पूछते थे कि हम पैदा कैसे हुए तो, वे कहती थीं कि भगवान ने पैदा किया। एक उम्र होती है 7—8 साल की जब शरीर में परिवर्तन होना शुरू होते हैं। बच्चों की जिज्ञासाओं का सही जवाब दिया जाना जरूरी है। वह मर्यादित रहे लेकिन किसी भी किस्म की भ्रांति बच्चों में डालना या गलत जानकारी देना, वाकई बहुत खतरनाक हो सकता है।

टीवी क्या कर रहा है और क्या करना चाहिए?

यह कहना गलत होगा कि फलां चैनल बंद कर देना चाहिए या यह नहीं दिखाना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदारी समझकर उनके समानांतर अच्छे मूल्य दिए जाएं। सरकार या निजी क्षेत्र से कुछ लोग आएं और इन खराब मूल्यों के मुकाबले में बेहतर चैनल खड़े करें। नई पीढ़ी की नजरों से कुछ बचता नहीं और यह हमारा दायित्व है कि उसे सही और गलत मूल्य का फर्क समझाया जाए।

यह कैसा बदलाव है कि आपकी पीढ़ी के बचपन ने टीबी जैसी बीमारी का प्रकोप झेला, हमारे बचपन के सामने कैंसर की भयावहता सामने रही और आज का बचपन एड्स से दो चार है?

रिसर्च जो कहे सो ठीक है लेकिन मुझे लगता है कि प्रकृति के अपने कुछ नियम हैं। अगर उसके साथ अनुचित छेड़छाड़ की जाएगी या फिर गलत बर्ताव होगा तो कई तरह की मुसीबतें आती ही हैं। फिर कुदरत हो या मानव शरीर, दोनों ही प्रभावित होते हैं। हां, इससे बचने के लिए रास्ता वही है कि सही और जरूरी एजुकेशन हम बच्चों को दें।

बचपन के मन में जो बात रह जाती है, वह रहती ही है। ऐसा हुआ होगा कि आप भी आजादी के दीवानों में से किसी एक से काफी प्रभावित रहे होंगे। आजादी की लड़ाई का कौन सा हीरो आपका पसंदीदा है?

भगत सिंह। और वह इसलिए कि अंग्रेज उन्हें भले ही आतंकवादी कहें लेकिन उनके अपने उसूल थे। उन्होंने किसी निर्दोष के लिए हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने और जलियांवाला बाग हत्याकांड के दोषियों को सजा देना मुनासिब था और भगत सिंह ने पार्लियामेंट में जो बम फोड़ा था उसका मकसद सिर्फ बहरों को इंकलाब की आवाज सुनाना ही था। मैं मानता हूं कि महात्मा गांधी का योगदान काफी है लेकिन कभी कभी सोचता हूं कि अगर उन्हें भी भगत सिंह की तरह 20 साल की उम्र में रिएलाइजेशन होता तो शायद उनके तेवर भी काफी अलग होते।

जी, आजादी के बाद का हीरो किसे तस्लीम करेंगे?

यह कहना तो काफी मुश्किल है। ... मेरे हिसाब से आजादी के बाद के सबसे बड़े हीरो वे लोग हैं जो ईमानदारी से अपने फर्ज निभा रहे हैं फिर चाहे वे पुलिस में हों, प्रशासन में हों या सरकार में या कहीं और। यह दुर्भाग्य है कि इनकी संख्या बहुत ही कम है।

अभी हमारे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

बिल्कुल जमीनी बात वही है कि हमारे अंदर देशभक्ति की भावना दृढ़ और सही स्वरूप में है ही नहीं। हमें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं है वजह वही कि हमारे अंदर कानून का कोई डर नहीं है। कानून ऐसा हो कि कोई भी अमीर या रसूखदार बच न पाए। न्याय जल्दी मिले, गरीबों के तलवे न घिस जाएं।

15 साल बाद यानी आजादी की 75वीं सालगिरह पर आप कैसा भारत देखना चाहेंगे यानी आपका विजन 2022?

मैं जैसा चाहता हूं, वैसा तो संभव लगता नहीं। इसलिए कि हमारे यहां विपक्ष की भूमिका बेहद निराशाजनक है। गलत काम रोकना विपक्ष का फर्ज है लेकिन वह अगली बार अपनी सरकार बनाने के चक्कर में सही कामों में भी अड़ंगा डाल देता है। मेरे हिसाब से हम अभी जहां हैं तब भी यहां से बहुत दूर नहीं होंगे, कहीं आसपास ही मंडरा रहे होंगे। शायद आबादी, बिजली, बाढ़, सूखा यह सब समस्याएं तब भी होंगी क्योंकि अब तक कोई प्लानिंग ही नहीं है।

ओम पुरी, एक परिचय: 18 अक्टूबर 1950 को अंबाला में जन्मे ओम पुरी हिंदी सिनेमा की आर्ट और कमर्शियल दोनों ही धाराओं में कामयाब अभिनेता हैं। इसके अलावा ब्रिटिश और अमेरिकन फिल्मों में भी उनकी अनूठी पहचान है। वे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीटच्यूट ऑफ इंडिया से ग्रेजुएट होने के साथ ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से 1973 बैच के पासआउट हैं और वे और नसीरुद्दीन शाह बैचमेट रहे हैं। कई बेहतरीन निर्देशकों के साथ काम कर चुके ओम पुरी को अधर्ंसत्य और आरोहण में भूमिका के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और आक्रोश में अभिनय के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। ईस्ट इज ईस्ट में भूमिका के लिए उन्हें ब्रिटिश ऑस्कर कहे जाने वाले बाफ्टा अवॉर्ड में भी नामांकित किया गया था। जुलाई 2004 में उनके अंग्रेजी फिल्मों में योगदान के लिए ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एंपायर से नवाजा गया। कई ऑस्कर जीतने वाली रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में भी पुरी ने एक भूमिका निभाई।

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