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अजमेर: एडीजे बाबूलाल वैष्णव के बेटे राकेश रामावत के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अमल में लाने का फैसला राजस्थान आरपीएससी प्रशासन ने राज्य के विधि और कार्मिक विभाग पर छोड़ दिया है। प्रकरण की तथ्यात्मक रिपोर्ट दोनों महकमों को भेज दी गई है।
आरपीएससी सचिव रमेशकुमार जैन ने सोमवार को बताया कि राकेश ने आरजेएस परीक्षा में ओबीसी के अभ्यर्थी के रूप में आवेदन किया था और ओबीसी के लिए तय परीक्षा शुल्क 100 रुपए का पोस्टल आर्डर नत्थी किया था। आरजेएस में सलेक्शन रद्द होते देख उसने सामान्य वर्ग में सलेक्ट करने की प्रार्थना भी की थी, लेकिन आरपीएससी का नियम है कि आवेदन जमा कराने की आखिरी तारीख तक पर्याप्त परीक्षा शुल्क जमा नहीं होने पर आवेदन रद्द कर दिया जाता है। इसलिए राकेश का सलेक्शन रद्द कर दिया गया।
ऐसे प्रकरणों में संबंधित विभाग को तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजी है और विभाग ही तय करते हैं कि विधिक कार्रवाई अमल में लाई जाए या नहीं। आरपीएससी खुद इस मामले में विधिक कार्रवाई क्यों नहीं करता? इस सवाल पर सचिव का कहना था कि आरपीएससी ने माना है कि राकेश ने गलत प्रमाण पत्र के आधार पर फायदा उठाने की कोशिश की, जिससे आरपीएससी भ्रमित हुआ। दोनों महकमों को तथ्यात्मक रिपोर्ट भेज दी है। कार्रवाई का फैसला उन्हीं को करना है।
पाली बनाम जयपुर: एडीजे बाबूलाल वैष्णव पाली के सोजत कस्बे के पास ऊटबड़ा गांव के रहने वाले हैं, लेकिन राकेश ने ओबीसी प्रमाण पत्र जयपुर का प्रस्तुत किया। आरपीएससी सचिव ने बताया कि राकेश ने जानकारी दी थी कि वह 1994 से 2002 तक जयपुर में ही रहा और वहीं पढ़ा, इसीलिए जयपुर का प्रमाण पत्र दिया। राकेश रामावत का जन्म 16 मार्च 1980 का है। इस हिसाब से 1994 में उसकी उम्र 14 वर्ष थी। आरपीएससी सचिव जैन ने बताया कि राकेश के जवाब के मुताबिक उसके बाबूलाल वैष्णव वर्ष 1981 से 1989 तक सहायक लोक अभियोजक थे।
1989 से वर्ष 1997 तक वे मुंसिफ मजिस्ट्रेट रहे, 1997 से 2002 तक अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रहे और वर्ष 2002 से वे एडीजे हैं। अर्थात वे मुंसिफ मजिस्ट्रेट बनते ही क्रीमी लेयर में आ गए थे। क्रीमीलेयर में आने के बावजूद यह तथ्य छुपाकर प्रमाण पत्र बनवाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।