|
News
International International
न्यूयार्क. पुरुष आदतन एक से अधिक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा रखते हैं। उनकी जेनेटिक संरचना उन्हें अपने जीन्स को ज्यादा से ज्यादा फैलाने को प्रेरित करती है। दूसरी ओर माना जाता है कि महिला की संरचना ऐसी होती है कि वह अपने जीवन में सिर्फ एक पुरुष साथी चाहती है जो उसके साथ जीवन बिताए और बच्चों के पालन-पोषण में मदद करे।
एक सवाल : इस सब के बीच एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि पुरुष के सेक्स पार्टनर अधिक होते हैं या महिला के। इसका जवाब खोजने के लिए कई देशों में समय-समय पर विभिन्न सर्वे किए जाते रहे हैं। लगभग सभी में यही निष्कर्ष निकला कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के सेक्स पार्टनर ज्यादा होते हैं। इसके उलट गणितज्ञों का मानना है कि ऐसे निष्कर्ष तार्किक रूप गलत हैं।
क्या कहते हैं सर्वे:
सर्वे-1- अमेरिकी सरकार के एक नवीनतम सर्वे के मुताबिक पुरुष के महिला सेक्स पार्टनरों की औसतन संख्या सात होती है जबकि महिला के पुरुष सेक्स पार्टनरों की औसतन संख्या चार।
सर्वे-2- ब्रिटिश शोधकर्ताओं के अनुसार पुरुष अपने जीवनकाल में औसतन 12 महिलाओं से शारीरिक संबंध रखता है जबकि एक महिला 6 पुरुषों से। गणितज्ञों के तर्क : कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर डा. डेविड गैल के अनुसार ऐसे निष्कर्ष तर्कसंगत कारणों से गलत हैं। इसे प्रमाणित करने के लिए उन्होंने हाईस्कूल की प्रॉम थ्योरम का उदाहरण दिया।
गैल फामरूला : मान लीजिए कि किसी पार्टी के बाद वहां मौजूद प्रत्येक लड़की से पूछा जाए कि उसने कितने लड़कों के साथ डांस किया। प्रत्येक लड़की द्वारा बताई गई संख्या को जोड़ कर जो संख्या सामने आई उसे पहचान के लिए 'जी' नाम दे दिया। वहां मौजूद लड़कों से भी यही पूछा गया और उनकी बताई संख्या के जोड़ को 'बी' नाम दिया गया।
थ्योरम है : 'जी' = 'बी'
सिद्ध हुआ : 'जी' + 'बी' ='सी' ('सी'-पार्टी में डांस करने वाले कुल जोड़ों की संख्या।) साथ में यह भी : गैल ने संभावना जाहिर की कि सर्वे के दौरान पुरुष खुद को बढ़ा-चढ़ा कर बता सकते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि उनके सेक्स पार्टनरों की संख्या अधिक से अधिक होनी चाहिए। दूसरी ओर महिलाएं असल संख्या को भी कम करके बताएंगी, क्योंकि वे जताना चाहेंगी कि वे कम से कम पुरुषों से संबंध स्थापित करने में विश्वास रखती हैं। गैल ने कहा कि ऐसे सर्वे में वेश्याओं जैसे वर्ग को शामिल ही नहीं किया जाता। इसलिए इनके निष्कर्षे पर विश्वास नहीं किया जा सकता।