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बड़े बदलाव का जरूरतमंद है पाकिस्तान

यह मौका तो खुशी का है पाकिस्तान के लिए कि आजादी की फिजा में 60 साल पूर कर लिए हैं उसने लेकिन खुशी से ज्यादा जरूरत है कि वह अपने इस सफर पर गौर jinnahकर और कुछ अहम कौल कर, अपनी खुशहाली और तरक्की के लिए। एक नजर देखते चलते हैं पाकिस्तान के बीते 60 सालों का सफर..

मुस्लिम लीग का एक कद्दावर चेहरा अब भी सबके जहन में ताजा है, मोहम्मद अली जिन्ना। पाकिस्तान के जन्मदाता भी और जिम्मेदार भी। यह सच है और इस सच को बड़ी गंभीरता और मजबूती के साथ बयान किया है कमलेश्वर ने अपनी किताब 'कितने पाकिस्तान' में कि 'पाकिस्तान शायद दुनिया का इकलौता मुल्क है जो मजहब के नाम पर बना।' वह भी एक मुल्क के विभाजन की त्रासदी के साथ। अब इस एक वाक्य का कितना बड़ा अर्थ निकलता है, इस पर एक संक्षिप्त सा विचार करना बहुत जरूरी है, हर पाकिस्तानी के लिए। एक शायर और विचारक ने कहा था कि 'मजहब के नाम पर मस्जिदें, मंदिर और गिरजे तो बन सकते हैं लेकिन एक मुल्क इस हवाले से बनने का मतलब है कि उसकी दुनिया छोटी हो गई है और उसने अपने पर खुद कतर लिए हैं।'

अब जब कि पाकिस्तान अपनी आजादी के साठ साल पूर कर रहा है तब मीडिया में कई जगह प्रकाशित आलेखों और रिपोर्टो से जो बात खुलकर सामने आ रही है वह यह कि जो सपने देखे थे, जिन्हें पूरा करना था वे तो पूर हुए नहीं बल्कि हालात और ज्यादा पेचीदा हो गए हैं। 1947 से अब तक पाकिस्तान में लोकतंत्र खुशहाल नहीं है। यह उसकी सबसे बड़ी हार है। 1948 में कायदे आजम जिन्ना नहीं रहे और अपने पीछे छोड़कर गए कम लोकप्रिय और सत्ता के भूखे नेताओं की भीड़। ये नेता एक संविधान बनाने में भी नाकाम रहे। विफलता का नमूना यह कि पाकिस्तान में पहला आम चुनाव सही मायनों में आजादी के 23 साल बाद 1970 में हो सका। इससे पहले भी दो एक बार चुनाव हुए लेकिन उनका कुछ नतीजा नहीं निकला और सत्ताधारियों ने उन चुनावों को मानने से इंकार किया। नौकरशाही और सेना शुरू से ही पाकिस्तान में हावी रहे। नौकरशाही तो और ताकतवर होती गई। वह वक्त तो ऐसा था कि दस सालों में ही पाकिस्तान ने 12 प्रधानमंत्री देखे। कुल मिलाकर सैन्य शासन ही पाकिस्तान की बदकिस्मती बनकर रह गया क्योंकि न तो कुछ खास विकास हो सका और न ही जनता का कुछ भला।

जनरल जिया उल हक के वक्त में तो सेना अधिकारी और ताकतवर हुए साथ ही उन्होंने अपनी राजनीतिक पैठ भी बनाना शुरू किया। कुल मिलाकर पाकिस्तान में दस से पंद्रह साल छोड़कर पूर समय सैन्य शासन रहा है और सभी मुख्य फैसले एक सैन्य तानाशाह द्वारा लिए जाते रहे। दूसरी तरफ पूर मुल्क में मजहब के प्रति कट्टरता फैलाने के लिए मस्जिदें और मदरसे मौजूद रहे। पूरा देश विकास की मुख्य धारा से एकदम कटा हुआ, बस रेंगता रहा। कुछ अमेरिका की मदद से और कुछ अच्छी सोच वाले लोगों की छोटी छोटी कोशिशों से। अपनी सीमाओं पर तनाव का खमियाजा भी पाकिस्तान को कई बार भुगतना पड़ा। वह भारत से ही तीन युद्धों में हारा और उसने फिर जो नीतियां बनरइ, वर्तमान में वही उसके गले की हड्डी बन गई हैं। पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर मौजूद तो है लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के अभाव, गलत नीतियों, धार्मिक कट्टरपन, कर्मचारियों के आंदोलनों, लोकव्यापी आक्रोश और डांवाडोल अर्थव्यवस्था के कारण उसकी कोई खास पहचान या मुकाम संभव नहीं हो सका है।

पाकिस्तान अपनी आजादी के 60 साल पूर कर रहा है और फिलहाल लाल मस्जिद, चुनावों को लेकर असमंजस, तालिबान और प्राकृतिक आपदाओं जैसे बिंदुओं पर वह सुर्खियों में है। लगातार चोटें पड़ें तो पहाड़ भी टूट जाते हैं, पाकिस्तान को समझना होगा कि वह लगातार कितनी चोटें झेल चुका है और झेल रहा है। हुकूमत को तमाम लड़ाई झगड़ों, बुरी नीयतों को छोड़कर अपने देश की जरूरतें समझकर पूरा ध्यान विकास पर केंद्रित करना होगा। वह इसकी मिसाल अपने पड़ोसी से ही ले सकता है कि भारत भी अपनी आजादी के 60 सालों बाद एक अलग मुकाम बनाने में कामयाब हुआ है।

जिन्ना के आदर्श : कितने पूरे कितने अधूरे

पाकिस्तान सिर्फ आजादी ही नहीं बल्कि मुस्लिम आदर्शो के संरक्षण में भी विश्वास रखता है जो कि हमारे लिए एक अमूल्य धरोहर की तरह हैं और हमें उम्मीद है कि इस दृष्टिकोण से सभी सहमत होंगे। ... हमारा मकसद शांति होना चाहिए.. हम अमन चैन से जीना चाहते हैं और अपने निकट पड़ोसियों के साथ ही पूरी दुनिया के साथ ही हार्दिक मित्रता निभाना चाहते हैं।

मैं आप सभी को उम्मीद, साहस और भरोसे का संदेश देता हूं। हमें अपने सभी संसाधनों को एक सही तरीके से साधने की जरूरत है और मुसीबतों से प्रतिबद्धता के साथ जूझने की। ... अगर हम पाकिस्तान को एक खुशहाल और संपन्न मुल्क बनाना चाहते हैं तो हमें इकट्ठे और इकाई के तौर पर पूरी तरह से लोगों की भलाई खासकर आम लोगों या गरीबों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

अगर आप ईमानदारी, अनुशासन और स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने फर्ज निभाते हैं तो ऐसा कुछ नहीं है जिसे हासिल न किया सके। ... सर्वोत्तम की उम्मीद रखो और हमेशा सबसे खराब परिस्थिति के लिए तैयार रहो।... इस्लाम के सच्चे भक्त के रूप में सामने आएं और आवाम को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से संगठित करें, मुझे विश्वास है कि फिर आप एक शक्ति होंगे और सब आपको कबूल करेंगे।