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साठे पर पाठा हिंदोस्तान

मुंबई : बात यह नहीं है कि हमने आजादी के साठ साल बाद क्या पाया और क्या नहीं पा सके बल्कि बात खासतौर पर होना यह चाहिए कि हमें क्या पाना है और हम किस राह पर किस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। और, इस सफर में हम क्या समझौते कर रहे हैं, ये समझौते कितने ठीक हैं और कितने महंगे पड़ सकते हैं, यह भी सोचना चाहिए। अपनी राह और अपनी रफ्तार के बारे में हम कुछ कहें तो यह अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसी बात नहीं है क्योंकि इसके पीछे गवाही है, सबूत हैं और हमारा आत्मसम्मान, आत्मविश्वास भी..नेहरू की विदेश नीति हिंदोस्तान की आजादी के बाद पहला ऐसा बड़ा कदम था जो हमारे लिए मील का पत्थर साबित हुआ। फिर चीन युद्ध के बाद हमने विदेश नीति में कुछ संशोधन किए, वह भी ठीक रहे क्योंकि एक राष्ट्र के तौर पर हमें खुद को संरक्षित और सुरक्षित करने की जरूरत थी। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इसी विदेश नीति के बदौलत हम तकनीक, विज्ञान, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आगे मजबूती के साथ कदम बढ़ा रहे थे।

फिर दूसरा माइलस्टोन रहा लोकतंत्र। लेकिन, जैसा कि, भास्कर के साथ बातचीत में मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल ने कहा है कि अब जरूरत है कि लोकतंत्र को और व्यापक किया जाए। यानी अमेरिकी राष्ट्रपति पर अगर जनता से झूठ बोलने, छल करने पर जनता उसके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई का कारण बन सकती है तो हम तो लोकतंत्र की शक्ति से शायद बेहद अनजान हैं। वक्त है कि लोग अपने वोट की कीमत और ताकत समझें और शक्ति के साझेदार बनें।

बहुत कुछ देखा हमने इन साठ सालों में। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, सूचना व संचार क्रांति, उदारीकरण, निजीकरण, ग्लोबलाइजेशन.. साथ में देखा, कुदरत का कहर, इमरजेंसी, भूख, गरीबी, बेरोजगारी और न जाने क्या क्या.. अर्थव्यवस्था उछाल पर है, खेलों में हम नाम कमा रहे हैं, आईटी में हमारा जवाब नहीं, स्टॉक बाजार नई ऊंचाइयों पर है और दुनिया भर में हमारी वाह वाह हो रही है लेकिन हमारा मकसद क्या था और क्या है, यह सोचना जरूरी है। हमारा मकसद : दुनिया के अगड़े देशों की जमात में अपनी एक निजता, मौलिकता और भरपूर सांस्कृतिक विरासत के साथ शामिल होना। अपने सम्मान और आदर्शो से बिना समझौता किए। और यह भी कि विकास के नाम पर सिर्फ पूंजीवाद नहीं बल्कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय ही हमारा सिद्धांत था। संपत्ति है, पूंजी है लेकिन उसका वितरण गलत है। गरीबों का प्रतिशत बहुत बड़ा है, मध्यम वर्ग न जाने कितनी तहों में उलझ रहा है और पूंजी एक वर्ग के हिस्से में ही जा रही है। इससे बढ़ता हुआ सामाजिक आक्रोश कहीं अपराध तो कहीं कुंठा में बदल रहा है। इस पर काबू पाया जाना सबसे पहली प्राथमिकताओं में शुमार होना चाहिए। एक राष्ट्रीय चरित्र और अपनी संस्कृति के अनुरूप हम विश्व में जाने जाएं, यह भी हमारे गौरव के हित के लिए बेहद जरूरी है। सांप्रदायिक और जातिगत राजनीति को छोड़ना होगा। सत्ता पक्ष को जिम्मेदार और विपक्ष को समझदार होने की जरूरत है।

इन सब बातों का मतलब यह नहीं है कि हम बहुत कमतर हैं या फिर हमने कोई तरक्की ही नहीं की। बिल्कुल नहीं, साठ सालों में कई विषम परिस्थितियों को हमने हराकर जो मुकाम हासिल किए हैं, वाकई काबिले तारीफ हैं। बस जरूरत है कि अमेरिका या पश्चिम के दबाव में हम कोई भी ऐसा कदम न उठाएं जो हमारी संस्कृति, उन्नति और भविष्य पर कलंक साबित न हो यानी दूरदर्शिता हो। सिर्फ राजनीति ही नहीं देश के हित में, विकास में सब भागीदार बनें।