मुंबई : भारत और पाकिस्तान के बीच हुए ऐतिहासिक युद्धों पर आधारित फिल्मों के लिए खास तौर पर मशहूर फिल्मकार जेपी दत्ता का मानना है कि जंग हर सूरत में नकार दी जाना चाहिए। जेपी कहते हैं कि हर तरफ खुशहाली हो तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। साथ ही उन्हें इस बात का दुख भी है कि आजकल की फिल्में कोई मौलिक सोच नहीं दे पा रही हैं और इस वजह से फिल्म इंडस्ट्री को हॉलीवुड 2 कहा जाना चाहिए। आजादी और सिनेमा से जुड़े मुद्दों पर जेपी दत्ता ने खुलकर बातें कीं भवेश दिलशाद से..
आजादी के 60 सालों का सफर तय करने के बाद हम मंजिल के कितने करीब पहुंचे और अभी कितनी दूर है दिल्ली?
देखिए साहब, दिल्ली की तरफ तो नहीं पहुंचे हम अलबत्ता अमरीकन और अंग्रेजी कल्चर की तरफ जरूर पहुंच गए। जो राजशाही अंग्रेज छोड़कर गए थे वो हमने वैसी की वैसी अपना तो ली लेकिन हम उसे ठीक से फॉलो नहीं कर पाए। वो जैसे इसे अपनाते हैं हम वैसे नहीं अपना सके। यानी नकल ठीक से नहीं कर पाए और यही गलती कहा जाए तो नासूर बन गई। दूसरे हमने आजादी का मतलब ही गलत ले रखा है। हमको आजादी कुछ ज्यादा ही मिल गई है और उत्तरदायित्व नाम की कोई चीज ही नहीं बची कहीं।
हमने आजादी के बाद पाकिस्तान के साथ तीन बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, क्या नतीजा रहा, क्या पाया क्या खोया?
बात जंग की है तो मैं साहिर की नज्म की कुछ पंक्तियां अर्ज करना चाहूंगा : जंग तो खुद ही एक मसला है.. जंग क्या मसलों का हल देगी.. खून और आग आज बख्शेगी.. भूख और एहतियाज कल देगी.. इसलिए ऐ शरीफ इंसानों जंग टलती रहे तो बेहतर है.. आप और हम सभी के आंगन में शमां जलती रहे तो बेहतर है..या फिर साहिर ने यूं भी कहा कि जमीन खा गई आस्मां कैसे कैसे.. कुल मिलाकर जंग नहीं होना चाहिए।
भारत और पाक के बीच सबसे ज्यादा उलझी हुई कड़ी है कश्मीर, काफी खून बह चुका है तो क्या कोई हल दिखता है, कब तक हम उबर पाएंगे इस खटास से?
मैं सोचता हूं कि नानक, मोहम्मद, राम, कृष्ण कितने दूत आए और समझाया कि यह दो दिन का मेला है और यहां किसी को नहीं रहना। लेकिन कोई समझता ही नहीं, बस तेरा मेरा के चक्कर में घुट रहे हैं और घोंट रहे हैं। भगवान ने एक बीज बोया था तो धरती बनी। धरती सबके लिए थी लेकिन इंसान ने धरती मां की कोख के टुकड़े कर दिए। इंसानी फितरत पर लानत है। रही बात उबर पाने की तो जिस दिन इंसान की समझ में आ जाएगा कि सब कुछ सबका है तो समस्या खत्म।
मैं दुआ करता हूं कि लोगों की सोच सकारात्मक हो, नजरिया बेहतर हो। विद्वानों और किताबों को पढ़े और उन पर अमल करे यह बारूद पर बैठी दुनिया तो शायद हर समस्या हल हो जाए।
दोनों का सफर उतना ही लंबा हुआ, पाकिस्तान किस मुकाम पर पहुंचा और हम कहां?
हम जिस संघर्ष से गुजर चुके हैं अब वो भी उससे रूबरू हो रहे हैं। हम बेशक आगे बढ़े हैं, अपनी गलतियों से सीखकर हमने प्रगति की राह पर कदम बढ़ाए हैं। फिलहाल वहां से भी काफी सकारात्मक सोच दिख रही है। हालांकि उनके जो आंतरिक तनाव हैं उन पर बहुत अफसोस होता है। वैसे मेरा मानना है कि पड़ोसियों के साथ तुलना नहीं करना चाहिए क्योंकि यही मुसीबत की जड़ होता है। मैं अपने घर के बारे में कह सकता हूं, दूसरे के बारे में क्या कहूं? यही दुआ है कि वहां भी खुशहाली हो।
इस पूरे सफर में सियासत के रोल से कितने खुश हैं आप और कितने नाराज?
मैंने कहा कि हमारे यहां उत्तरदायित्व नाम की कोई चीज नहीं रही। मूल वजह यही है। इसके दो पहलू हैं एक तो यह कि मैंने पहले ही कहा कि उत्तरदायित्व नाम की चीज नहीं है। इसकी शुरुआत मेरी नजर में दिल्ली से होना चाहिए और पूरे देश में यह समझ विकसित होना चाहिए। फिर आप जो कानून बना रहे हैं उन्हें ठीक से लागू भी करें जैसे सूचना का अधिकार। और शिक्षा तो है ही, मूलभूत आवश्यकता के रूप में उसे मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
दूसरा पहलू यह है कि जब हमारा संविधान बना तो हमने तय किया कि हम सब मिलजुलकर रहेंगे। लेकिन, हुआ क्या कई बार, आजादी के इतने सालों बाद भी सांप्रदायिकता का खतरा मंडलाता रहता है। हम भड़क उठते हैं। इससे ज्यादा अफसोस की बात और क्या हो सकती है। कमियां हम लोगों में भी हैं, सिर्फ ऐसा नहीं है कि लीडरों को ही दोषी ठहराया जाए।
यूथ दिशाभ्रमित है, और सिनेमा को क्या सोच देना चाहिए? किस तरह से सिनेमा युवाओं को आंदोलित करे? क्या रंग दे बसंती की दिखाई राह ठीक है?
सच यह है कि यह फिल्म एक प्ले ऑल माय सन्स से इंस्पायर है। इस प्ले के अंत में जिस पिता ने खराब एयरक्राफ्ट सप्लाई किए हैं, उसका बेटा अपने दोस्त की मौत का जिम्मेदार उसे ही ठहराता है तो पिता खुद को गोली मार लेता है। लेकिन, रंग दे बसंती में अंत अलग है। यह निर्देशक की सोच का फर्क है। मुझे पहले वाली ज्यादा अपील करती है।
दूसरे फिल्में कुछ सोच दें, इस बारे में मैं यही कहना चाहूंगा कि फिल्मों या फिल्ममेकर्स के पास ही मौलिक सोच नहीं है। बल्कि इन दिनों बॉलीवुड शब्द को लेकर बवाल है, मेरा मानना है कि हमारी इंडस्ट्री का नाम हॉलीवुड 2 ही रख देना चाहिए। हद होती है नकल की भी।
15 साल बाद आप हिंदोस्तान की क्या तस्वीर देखना चाहेंगे?
मैं भगवान मेंं काफी विश्वास रखता हूं। तकदीर को मानता हूं तो यही कहूंगा कि जो होना होगा वही होगा और ठीक होगा। बात सिर्फ इतनी सी है कि धरती मां कहती है कि मेरे आंचल में तुम सबकी भूख मिटाने के लिए बहुत कुछ है लेकिन तुम्हारा लालच मिटाने के लिए बहुत कम। हमें लालच छोड़ना होगा। मिलजुलकर रहना होगा तो हमें तरक्की से कौन रोकेगा।
जेपी दत्ता : एक परिचय :
3 अक्टूबर 1949 को बॉम्बे में जन्मे जेपी दत्ता ने कई सफल फिल्मों का निर्माण किया और उन्हें बेहद लोकप्रियता मिली अपनी मल्टीस्टारर युद्ध आधारित फिल्मों से। उनकी बॉर्डर, रिफ्यूजी और एलओसी फिल्मों के नाम इस कड़ी में शामिल हैं। साथ ही उन्होंने गुलामी, यतीम और उमराव जान के रीमेक जैसे कुछ संवेदनशील प्रोजेक्ट भी सफलता से पूरे किए। बॉर्डर ने तो ढेरों फिल्मफेयर पुरस्कार अपनी झोली में डाले। जेपी दत्ता को अब तक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।