मुंबई : अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ने वाले फिल्मकार और हाल में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक श्याम बेनेगल का मनना है कि इमरजेंसी की नौबत अब कभी नहीं आएगी क्योंकि लोकतंत्र हमारी रगों में बहने लगा है। लेकिन इसके साथ ही श्याम बेनेगल मानते हैं कि अब इलेक्टोरल डेमोक्रेसी से एक कदम आगे बढ़कर हमें पार्टिसिपेटिव लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती को स्वीकार करना होगा। आजादी के 60 सालों बाद भारत की तस्वीर पर उन्होंने कुछ इस तरह की सार्थक बातें भवेश दिलशाद से कहीं..
आजादी के 60 साल, कितनी उम्मीदें थीं और कितनी पूरी हुईं?
देखा जाए तो काफी उम्मीदें, काफी सपने पूरे हुए हैं हमारे। विकास में तो हमने अगड़ों की कतार में अपना नाम लिखवा लिया है। अर्थव्यवस्था में जो बूम आया है उससे काफी अच्छा संदेश जा रहा है। इसके अलावा मैनुफैक्चरिंग, ज्ञान अर्थव्यवस्था नॉलेज इकोनॉमी, स्टॉक बाजार में भी हमने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। तो कहा जा सकता है कि हमने काफी कुछ हासिल कर लिया है लेकिन एक और तस्वीर है हिंदोस्तान की और उसे देखना भी जरूरी है।
इन 60 सालों में हमारी सबसे बड़ी नाकामयाबी है भूख और गरीबी। हम गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत कम नहीं कर सके और न ही हर मुंह के लिए निवाले का इंतजाम कर पाए और यही हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है फिलहाल।
तो क्या किया जा सकता है?
हम कृषि प्रधान देश थे और हमने अपनी जीवन रेखा को ही भुला दिया। इससे हुआ यह कि आज शहरों में ज्यादा पैसा है और गांवों में हमारे सामने केवल समस्याएं ही समस्याएं हैं। इससे निपटने के लिए हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन पर प्राथमिकता के साथ ध्यान देना होगा। सरकार के साथ ही लोगों को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए।
हिंदोस्तान ने आर्थिक रूप से तरक्की तो की है लेकिन गरीब तबके का प्रतिशत अब भी बेइंतहा है और मध्यम वर्ग में कई परतें बन रही हैं, पूंजी, संपत्ति कुछ हाथों में जा रही है, इन हालात में क्या जरूरी विकल्प हैं?
यह एक तरह से अच्छी बात है कि मध्यम वर्ग तरक्की कर रहा है। परतें बनना यूं तो काफी नुकसानदायक साबित होता है लेकिन यह इस बात का इशारा भी कर रहा है कि मध्यम वर्ग महत्वाकांक्षी है और वह अपना एक अलग रास्ता बना रहा है। फिर भी, पूंजी का वितरण सही होना चाहिए। और इसके लिए सबसे जरूरी है कि आप शिक्षा पर पूरी गंभीरता के साथ ध्यान दें।
ग्रामीण रोजगार योजना एक अच्छी शुरुआत रही और अब जरूरत इस बात की है कि इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया जाए और ईमानदारी के साथ इस पर काम किया जाए। कुछेक जगहों से निकलकर अब इसका फायदा पूरे हिंदोस्तान को मिलना चाहिए। और अगर प्राथमिकताओं की बात करें तो यह मान लीजिए कि बच्चों में कुपोषण और कृषि का रुझान कम होना आज की तारीख में सबसे बड़ी और गंभीर समस्याएं हैं और इन पर हमें तत्काल ध्यान देना होगा।
इन 60 सालों में भारत के लिए टर्निग प्वाइंट्स क्या रहे?
युद्धों की बात तो सभी करते हैं लेकिन इससे इतर अगर देखें तो इमरजेंसी को एक काफी बड़ा बिंदु माना जा सकता है जिसने देश को काफी प्रभावित किया। यह बिल्कुल जाहिर बात है कि यह नहीं होना चाहिए था। और मुझे लगता है कि अब आगे ऐसा कभी होगा नहीं क्योंकि लोकतंत्र को हम स्थापित करने में कामयाब हुए हैं और यह जारी ही रहेगा क्योंकि यह हिंदोस्तान की रग रग में है।
हम सबसे बड़े लोकतंत्र तो बन गए हैं लेकिन दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र नहीं बने, क्यों?
लोकतंत्र को स्थापित करने में तो हमने कामयाबी हासिल कर ली है लेकिन अब जरूरत है कि इसके प्रति जागरूकता पैदा की जाए। इसे ज्यादा सार्थक बनाने की कोशिशें होना चाहिए। देखिए लोकतंत्र का मतलब है : शक्ति का संतुलन या फिर यूं कहिए कि शक्ति की साझेदारी। अभी हम केवल चुनावी लोकतंत्र के पड़ाव पर हैं और अब हमें एक कदम और आगे बढ़कर इसे साझा लोकतंत्र या पार्टिसिपेटिव डेमोक्रेसी बनाना है।
जी, बेशक। इमरजेंसी की बात की हमने, वाकई एक ऐसी घटना जिसने देश को बेहद प्रभावित किया लेकिन उस समय वह सिनेमा सर्वाधिक सक्रिय था जो देश की घटनाओं और समाज की गहराइयों को परदे पर उतार रहा था। क्या हुआ कि इमरजेंसी पर कोई सार्थक और प्रभावशाली फिल्म देखने को नहीं मिली?
यह समय समय की बात है। उस वक्त हो सकता है कि कोई अच्छा प्लॉट या स्टोरी इस मुद्दे पर न मिल सकी हो इसलिए ऐसा संभव है लेकिन मेरी ही फिल्म मंथन में इमरजेंसी के संदर्भ हैं। और अब तो इमरजेंसी का प्रभाव और मुद्दा ही खत्म हो चुका है। सच यह है कि उस दौर से हमने सबक सीखा है कि आंतरिक आपातकाल की जरूरत कभी नहीं पड़ना चाहिए। ऐसे हालात पैदा ही नहीं होना चाहिए कि संविधान स्थगित करने की नौबत आए। यह वाकई किसी खौफनाक हादसे से कम नहीं होता।
हिंदोस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच सिनेमा किस तरह से पुल बन सकता है?
जी हां, दोनों ही देशों का रिश्ता इस माध्यम से बेहतर हो सकता है। हाल में कुछ फिल्में वहां रिलीज हुई हैं जो कि एक तारीख है और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार पाक की फिल्मों में काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह एक नए दौर का आगाज है और इसे गंभीरता से लिया जाए तो कुछ बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।
श्याम बेनेगल : एक परिचय
सिकंदराबाद में 14 दिसंबर 1934 को जन्मे श्याम बेनेगल ने सत्यजीत रे के बाद हिंदी सिनेमा को एक गंभीरता और सार्थकता प्रदान करने में जो योगदान दिया है वह वाकई बेमिसाल है। ऐसी शख्सियत की वजह से उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, इंदिरा गांधी पुरस्कार और कुछ दिनों पहले ही दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अलावा बेनेगल की 13 फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार और उन्हें बेहतरीन निर्देशक, पटकथा लेखक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके द्वारा निर्देशित फिल्म नेताजी सुभाष चंद्र बोस : द फॉरगटन हीरो को राष्ट्रीय सद्भावना के लिए नरगिस दत्त पुरस्कार दिया गया था। 1976 में श्याम बेनेगल की फिल्म निशांत को कान्स फिल्म फेस्टिवल में पाम डीऑर्डर से नवाजा गया था। उन्हें अपनी फिल्मों के लिए गोल्डन बर्लिन बीयर, गोल्डन प्राइज और गोल्डन सेंट जॉर्ज जैसे सम्मान भी हासिल हो चुके हैं।
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