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इंदौर: सबकुछ ठीक रहा तो कुछ साल में कॉटन मार्केट पर फिर इंदौर का हुकुम चलने लगेगा। देश के कई बड़े टेक्सटाइल समूह शहर के आसपास करोड़ों रुपए का निवेश करने के इच्छुक हैं और स्थानीय कंपनियां भी विस्तार की तैयारी में हैं। उद्योग जगत की मानें तो 2010 तक शहर के आसपास चार हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश हो सकता है।
फिलहाल शहर व आसपास करीब 1600 करोड़ रुपए के सालाना टर्न ओवर वाली नौ बड़ी टेक्सटाइल यूनिट काम कर रही हैं। इनके अलावा करीब डेढ़ सौ छोटी गारमेंट यूनिट और दो हजार पॉवरलूम काम कर रहे हैं, जबकि संभावनाएं इससे कहीं ज्यादा की है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया की एमपी यूनिट ही तीन हजार करोड़ रुपए का गारमेंट पार्क बनाना चाहती है, जिसके लिए टेक्सटाइल मिनिस्ट्री से बात चल रही है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष एन.एस. निर्बान व सचिव प्रभाकर भट्ट कहते हैं अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो कोई भी जंगलों की कीमत पर कहीं ओर यूनिट स्थापित नहीं करना चाहता है। प्रदेश के अन्य हिस्सों में यूनिट डालने पर भी कॉटन यहीं से ले जाना पड़ता है।
वरना ये भी यहां होते- क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण कुछ बड़े उद्योग चाह कर भी नहीं आ पाए। इनमें वर्धमान ग्रुप प्रमुख है जो कई प्रयासों के बाद मंडीदीप चला गया। हालांकि उसकी प्लानिंग में इंदौर शामिल है। इसी तरह पंजाब की अभिषेक इंड्रस्ट्री यहां 950 करोड़ रुपए का निवेश करना चाहती थी लेकिन उसे एक हजार एकड़ जमीन नहीं मिल पाई। इसी वजह से बुधनी, होशंगाबाद चली गई। रेमंड ने भी पहल की थी। उसकी यूनिट छिंदवाड़ा में है।
न्यूयॉर्क तक जलवा था सर सेठ हुकमचंद का सेठ हुकमचंद प्रथम विश्वयुद्ध के पहले तक अफीम का कारोबार बड़े पैमाने पर करते थे। सारी दुनिया में उनका नाम चलता था और वे ही भाव तय करते थे। उसी दौरान उन्होंने स्टेट मिल लीज पर ली। अफीम का कारोबार बंद होने के बाद उन्होंने कॉटन और कपड़ा मिल में रूचि ली।
1900 से पहले स्टेट मिल लीज पर लेकर चलाई और 1914 में हुकमचंद मिल की स्थापना की। उन्हीं के परिवार के सेठ कस्तूरचंद और कल्याणमल ने भी मिलों की स्थापना की। 1950 तक सेठजी का जलवा कायम रहा। उनकी धाक का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि उनके निधन पर न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज तीन दिन तक बंद रहा था।
<< आना तो अब भी चाहते हैं0 इंदौर या मालवांचल में कपड़ा उद्योग के लिए आज भी भरपूर संभावना है और अनेक उद्योगपति यहां आना भी चाहते हैं। 0 बीते सालों में आधुनिक तकनीक के साथ शुरू हुई मिलों ने नाम भी कमाया। 0 यहां कपास अच्छी और पर्याप्त होती है। साथ में यहां के वातावरण में नमी बेहतर रहने के कारण सूत एकदम से टूटता भी नहीं। 0 जमीन और श्रमिक भी अपेक्षाकृत बेहतर उपलब्ध हैं। इसमें बंद मिलों के श्रमिक भी शामिल हैं। 0 देश के मध्य में होने से कहीं भी माल पहुंचाना सुविधाजनक।
(जैसा एल.एन. कसेरा, उपाध्यक्ष टेक्सटाइल मिल ओनर्स एसोसिएशन ने बताया)
<< इतिहास के आईने में0 इंदौर में सबसे पहले 1884 में होलकर राज्य ने स्टेट मिल डाली थी। वह मौजूदा गांधी हॉल के पीछे वाले परिसर में संचालित की जाती थी। 0 स्टेट मिल पहले और दूसरे साल फायदे में चली और तीसरे साल घाटा होने लगा तो होलकर राज्य ने उसे लीज पर दे दी। 0 उसे नजर अली समूह ने लीज पर ली। फिर सेठ हुकमचंद और सेठ बालचंद छाजेड़ (लाल कोठी वाले) ने संचालन किया। फिर रायबहादुर मिल के नाम से भंडारी परिवार ने इसे चलाया। 0 इसी अनुभव के आधार पर सेठ हुकमचंद ने 1914 में हुकमचंद मिल डाली थी। उनके परिवार के सेठ कस्तूरचंद और कल्याणमल ने भी अनेक कपड़ा मिलें डालीं। 0 1924 में भंडारी और स्वदेशी मिल की स्थापना की गई थी।
(इनपुट- राजेंद्र गुप्त)