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‘ओम शांति ओम’ और ‘सांवरिया’ में टक्कर

परदे के पीछे:om shanti om साजिद खान की फिल्म ‘हे बेबी’ के साथ ही शाहरुख की ‘ओम शांति ओम’ और संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया’ की पहली झलकियां प्रस्तुत की गई हैं। इन दोनों फिल्मों का प्रदर्शन आगामी नवंबर में होने की संभावना है। शाहरुख की फिल्म में चमक-दमक और चकाचौंध है, जबकि ‘सांवरिया’ में भव्यता के साथ चंपई अंधेरा है। दोनों फिल्मों में दिन और रात का फर्क नजर आता है। व्यवसायिक सिनेमा में रात के दृश्यों में भी उजास होता है। विधू विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ और विशाल भारद्वाज की ‘ओमकारा’ में रात के दृश्यों में कुछ नजर नहीं आता। इस तरह यथार्थ को प्रस्तुत करने के नाम पर दर्शक को ठगा गया है। बहरहाल भंसाली की फिल्म में ऐसा नहीं है, परंतु उन्होंने प्रथम झलक में जानबूझकर नए सितारों के चेहरे नहीं दिखाए हैं। दर्शकों को सस्पेंस में रखा जा रहा है। यह फिल्म की मार्केटिंग योजना के तहत किया जा रहा है।

अमेरिका की विश्वप्रसिद्ध कंपनी कोलंबिया द्वारा निर्मित यह पहली भारतीय फिल्म है। यह भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता के कारण ही संभव हुआ है। एक आकलन है कि सिनेमा का हर पांचवा दर्शक भारतीय है, चाहे वह पटना में फिल्म देखे या फिर प्राग या डलास में। ज्ञातव्य है कि वॉल्ट डिज्नी यश चोपड़ा के साथ मिलकर भारत में कार्टून फिल्म बना रहे हैं। इस धंधे में संभावना है, इसलिए यह पहल हो रही है। हॉलीवुड ने अपने अफीमी मनोरंजन से दुनिया भर के देशों में स्थान बना लिया है। इसने यूरोपियन सिनेमा को समाप्त जैसा कर दिया, परंतु हॉलीवुड भारतीय सिनेमा को अपदस्थ नहीं कर सका। अपने मकसद को साधने के लिए हॉलीवुड की फिल्मों को भोजपुरी में भी डब किया गया है, फिर भी उन्हें अभी तक भारतीय थालीनुमा मनोरंजन का तोड़ नहीं मिल पाया। जब उनकी दुकान पर ओवन में बने पकवान नहीं बिके, तब उन्होंने हिंदुस्तानी खानसामों को बुलाकर कहा कि वे अपने ही मसालों से मनोरंजन रूपी पकवान पकाएं, क्योंकि उन्हें तो मुनाफे से मतलब है।

शाहरुख की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ सुभाष घई की ‘कर्ज’ से प्रेरित है। यहां तक कि ‘दर्दे दिल’ नाम के लोकप्रिय गाने को ‘दर्दे डिस्को’ के नाम से बनाया गया है। सातवें दशक का अच्छा अभिनेता, परंतु असफल सितारा सन 2007 में अपने पुनर्जन्म में खराब एक्टर होने के बावजूद एक सफल सितारा है। अत: पुनर्जन्म की आजमाई हुई कथा को सिनेमा जगत की पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत किया गया है। एक नृत्य दृश्य में तमाम सितारों को शामिल किया गया है। चर्चित टीवी शो ‘कॉफी विथ करण’ में फरहा खान से करण ने पूछा था कि उनकी निर्देशित फिल्म ‘ओम शांति ओम’ को संजय लीला भंसाली या रामगोपाल वर्मा किस तरह से बनाते? असल में फरहा से यह पूछा जाना चाहिए था कि सुभाष घई इस फिल्म को कैसा बनाते।

बहरहाल संजय भंसाली द्वारा दिखाई गई झलक से केवल भव्यता का अनुमान होता है, परंतु यह किस तरह की प्रेम-कथा है, किस कालखंड और देश की कहानी है तथा इसमें सलमान और रानी मुखर्जी क्या कर रहे हैं, इन सब सवालों के जवाब का कोई भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पहले शॉट में एक शाही नौका में प्रेमी बैठे हैं। इस तरह की नौका वर्तमान कालखंड में किसी भी देश में मौजूद नहीं है। ऐसी नाव तो क्लियोपेट्रा इस्तेमाल करती थीं। हमने कमाल अमरोही की फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ में इसी तरह की एक नौका में हेमा मालिनी और परवीन बॉबी को चुहलबाजी करते देखा है। एक झलक में हम नायक को सड़क पर जाते देखते है। वातावरण काफी कुछ शेक्सपियराना लगता है। एक और छोटी सी झलक में नायिका की खुली पीठ और चाल-ढाल फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ में ऐश्वर्या की याद ताजा करती है।

पहले अफवाह थी कि संजय शेक्सपियर की रोमियो-जूलियट बना रहे हैं, पर अब कहा जा रहा है कि उनकी फिल्म दोस्तोवस्की की ‘व्हाइट फीदर्स’ से प्रेरित है। रोमियो-जूलियट चार दिन की कथा है, जिसमें प्रेमी रविवार को मिलते हैं और गुरुवार को मार दिए जाते हैं। प्रेम में पड़कर लोग प्राय: कहते हैं कि तेरे बिना एक पल नहीं रह सकता। अगर प्रेम में भावना की यही तीव्रता है तो मिलना-बिछड़ना और मरना चार दिन में ही होना चाहिए। फिल्म के नाम से लगता है कि ‘सांवरिया’ प्रेमियों के सरताज कृष्ण से प्रेरित होना चाहिए। इस झलक में संगीत अत्यंत मधुर लगा जो हर फिल्म में संजय लीला भंसाली की ताकत रहा है।

बहरहाल फरहा खान की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ की झलक जहां खुली किताब की तरह पूरा अर्थ उजागर करती है, वहीं ‘सांवरिया’ की झलक सारे अर्थ छिपाती है, जैसे कवि कोलेरिज की कुबला खां नामक कविता- ‘‘इन जनालू डिड कुबला लिव।’’ इस कविता में आज तक नहीं पता चला कि जनालू कहां है।





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