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केंद्रीयकर्मियों की पेंशन खतरे में

भोपाल: केंद्र के 31 लाख कर्मचारी और 22 लाख पेंशनर के लिए यह खबर एक बड़े झटके से कम नहीं है कि सरकार की निगाह अब उनकी पेंशन खत्म करने की ओर है। राज्यों की सरकारें भी एक कदम आगे बढ़कर कर्मचारियों की पेंशन से पीछा छुड़ाने का मन बना रही है। इसके बदले उन्हें हर महीने तनख्वाह में ही अलग से पेंशन की कुछ राशि जोड़कर पैकेज देने की योजना पर विचार चल रहा है।

इसका खुलासा छठवें वेतन आयोग द्वारा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल इकानामिक चेंज (आईएसईसी) बेंगलूर को भेजी रिपोर्ट से हुआ है। इस रिपोर्ट में आयोग ने इस संस्थान से चार बिंदुओं पर राय मांगी है, जिन्होंने केंद्रीय कर्मचारियों को परेशान कर रखा है। छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें केंद्र को अप्रैल 2008 में सौंपा जानी हैं।

इन बिंदुओं पर मांगी राय:
* पेंशन में सरकार को कितना खर्च आ रहा है। संस्थान कोई ऐसी योजना सुझाए, जिससे कर्मचारियों की पेंशन में खर्च होने वाली राशि की बाहर से व्यवस्था हो सके।
* 31 दिसंबर 2003 तक भर्ती हुए कर्मचारियों की पेंशन पर आगामी चालीस सालों में कितना खर्च होगा।
* ऐसी स्कीम बनाई जाए, जिसमें निजी क्षेत्र की तरह सरकार भी पेंशन देने की जिम्मेदारी से बच सके। मसलन उन्हें तनख्वाह के साथ ही पेंशन की राशि जोड़कर पैकेज के रूप में दे दी जाए।
* सरकार को प्रारंभिक स्तर पर कितना धन खर्च करना पड़ेगा।

इनकी पेंशन खतरे में:
जिनके लिए यह योजना तैयार हो रही है, उनमें 31 दिसंबर 03 तक के केंद्रीय सेवाओं में कार्यरत कर्मचारी और पेंशनर हैं। इनकी संख्या देशभर में 53 लाख के लगभग है। इस रिपोर्ट में इसके बाद भर्ती हुए कर्मचारियों को छुआ तक नहीं गया है। इसकी मुख्य वजह है कि ये कर्मचारी पहले ही अंशदायी पेंशन योजना के दायरे में हैं।





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