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Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे
कमल सदाना ने अपने पिता ब्रिज सदाना की फिल्म 'विक्टोरिया नं. 203' का नया संस्करण बनाया है। मूल फिल्म के जमाने में सफल फिल्मकार ब्रिज को बड़े सितारे उपलब्ध नहीं हो रहे थे, अत: उन्होंने 'जानी मेरा नाम' के लेखक के. ए. नारायण से एक पटकथा लिखवाई। इसमें दो बुजुर्ग नायक हैं- एक शराबी, दूसरा लंपट। इन नायकों के किरदार को अशोक कुमार और प्राण ने अपने शानदार अभिनय से जीवंत कर दिया। इस सफल फिल्म में नवीन निश्चल और सायरा बानो रोमांटिक भूमिकाओं में होते हुए भी जूनियर कलाकार की तरह थे। रोमांचक और मनोरंजक पटकथा फिल्म की जान थी। फिल्म के खलनायक अजीत ने खलनायकी में हास्य का पुट जोड़ दिया था। सबसे मजेदार इस फिल्म का क्लाईमैक्स रहा।
कमल सदाना को राहुल रवैल ने 'बेखुदी' नामक फिल्म में काजोल के साथ प्रस्तुत किया था। इस हादसे से काजोल तो बच निकली, परंतु कमल सदाना का कैरियर चौपट हो गया। कमल ने एक छोटे बजट की फिल्म में हाथ झुलसाए हैं और अब अपने पिता के आजमाए विषय पर पुन: निर्माण हवन पर बैठे हैं। ज्ञातव्य है कि यथार्थ जीवन में कमल ने अत्यंत भीषण त्रासदी सही है और आज उनका नार्मल होना उनकी जीवन ऊर्जा का प्रमाण है। बात एक मनहूस रात की है, जब रोज की तरह ब्रिज सदाना अपने घर में शराब का सेवन कर रहे थे।
उनकी पत्नी किसी जमाने में फिल्म अभिनेत्री रही थीं। किसी बात पर कहा-सुनी हो गई और ब्रिज ने रिवाल्वर निकालकर उन्माद के क्षण में अंधाधुंध गोलियां दाग दीं। इस हादसे में उनकी पत्नी व बेटी की मृत्यु हो गई और कमल भी घायल हो गए। उन्माद की घटा के जाते-जाते, ब्रिज को होश आया और उन्होंने स्वयं को भी गोली मार ली। एक हंसता-खेलता परिवार नष्ट हो गया। यह बताना संभव नहीं है कि उन्माद का वह क्षण उनके अवचेतन में कब से और कैसे सोया हुआ था।
वह कौन-सी बात थी कि वे ज्वालामुखी की तरह फट गए। मनुष्य मन की कंदरा बड़ी रहस्यमय है, वहां बियाबां अंधेरा रहता है। कौन-सा सांप किस कोने में फन फैलाए बैठा है, बता पाना नामुमकिन है। ऐसे में फिल्म 'काला बाजार' के लिए लिखी शैलेंद्र की वो पंक्तियां याद आती हैं- 'रात ने कैसे जाले फैलाए, कैसे-कैसे ये नाग लहराए, अब किधर जाऊं, मैं कहां जाऊं, तेरे चरणों की धूल मिल जाए, श्याम मैं तर जाऊं।'
ज्ञातव्य है कि अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार चाल्र्स लैंब, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के लंदन दफ्तर में क्लर्क थे, की बहन ने उन्माद के क्षण में अपने माता-पिता को मारकर भाई को घायल कर दिया था। जेल और पागलखाने में कुछ वर्ष बिताने के बाद चाल्र्स के वचन पर कि भविष्य में बहन के किसी भी काम के लिए वह जवाबदार होगा, बहन को रिहा कर दिया गया। ताउम्र चाल्र्स ने अपनी बहन की सेवा की। उन्माद के कारण तो डीएनए टेस्ट से ही पता चल सकते हैं। यह किस अनाभिव्यक्त दर्द या क्रोध की गठान है जो अवचेतन के अंधेरे में घर कर लेती है। सारांश यह है कि हर व्यक्ति को हर शब्द सोच-समझकर सावधानी से बोलना चाहिए ताकि दूसरों के उन्माद का ज्वालामुखी नहीं फटे।