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‘मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए’

परदे के पीछे मशहूर कवि और शायर दुष्यंत कुमार का 75वां जन्मोत्सव एक सितंबर 2007 से 31 अगस्त 2008 तक मनाया जाएगा। भोपाल में आयोजक ने बताया कि इस दौरान वर्ष भर व्याख्यान, कवि सम्मेलन और मुशायरों का आयोजन होगा। आज बाजार की ताकतों के कारण आए सामाजिक परिवर्तनों पर दुष्यंत कुमार किस तरह लिखते, इस बात की कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके जैसी विलक्षण प्रतिभा के लिए इस कालखंड में लिखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता, क्योंकि विसंगतियों और विरोधाभास के इस दौर को वे बेहतर ढंग से प्रस्तुत करते, साथ ही उनके नजरिए से मौजूदा दौर को देखना एक विरल अनुभव होता। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उनकी रचनाएं आउटडेटेड हो गईं हैं। उनकी रचनाएं आज भी सार्थक हैं और कल भी महत्वपूर्ण साबित होंगी।

दुष्यंत कुमार का एक मशहूर शेर है- ‘बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे हैं घर बने’। इसे आज के संदर्भ में पढ़ा जाए तो कहना होगा कि दुष्यंतजी, बाढ़ आ गई है और बहुत से जीवन मूल्य डूब गए हैं। आज के दौर में झुनझुनों की संख्या बढ़ गई है, जबकि दुष्यंत कुमार ने दशकों पूर्व ही लिख दिया था, ‘जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।’ फिलहाल लोगों के हाथ में झुनझुनों की जगह मोबाइल टुनटुना रहे हैं।

आज के दौर में हमें दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां भी हिला देती हैं-‘ये रोशनी है हकीकत में एक छल लोगों, कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों।’ मूल्यहीनता के इस दौर में कई बार लगता है कि यह एक ऐसा काल्पनिक कालखंड है, जिसमें इंसान सिर्फ एक साया है- शरीरहीन साया। जगमग बाजार और सामाजिक तामझाम के दौर को दुष्यंत कुमार की नजर से देखें तो उनका एक और शेर याद आता है- ‘किसी भी कौम की तारीख के उजाले में, तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगों।’

मेरी फिल्म ‘शायद’ में नकली शराब पीकर बीमार पड़ने वालों के संदर्भ में सैकड़ों चिताओं के दृश्य की पृष्ठभूमि में दुष्यंत कुमार की गजल का इस्तेमाल किया गया था- ‘देखिए उस तरफ उजाला है, जिस तरफ रोशनी नहीं जाती, ये जुबां हमसे सी नहीं जाती, जिंदगी है कि जी नहीं जाती।’ इस गजल के इस्तेमाल की आज्ञा लेने मैं विट्ठलभाई पटेल के साथ दुष्यंत कुमार के घर गया था और वहां श्रीमती दुष्यंत कुमार से मेरी भेंट हुई। जिस महानगर मुंबई में पांच सितारा होटलों में लाखों रुपए का खाना जूठा करके छोड़ दिया जाता है, उसी महानगर में कुपोषण से कुछ लोग मर जाते हैं। ऐसे में फिर दुष्यंत जी की पंक्तियां याद आती हैं- ‘भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दआ।’

दुष्यंत कुमार की मृत्यु पर सरोज कुमार ने एक लंबी कविता लिखी थी, जिसके अंश इस प्रकार हैं- ‘आदमी जब फेंकता है अपने को, भीतर से उठा-उठाकर, फैशन और शैलियां, साबित होती हैं फटी हुई थैलियां। नया अनकहा और अनोखा उमगने पर, वह कोई शब्द, कोई अवसर, कोई मंच, नाक-भौं सिकोड़कर नहीं छोड़ता है, चीखता हुआ नंगा ही सही आर्कमिडीज की तरह दौड़ता है, जमाने की इबारत वह हांफते-हांफते लिख जाता है, जहां देख भी नहीं पाते हैं लोग, वहां दिख जाता है आवाजों के घेरे तोड़कर।’

सूर्य का स्वागत करता हुआ कोई आए,

और पाए बौखलाए दरख्तों के गर्म-गर्म साए,

तब ऐसे जलते हुए वन की बांबियों से निकलती है वसंत मनाने,

जहरीली गजलें.. फनफनाते हुए कसीदे।’

दरअसल कवि हमेशा समय की नदी में धारा की विपरीत दिशा में तैरते हैं और इस प्रयास में डूब भी जाते हैं। डूबने के क्षण से पहले जो उंगलियां आप सतह पर देखते हैं, वे ही इतिहास लिखती हैं।





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