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सलाखों में पलते बेकसूर मासूम

जोधपुर: jail प्रदेश की अधिकांश जेलों व सब जेलों में राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त सुविधाएं नहीं जुटा पाने के कारण गर्भवती महिला कैदियों व अन्य महिला बंदियों के निर्दोष व मासूम बच्चे भीड़ भाड़ वाले बैरकों एवं हिंसक वारदातों में सजायाफ्ता अन्य महिला कैदियों के साथ रह रहे हैं।

देश के विभिन्न राज्यों में स्थित जेलों में बंद गर्भवती महिला कैदियों व बच्चों की दयनीय स्थिति को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरडी उपाध्याय बनाम आंध्रप्रदेश राज्य के मामले में राज्य सरकारों को जेल नियमों में संशोधन करने के महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसकी पालना में जेल नियमों में कुछ बदलाव तो कर दिए लेकिन इसके एक साल बाद भी गर्भवती महिला कैदियों और बच्चों को वे सभी सुविधाएं जुटाने में सरकार नाकाम रही।

सुप्रीम कोर्ट ने जेलों की दुर्दशा पर चिंता जताते हुए कहा था कि बालकों को ऐसे दूषित वातावरण में रखना न केवल घातक है बल्कि उनके व्यक्तित्व विकास में भी बाधक है। प्रदेश में मात्र जयपुर व जोधपुर में ही महिला बंदी गृह स्थापित हैं। इसके अलावा राज्य के ज्यादातर उप कारागृहों में महिला बंदियों को रखने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।

जिले के हालात
जिले में स्थित उप कारागृह पिचियाक बिलाड़ा व फलौदी सब जेल में गर्भवती महिला कैदियों व बच्चों को रखने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। जोधपुर मुख्यालय पर गत वर्ष 23 सितंबर को महिला बंदी गृह प्रारंभ किया गया । इससे पहले तक जोधपुर, उदयपुर व बीकानेर संभाग की महिला कैदियों को जयपुर के महिला बंदी गृह में रखा जाता था। तीनों संभागों की 33 सजायाफ्ता महिलाओं को अभी तक जोधपुर स्थानांतरित किया गया है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव रवि शर्मा की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि संसाधनों के अभाव में जोधपुर महिला बंदी गृह में बने रसोईघर, चिकित्सालय, पुस्तकालय व शिशु सदन प्रारंभ नहीं किए गए हैं।

क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
* सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों की जेलों में बंद गर्भवती महिला कैदियों व उनके साथ रहे रहें बच्चों के लिए संबंधित सरकारों को आवश्यक सुविधाएं जुटाने के निर्देश दिए।
* जेल में बच्चों के साथ विचाराधीन या सजायाफ्ता कैदियों की तरह व्यवहार न हो।
* महिला बंदी को 6 वर्ष तक के बच्चों को साथ रखने की अनुमति।
* छोटे बच्चों के लिए शिशु सदन तथा 3-6 वर्ष के बच्चों के लिए नर्सरी (जेल से बाहर)।
* जिले के सरकारी अस्पताल में गर्भवती महिला कैदी को चिकित्सा सुविधा ।
* गर्भवती कैदी का प्रसव जेल से बाहर हो, अस्थायी रिहाई व पैरोल की सुविधा।
* गर्भवती को जेल भेजने से पहले सुनिश्चित करें कि जेल में प्रसव की सुविधा हो।
* गर्भवती महिलाओं की आईजी (जेल) को रिपोर्ट दें।
* बच्चों के लिए जन्म रजिस्टर में जन्म स्थान जेल का हवाला न हो।
* महिला चिकित्सक द्वारा गर्भवती महिला व बच्चे की नियमित स्वास्थ्य जांच।
* बच्चों को नियमानुसार टीकाकरण, नियमित रिकार्ड संधारण।
* बच्चों को उपयुक्त कैलोरी दूध व भोजन के साथ कपड़े भी दिए जाएं।
* बच्चे व मां के सोने के लिए स्वच्छ बिस्तर व पर्याप्त सुविधा ।
* छह वर्ष की आयु के बाद महिला कैदी की इच्छानुसार परिजनों को बच्चों की सुपुर्दगी।
* मां की रिहाई तक बच्चों को समाज कल्याण विभाग संचालित संस्था को सौंपना।
* समाज कल्याण विभाग निदेशक की बच्चे को मां से मिलाने की जिम्मेदारी।
* महिला कैदी के काम पर चले जाने पर महिला जेल वार्डन पर देखभाल की जिम्मेदारी।
* ऐसी महिला कैदियों के मामले कोर्ट प्राथमिकता से तय करें।





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