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Bachhon Ka Kona Bachhon Ka Kona
शिक्षक, महज तीन अक्षर का ये शब्द अपने में दुनिया समेटे हुए है और आज के दौर में तो उनकी छवि और वृहद् हो गई है। शिक्षा ही नहीं योग, अध्यात्म, प्रबंधन, संगीत, तकनीक.. तकरीबन हर क्षेत्र में दक्ष गुरुओं का बोलबाला है। यहां तक कि रिश्तों की उलझने सुलझाने के लिए भी गुरुओं की सहायता ली जा रही है। ‘गुरुर्ब्रrा..तस्मै श्री गुरुवै नम:’ श्लोक अब जाकर सार्थक हुआ है कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वाकई में शिक्षक ने भगवान का स्थान पा लिया है। आज ही नहीं बल्कि अनादि काल से हर दौर में उन्होंने अपनी शिक्षा से अनगिनत जिंदगियां रोशन की हैं।
शिक्षकों से ही हमारा अतीत है, सुंदर वर्तमान है और निश्चित ही उत्कृष्ट भविष्य भी। उनकी साधना, समर्पण और त्याग अतुलनीय है। दुनिया की कोई दक्षिणा इस कर्ज को नहीं चुका सकती। आज के शिक्षक मित्र, बंधु, करियर गाइड, काउंसलर की बहु-आयामी भूमिका निभा रहे हैं। हर सफल व्यक्ति के पीछे कोई शिक्षक जरूर है लेकिन आजकल शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य जैसे मतदान संबंधी, साक्षरता अभियान, पल्स पोलियो, मध्याह्न् भोजन, गरीबी रेखा का सर्वे आदि कराए जाते हैं। इन सबके बावजूद उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल पा रहा है। इस ध्येय और समर्पित जज्बे के लिए सिर्फ एक दिन ही काफी नहीं.. हमें उनका सम्मान शाश्वत रखना होगा।
हर दौर में अहम है उनकी भूमिका
आरंभिक काल
आरंभिक काल में शिक्षा पूर्णत: व्यक्तित्व विकास पर आधारित होती थी। गुरुकुल पद्धति में वेद- उपनिषद और पुराणों की शिक्षा दी जाती थी। शिष्यों को गुरु के आश्रम में ही रहना होता था और शिक्षण के साथ अन्य दैनिक कार्य जैसे जंगल से लकड़ियां लाना, साफ-सफाई, खाना पकाना सभी कार्य करना होते थे। तात्पर्य यह है कि छात्रों को जीवन की कठिन सच्चइयों से रूबरू करवा दिया जाता था। वहां किसी तरह का कोई भेद नहीं था, राजा के पुत्र हों या आम जनता के सभी साथ रहकर परिश्रम और शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु का आदेश अंतिम होता था और ब्रrावाक्य की तरह लिया जाता था।
मध्यकाल
सामाजिक उपयोग की शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाने लगा। भाषा, राजनीति और गणित जैसे विषयों को स्थान दिया गया। शिक्षक और छात्रों के मध्य दूरी कम हुई और इंटरेक्शन बढ़ा। अंग्रेजों के आने पर कई विदेशी भाषाओं का भी समावेश हुआ। शिक्षकों ने भी इन्हीं विषयों में योग्यता हासिल की ताकि छात्रों को नई शिक्षा पद्धति से साक्षात्कार हो सके। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, भूगोल, विधि जैसे नए विषयों ने अपनी पैठ बनाई और अंग्रेजी ने तो जबर्दस्त प्रभाव डाला। अंग्रेजी तो धीरे-धीरे सामाजिक स्तर का प्रतीक बन गई। व्यक्ति के विकास के साथ उसके काम में आने वाली शिक्षा देने का प्रचलन शुरू हुआ।
वर्तमान
पूरी तरह से तकनीकी, व्यक्ति कौशल, और व्यावसायिक हो गई है। नैसर्गिक संभावनाओं को दरकिनार करने वाला हो गया है आज का शिक्षा तंत्र। शीघ्र रोजगार मिल जाए बस वैसी ही और उतनी ही शिक्षा का महत्व रह गया है। यहां तक शिक्षकों में भी असंतोष है अपनी भूमिका को लेकर। गुरु से हटकर अब वे फेसेलिटेटर के रूप में स्थापित हो गए हैं। आजीविका का उपकरण मात्र बनकर रह गई है शिक्षा। प्रबंधन और तकनीकी विषयों पर अतिरिक्त ध्यान दिया जा रहा है। कम्प्यूटर, इंटरनेट और हाईटेक उपकरणों ने बदल दिया है शिक्षा का परिदृश्य। अब वह काउंसलर, मित्र, करियर गाइड और आध्यात्मिक गुरु के रूप में छात्र के साथ हैं।
भविष्य
आने वाला दौर शिक्षकों के लिए भी चुनौतियों से भरा हुआ है और छात्रों के लिए तो है ही। ऑन लाइन एजुकेशन, डिग्रियां , बढ़ती जनसंख्या रोजगार की न्यूनता। हाइटेक हो जाएगी एजुकेशन। कॉलेजों से तो छात्रों का नाता लगभग टूट ही गया है, स्कूलों में भी इसका असर दिखाई देगा। आश्चर्य नहीं की शिक्षकों का स्थान लैपटॉप या कंप्यूटर ले लें..। उसे पूर्ण रूप से सुविधाए उपलब्ध करवाने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाएगा। पर शिक्षकों का एक तबका इस से सरोकार नहीं रखता है। वे मानते हैं कि शिक्षकों की ज्यादा जरूरत होगी। प्रोत्साहित करने का और मनोबल बढ़ाने का काम मशीने कभी नहीं कर पाएंगी। (महाविद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षकों से विशेष बातचीत)