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सरकार लेफ्ट के सुझाव मानने को बाध्य नहीं

नई दिल्ली: सरकार ने दो टूक कहा है कि एटमी करार पर गठित साझा समिति वाम दलों की चिंताओं को ध्यान में जरूर रखेगी, लेकिन उन्हें स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। यह बयान इस मसले पर जारी वाक्युद्ध को भड़का सकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने एक न्यूज चैनल के शो में कहा,‘किसी बात को ध्यान में रखने का मतलब यह कदापि नहीं होता कि आप उसे मानने के लिए बाध्य हैं।’ उन्होंने यह भी साफ किया कि ‘123 समझौते’ पर फिर बातचीत का सवाल ही नहीं है।

यह इंटरव्यू समिति के गठन से पहले रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन बयान समिति बनने के बाद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। सिब्बल खुद समिति के सदस्य हैं। ऐसे में उनका बयान खासी अहमियत रखता है। उन्होंने दावा किया कि वाम दलों ने ऐसा कभी नहीं कहा कि सरकार उनकी चिंताओं को स्वीकार करने के लिए बाध्य है।

लेफ्ट-यूपीए समिति पर संसद में हंगामा : करार पर यूपीए और वाम दलों की साझा समिति के गठन को लेकर बुधवार को संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ। राजग और तीसरे मोर्चे ने इसे संसद और राष्ट्र का अपमान करार देते हुए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनाने की मांग की। हालांकि सरकार यह मांग पहले ही नामंजूर कर चुकी है।

शोर-शराबे की वजह से दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। लोकसभा में राजग सदस्य ‘जेपीसी लाओ-देश बचाओ’ नारे लगाते हुए आसन के सामने जमा हो गए। इस पर डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल ने अपराह्न् तीन बजे बाद सदन की कार्यवाही गुरुवार तक स्थगित कर दी। इससे पहले जद-यू के प्रभुनाथ सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार को प्राइवेट कंपनी की तरह चलाया जा रहा है। यूपीए और वाम दल करार को अपना ‘पारिवारिक मामला’ मानकर चल रहे हैं।

सुबह लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने पर सदन में प्रतिपक्ष के उपनेता वीके मल्होत्रा ने समिति के गठन पर कड़ी आपत्ति की। स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने उत्तेजित सदस्यों को शांत करने की कोशिश करते हुए प्रश्नकाल बाधित न करने की गुजारिश की। उन्होंने कहा कि सदस्यों को बाद में यह मसला उठाने की इजाजत दी जा सकती, लेकिन प्रतिपक्षी सदस्यों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इस दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी भी सदन में मौजूद थे।

मानसून सत्र जल्द खत्म करने की अटकलें : करार पर ‘सियासी बवंडर’ को देखते हुए मानसून सत्र निर्धारित अवधि से पहले ही खत्म करने की अटकलों के बीच मुखर्जी ने लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी से मुलाकात की। वर्तमान सत्र 14 सितंबर तक चलना है, लेकिन करार को लेकर संसद की कार्यवाही बार-बार पटरी से उतरती रही है।

* ‘समिति का गठन संसद के विशेषाधिकारों का जानबूझकर किया गया उल्लंघन है। सरकार ने निजी समिति बनाकर संसद में प्रतिपक्ष की भूमिका को पूरी तरह नकार दिया है।’
- लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता (‘करार का अपहरण’ शीर्षक वाला बयान जारी करते हुए )

* ‘भाजपा और उसके सहयोगी दल यदि हमारी आंतरिक समिति में शामिल होने के इतने उत्सुक हैं तो पहले वे यूपीए में शामिल हों या बाहर से उसे समर्थन देने की घोषणा करें। उसके बाद हम विचार करेंगे। अभी उनके पेट में दर्द क्यों हो रहा है। संसद में हंगामे का मकसद सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर बहस में अवरोध खड़ा करना था।’
- अभिषेक ¨सघवी, कांग्रेस प्रवक्ता



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