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टीचर्स ने ही दिलाई मंजिल

विमन होने का अहसास मात्र ही लड़कियों को बताता है कि उन्हें टीचर बनना है। मगर इनके साथ ऐसा नहीं हुआ। आम धारणा हो चुकी है कि अगर लड़की है तो टीचिंग प्रोफैशन में डाल तो। ये हैं तो विमन मगर लड़कियां होने के कारण ये टीचिंग प्रोफैशन में नहीं हैं। ये टीचर बनी हैं, अपने गुरुओं के दिखाए रास्ते के दम पर। टीचर्स-डे पर इन्होंने बताया कि कैसे ये बनी हैं टीचर्स के दम पर टीचर -

गुरु का दर्जा ऐसे ही भगवान के समान नहीं माना जाता, बल्कि गुरु तो वो है जो आपकी तकदीर बनाता है। कुछ ऐसा ही मानती हैं लेडी टीचर्स।

दो लाइनों ने बदल दी जिंदगी पुलिस डीएवी स्कूल पीएपी कैंपस की प्रिंसीपल रश्मि विज ने बताया कि उनकी टीचर्स की तरफ से कही गई दो लाइनों से उनकी जिंदगी बदल गई। उन्होंने बताया कि कॉलेज टाइम में उनकी साइकोलॉजी की टीचर मोहन गीत ने उन्हें एक बार कहा था कि ‘जिंदगी में अगर हमेशा टॉप पर रहोगी तो तुम्हें करियर की वेट नहीं करनी होगी, बल्कि करियर तुम्हारी वेट करेगा। उनकी इस बात को हमेशा फॉलो किया और हमेशा टॉप किया। इसीलिए मुझे जिंदगी में यह मुकाम मिला है, जिसके सदका आज मुझे करियर की वेट नहीं करनी पड़ी।

उन्होंने बताया कि स्कूल टाइम में वह बिल्कुल सिंपल थी और उनमें कांफिडैंस की भी कमी थी लेकिन उनकी मैडम भल्ला को उनमें बहुत विश्वास था और वही उन्हें लीडरशिप क्वालिटी के बारे में बताती थी उन्होंने ही उन्हें हैड गर्ल बनाया और इसके लिए उन्हें स्कूल की बैस्ट गर्ल का अवार्ड भी मिला। यही नहीं एमए के बाद उनकी पीएचडी में गाइड रही डॉ. रीटा अग्रवाल ने उन्हें खुद पर विश्वास करना सिखाया। उनका कहना था कि जिंदगी में सब अकेले होते हैं और जो लोग दूसरों पर डिपैंड होकर चलते हैं वह अक्सर पीछे रह जाया करते हैं इसलिए इन टीचर्स की बातें आज भी स्कूल में अप्लाई करती हैं।

मुझमें ढूंढी मेरी पसंद कैम्ब्रिज इंटरनैशनल स्कूल की प्रिंसीपल दीपा डोगरा कहती हैं कि उनकी सफलता संभव नहीं थी अगर मुझमें मेरे टीचर यह ढूंढते कि मेरी पसंद क्या है, मैं कौन से सब्जैक्ट्स पढ़ना चाहती हूं। वे हमेशा कहते थे कि स्कूल इस तरह का हो जहां स्टूडैंट्स आना चाहें और टीचर ऐसा हो जिससे स्टूडैंट्स पढ़ना चाहे. और इसी बात को वह अपने स्कूल में अप्लाई करती हैं। उनका कहना है कि इससे वह अपने टीचर डॉ. एसवी पराशर को हमेशा अपने साथ लेकर चलते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी ट्रेनिंग में उनसे ही सीखा था कि बच्चों को कभी वो मत पढ़ाओ जो खुद पढ़ाना चाहते हों बच्चे में ढूंढों कि बच्च किस तरह से पढ़ना चाहता है।

उन्होंने बताया कि यही उनका टारगेट भी है और उनकी अचीवमेंट भी। उन्होंने बताया कि टीचर्स डे पर ही नहीं बल्कि हमेशा उनकी गाइडेंस को साथ लेकर चलते हैं। मैं आज टीचर्स-डे पर अपने उन सभी टीचर्स को विश करना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे समझा। मेरी समझ को आगे बढ़ाया और मुझे दिन-रात पढ़ने की प्रेरणा दी ताकि मैं बढ़ सकूं आगे।

कॉलेज टीचर ने जिंदगी बदल दी अंबिका माडर्न स्कूल प्रिंसीपल नविता पुरी ने बताया देव समाज बीएड कॉलेज टीचर विनीता खहरा ने उनकी जिंदगी बदल दी थी उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि वह पूरे कॉलेज को रिप्रसेंट कर सकती हैं। प्रिंसीपल नविता ने बताया कि उन्हें कॉलेज में इलैक्शन के लिए खड़ा कर दिया था और इलैक्शन उन्होंने जीत भी लिया था। इस जीत से उन्होंने सीखा था कि कोशिश करने से हर जीत संभव है और इसी बात को आदर्श मानकर चली नविता ने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और बैस्ट स्टूडैंट ऑफ द इयर का अवार्ड भी जीता। वे हमेशा अपने टीचर्स से मिलती रहती हैं।

टेलैंट की तलाश पूरी हुईएपीजे स्कूल की प्रिंसीपल रंजना सूद का मानना है कि हर बच्चे में टेलैंट होता है। बस उसमें सिर्फ यह ढूंढना पड़ता है कि उसमें क्या कैपेबिलिटी है। रंजना सूद ने बताया कि उन्होंने अपने आर्ट टीचर से स्कूल में सीखा था कि बच्चों में टेलैंट देखना चाहिए और जरूरी नहीं कि वह पढ़ाई में इंटैलीजेंट हो दूसरी कैपेबिलिटीज भी देखनी चाहिए। स्कूल की जो टीम नासा गई थी उसमें कई स्टूडैंट्स ज्यादा इंटैलीजेंट नहीं थे लेकिन उनमें वो कैपेबिलिटी थी कि वो टीम को जीता दें। कॉलेज टाइम में डॉ. गोरावारा हमेशा कहती थी कि बड़े सपने देखने चाहिए क्योंकि सपने देखने से ही सपने साकार होते हैं.. इसीलिए उन्होंने खुलकर सपने देखे और उन्हें मेहनत से साकार भी किया।



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