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International International न्यूयॉर्क: गरीबी और श्रमिकों की उत्पादकता के बीच संबंध को उजागर करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार श्रमिकों के प्रशिक्षण और उनकी कार्यकुशलता बढ़ाने की दिशा में समुचित निवेश गरीबी को कम करने में मददगार हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि इससे श्रमिकों की उत्पादकता को बेहतर बनाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रोजगार के रुझान संबंधी टीम के प्रमुख लॉरेंस जेफ थॉमसन द्वारा ‘की इंडिकेटर्स ऑफ द लेबर मार्केट’ नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘श्रम’ किसी भी गरीब की इकलौती ‘पूंजी’ होती है। अगर गरीबी घटानी है तो श्रमिकों के काम करने के तरीके को बेहतर बनाकर उनकी उत्पादन क्षमता और अंतत: उनकी कमाई को बढ़ाया जा सकता है।
थॉमसन के अनुसार अध्ययन के दौरान यह बात सामने आई है कि दक्षिण और पूर्वी एशिया में ऐसे कामकाजी गरीबों की संख्या में तुलनात्मक रूप से गिरावट आई है, जो काम तो करते हैं, लेकिन उनकी प्रतिदिन की कमाई दो डॉलर से भी कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि पिछले 10 वर्र्षो में पूर्वी एशिया में उत्पादन दोगुना हुआ है, फिर भी एक साल की अवधि में प्रति श्रमिक उत्पादन क्षमता के मामले में अमेरिका अब भी शीर्ष पर है।
आईएलओ के ताजा आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 1.3 अरब श्रमिकों की उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इस कारण इनमें से कम से कम आधे या तो गरीब हैं या फिर गरीबी की कगार पर हैं। इसके अलावा 20 करोड़ से अधिक बेरोजगार हैं।