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हीरानी के कर्जदार हैं वारसी

परदे के पीछे अरशद वारसी नृत्य निर्देशन में कुशल हैं, परंतु अमिताभ बच्चन ने उन्हें अपनी कंपनी की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ में सहायक नायक की भूमिका दी थी। फिल्म के असफल होने पर अरशद वारसी को अन्य अवसर नहीं मिले और लंबे समय तक वे गुमनाम जिंदगी ढोते रहे। राजकुमार हीरानी की पटकथा ‘मुन्नाभाई’ शाहरुख को बहुत अच्छी लगी, परंतु कुछ कारणों से उन्होंने यह भूमिका स्वीकार नहीं की। हीरानी ने नायक केरूप में संजय दत्त को चुना, जबकि उनके अन्यतम मित्र ‘सर्किट’ की भूमिका के लिए अरशद वारसी को चुना गया। दोनों भूमिकाएं इतनी सशक्त थीं कि नए कलाकारों को भी लोकप्रिय बना सकती थीं। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने दोनों पात्रों को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। अरशद वारसी अच्छे कलाकार हैं और उनके पास अब फिल्मों के प्रस्ताव भी आने लगे हैं, परंतु अभी तक वे ‘मुन्नाभाई’ वाली सफलता को दोहरा नहीं पाए हैं। उनकी एकल नायक वाली फिल्म भी असफल रही। नतीजा साफ है कि लेखक और निर्देशक ही सफलता रचते हैं। कलाकार तो उनके हाथों की कठपुतलियां मात्र हैं।

राजकुमार हीरानी बिजली के खंबे से भी अभिनय करा सकते हैं, परंतु ‘करंट’ उनके बिना झटके खा सकता है, दे नहीं सकता। इस तथ्य के बावजूद लोग सितारों को सर-आंखों पर चढ़ाते हैं। आज संजय लीला भंसाली के अतिरिक्त किसी भी निर्देशक को सितारा दर्जा प्राप्त नहीं है। फिल्मों की बात करते समय भी लोकप्रिय सितारों की ही चर्चा होती है। राकेश रोशन को भी सितारा दर्जा प्राप्त है।

यह उन्हीं का आत्मविश्वास है कि आधा दर्जन असफल फिल्मों में अभिनय करने के बाद भी उन्होंने रितिक के साथ ‘कोई मिल गया’ में सफलता को दोहराया। राकेश ने रितिक रोशन को तीन बार जन्म दिया है। दरअसल राकेश रोशन की एक फिल्म ‘करण-अजरुन’ की कमाई संजय लीला भंसाली की चारों फिल्म के योग से भी अधिक है, परंतु मीडिया में भंसाली ज्यादा लोकप्रिय हैं। राकेश रोशन स्वयं कुछ नहीं बोलते, उनका काम बोलता है।

अनेक असफल फिल्मों में काम करने वाले शाहिद कपूर और अमृता राव, जिन्होंने फरहा खान की फिल्म ‘मैं हूं ना’ में सहायक नायिका की भूमिका निभाई थी, को लेकर सूरज बड़जात्या ने सुपरहिट फिल्म ‘विवाह’ बनाई, जबकि उनकी पिछली फिल्म ‘मैं प्रेम दीवानी’ तीन लोकप्रिय सितारों के साथ असफल रही थी। निर्देशक की शक्ति उसी समय पता चलती है, जब वह गैर-सितारा फिल्म को सफल बनाता है।

शूटिंग प्रारंभ होने के कुछ दिन पहले ही दिलीप कुमार ने खराब सेहत के कारण फिल्म ‘प्यासा’ में काम करने से इंकार कर दिया, जिसके बाद गुरुदत्त ने खुद ही नायक बनने का फैसला किया। ‘प्यासा’ की नायिका वहीदा रहमान ने उससे पहले फिल्म ‘सीआईडी’ में खलनायिका की छोटी सी भूमिका अदा की थी। ‘प्यासा’ की एकमात्र लोकप्रिय सितारा माला सिन्हा थीं, वह भी एक छोटी सी भूमिका में। राजकपूर ने फिल्म ‘आह’ की असफलता के बाद दो बाल कलाकारों को लेकर ‘बूट पालिश’ जैसी सफल फिल्म बनाई। इसी तरह फिल्म ‘जोकर’ की असफलता के बाद उन्होंने दो नए कलाकारों के साथ सुपरहिट फिल्म ‘बॉबी’ की रचना की। पृथ्वीराज कपूर फिल्म ‘सिकंदर’ के बाद कोई भी फिल्म एक लाख रुपए से कम के मेहनताने में नहीं करते थे, उधर वी. शांताराम कलाकारों को इतनी बड़ी रकम देना पसंद नहीं करते थे, अत: ‘शकुंतला’ में वे स्वयं दुष्यंत बने। ‘दो आंखें बारह हाथ’ जैसी सफल फिल्म के नायक भी शांताराम ही थे।

उन्होंने ‘सी’ क्लास स्टंट फिल्मों के असफल नायक महीपाल को लेकर 50 सप्ताह तक चलने वाली फिल्म ‘नवरंग’ बनाई। इसी तरह उन्होंने गोपीकृष्ण जैसे बदसूरत कलाकार को लेकर साल भर चलने वाली ‘झनक झनक पायल बाजे’ रची। सिनेमा का आधार ही निर्देशक है और जब तक अवाम निर्देशक को सितारे का दर्जा नहीं देगा, तब तक सिनेमा दो कौड़ी की औकात रखकर करोड़ों मांगने वाले सितारों से मुक्त नहीं होगा। आज कितने दर्शक निर्देशक का नाम देखकर फिल्म देखने का फैसला करते हैं। अरशद वारसी आजकल एक करोड़ रुपए से अधिक धन मांग रहे हैं। यह एक तरह से राजकुमार हीरानी द्वारा रचित पात्र ‘सर्किट’ की कमाई है। क्या वे कुछ प्रतिशत हीरानी को देंगे?





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