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Bachhon Ka Kona Bachhon Ka Kona ५ सितम्बर शिक्षक-दिवस पर विशेष
लीजए, फिर आ गया वह एक दिन जब चारों ओर शिक्षकों के सम्मान में कार्यक्रमों की धूम होगी। भावुक उद्गारों, प्रभावशाली वक्तव्यों के साथ उनका आदर-सत्कार होगा, लेकिन एक बार मन को टटोलकर देखिए, सम्मान सचमुच दिल में है या समारोह सिर्फ़ औपचारिकता है। अगर मन में शिक्षकों के प्रति आदरभाव है, उन पर भरोसा है, तो वह व्यवहार में परिलक्षित क्यों नहीं होता? क्यों अधिकांश अभिभावक अपने पुराने गुरुजनों को याद करते हुए शिक्षा के गिरते स्तर, बच्चों में बढ़ती अनुशासनहीनता, ज्ञान पर हावी व्यवसायिकता पर अफसोस जताते मिलते हैं? शिक्षक भी जानते हैं कि गुरु को ब्रrा, विष्णु मानने वाले, इस देश में, गुरु से वेतनभोगी शिक्षक, शिक्षाकर्मी या ‘मिस-मैम’ तक के बदलावों में यही उनकी नियति है। शिक़ायतें, असंतोष, दोषारोपण लेकिन उनका पक्ष, उनकी समस्याएं, स्थिति देखने-जानने में कितनों की दिलचस्पी है?
उनकी भी नही, जिनके बच्चों के भविष्य का दायित्व शिक्षकों पर होता है, बल्कि अभिभावक जाने-अनजाने उनकी कई मुश्किलों की वजह बनते हैं। बच्चों के प्रति आज माता-पिता बेहद जागरूक हो गए हैं। इतने कि वे कई बार शिक्षक के सीमा क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं या उनकी मान-मर्यादा को ठेस पहुंचा देते हैं। विडंबना यह है कि शिक्षक व अभिभावक दोनों का लक्ष्य एक होते हुए भी कई बार वे आमने-सामने खड़े नÊार आते हैं।
अनुशासन का सबकपार्थ कक्षा दो का छात्र है। चंचल, थोड़ा शैतान भी। वह क्लास में काम पूरा नहीं करता है। टीचर ने उसे बहुत बार समझाया, पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। एक दिन टीचर ने उसे डांट दिया।
अगले ही दिन पार्थ के पिताजी डांट की वजह पूछने आ गए और साथ ही न डांटने की ताकीद भी की। कुछ ही दिनों बाद वे फिर आए। इस बार शिक़ायत यह थी कि पार्थ कक्षा का कार्य पूरा नहीं करता, टीचर ध्यान क्यों नहीं देतीं? अब बताइए, टीचर क्या करे?
अनुशासन विद्यार्थी जीवन का अभिन्न अंग है। पर आज गुरु से मित्रवत व्यवहार की उम्मीद की जाती है। चलिए, यह चोला भी शिक्षक ओढ़ ले, पर अब मित्र से अनुशासन की अपेक्षा तो नहीं कर सकते न? दो विरोधाभासी स्थितियां हैं और शिक्षक को दोनों पर ही खरा उतरना है। कैसे? यह जानना शिक्षक का काम है।
सिखाने की प्रकिया में क्या माता-पिता को कुछ कठोर नहीं होना पड़ता है? फिर शिक्षक के पास ४क्-५क् या उससे भी •यादा बच्चे हैं। सारे अलग स्वभाव, अलग पृष्ठभूमि से आए हुए और उन सभी को तय समय में निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा भी करवाना है। हो सकता है एक बच्च ख़ुद ही अपना कार्य कर लेता हो, पर दूसरा समझाने पर करे और तीसरा बिना ज़ोर से कहे न सुनता हो। यह भी करने के लिए मना किया जाए, तो शिक्षक के पास बच्चे को उसके हाल पर छोड़ देने का ही विकल्प बचता है।
यह भी सच है कि इन दिनों शिक्षकों के द्वारा बच्चों को बुरी तरह मारने की कई घटनाएं सामने आई हैं, जबकि लगभग सभी स्कूलों में शारीरिक दंड प्रतिबंधित है। पर क्या कुछ भ्रमित, अविचारियों की वजह से हर शिक्षक पर शक करना सही है? सज़ा नहीं पर क्या शिक्षक के प्रति आदरयुक्त भय भी अनुचित है? अगर यह भावना न रहे, तो बच्च शिक्षक की क्यों सुने और क्यों माने? तो कुछ मिलाकर नुक़सान किसका हुआ, ख़ुद देख लीजिए।
खो गया विश्वासयह कहानी जैसा लगता है। कभी गुरुकुल में कई वर्षो तक रहते हुए बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। सोचिए, गुरु के प्रति कैसी अगाध श्रद्धा, अटूट विश्वास होगा कि माता-पिता बच्चों को उन्हें सुपुर्द कर निश्चिंत हो जाते थे। शिक्षण प्रक्रिया में अभिभावकों की कोई भूमिका नहीं थी। यह सर्वथा शिष्य और गुरू की पारस्परिक क्रिया थी। बच्चे की शिक्षा-दीक्षा, व्यक्तित्व निर्माण के लिए गुरु ही उत्तरदाई होते और माता-पिता गुरु को चुनौती नहीं दे सकते थे।
अब न वो काल रहा है, न शिक्षण पद्घति, पर इससे शिक्षक-छात्र का मूल उद्देश्य तो नहीं बदल जाता है। अब शिक्षक के प्रति विश्वास और सम्मान का भाव न जाने कहां लुप्त हो गया है। पेरेन्ट्स-टीचर मीटिंग में ऐसे कई उदाहरण दिख जाएंगे। माता-पिता शिक्षक के ज्ञान पर, उनके पढ़ाने के तरीके पर सीधे-सीधे सवाल उठाने से नहीं हिचकिचाते हैं, बल्कि इसे अपना अधिकार मानते हैं और कई बार उनके सवाल या आपत्तियां गैर ज़रूरी और ग़लत भी होती हैं। अनेक अभिभावक, टीचर्स से बातचीत में न भाषा का ़ख्याल रखते हैं, न लहज़े का। इन बातों से एक शिक्षक का आत्मसम्मान व गरिमा तो आहत होती ही है, मूक दर्शक बने बच्चों पर इसका जो प्रभाव पड़ता है, फिर यही अनादर और आक्रमकता उनके व्यवहार में भी झलकती है।
उश्वमीदों का पहाड़आजकल एकल परिवारों में एक या दो संतानों पर माता-पिता अपेक्षाओं का जो बोझ लादते हैं, उसका भार शिक्षकों को भी सहना पड़ता है। हर अभिभावक अपने बच्चे को ‘ऑल-राउंडर’ देखना चाहता है। ‘मेरे बेटे को ड्रॉइंग में ईनाम क्यों नहीं मिला?’ ‘हमारी बच्ची हैड गर्ल क्यों नहीं बन सकती?’ ‘उसने तो अच्छा लिखा था फिर भी नंबर कम मिले।’ ऐसी अनंत शिक़ायते हैं, जो रोज़ टीचर्स तक पहुंचती हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे को पूरा ध्यान मिले, चाहे पढ़ाई हो या अन्य गतिविधि। ऐसी अव्यवहारिक अपेक्षाओं के चलते वे अपने बच्चे की क्षमता व प्रदर्शन को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं। सुनिधि की मम्मी चाहती हैं कि सुनिधि को ग्रुप डांस में शामिल किया जाए, जबकि टीचर जानती हैं कि उससे बेहतर डांस करने वाली कई लड़कियां हैं। उनके साथ टीचर कैसे नाइंसाफी करे। ५क् बच्चों की कक्षा में शिक्षक पर ऐसी ५क् उम्मीदों का बोझ हमेशा रहता है। इसके अलावा ढेरों शैक्षणिक व अन्य ज़िम्मेदारियां भी हैं, जो उन्हें समय पर पूरी करनी हैं।
हों उपाय ज़ाहिर है, माता-पिता का एकमात्र उद्देश्य बच्चों की बेहतरी है और उनके इस व्यवहार का कारण भी यही है। लेकिन यह अतिरिक्त सजगता टीचरों के लिए मुसीबत बन रही है। यह जान लें कि स्कूल ‘घर से दूर एक घर है’ तो शिक्षक उनके दूसरे अभिभावक हैं। आपके बाद बच्चों का भला वे ही सोच सकते हैं।
शिक्षण अब शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकों की एक त्रिकोणीय व्यवस्था है। अभिभावकों को इस व्यवस्था में शामिल किया गया है क्योंकि बच्चों को उनसे बेहतर कोई नहीं जान सकता है। वे बच्चे की ज़रूरत और दिक्कतों के बारे में शिक्षक से सीधे संवाद कर सकें। इस संवाद को सार्थक, आवश्यक व सम्मानजनक ही रहने दें। शिक्षक-छात्र के बीच सहज व आत्मीय सम्बंध रहे, इसमें आप बाधक न बनें।
शिक्षक की सीमाओं और मुश्किलोें को जानें और संवेदनशीलता के साथ महसूस भी करें। अपनी भूमिका बख़ूबी निभाएं। बच्चों से होमवर्क पूरा करवाएं, रोज़ उनकी डायरी, नोटबुक इत्यादि देख लें, स्कूल व टीचर के निर्देशों का ख़ुद भी पालन करें व बच्चों को भी प्रेरित करें। भूलकर भी बच्चों के सामने शिक्षक के लिए कोई असम्मानजनक टिप्पणी न करें, न ही टीचर से बच्चों के सामने कोई विवाद करें।
गुरु अपनी सम्पूर्ण गुरुता के साथ पुर्नप्रतिष्ठित हो पाएं, इसके लिए शिक्षकों के साथ कुछ प्रयास अभिभावक भी करें। गुरु की गरिमा का मान रखेंगे, तो वे भी छात्र को एक संख्या नहीं व्यक्ति मानकर उसके सर्वागीण विकास के अपने दायित्व में खरे उतर सकेंगे। अपने बच्चों के भविष्य निर्माता के लिए इतना तो किया ही जा सकता है।