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इटारसी:
घर-परिवार की जिम्मेदारी निभाने व जनशिक्षा की अलख जगाने के लिए जरूरी नहीं, आंखें हों। यह साबित किया है 42 वर्षीय दृष्टिहीन शिक्षक कमलसिंह सोजोनिया ने। रोजाना बस से 32 किमी का सफर तय करने के बाद वे दमुआ स्थित घर से जुन्नारदेव जनपद शिक्षा केंद्र पहुंचते हैं। श्री सोजोनिया को शिक्षक दिवस पर होशंगाबाद जिले के इटारसी में साहित्यकार विपिन जोशी स्मारक समिति द्वारा ‘कर्मवीर सम्मान’ से नवाजा जा रहा है।
समिति के प्रभात खंडेलवाल कहते हैं, राज्य के 22 शिक्षकों के साथ मंच पर इनका सम्मान निश्चित ही उन लोगों को प्रेरणा देगा, जो थोड़ी-सी विपरीत परिस्थितियों में घबरा जाते हैं। दृष्टिबाधित कमलसिंह इन दिनों छिंदवाड़ा जिले के ग्रामीण इलाके में रहने वाले 5 से 14 वर्ष तक के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। घर में माता-पिता, पत्नी व दो बच्चे हैं। कक्षा नौवीं में पढ़ने वाली उनकी 11 वर्षीय बेटी निकिता सुबह के अखबार से लेकर वह सब किताबें पढ़कर सुनाती है, जो उसके पिता सुनना-समझना चाहते हैं। 30 वर्ष की उम्र में आंखों में धुंधलापन आने के कारण नागपुर और अहमदाबाद में नाकाम ऑपरेशन हुआ और आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई।
पहले वे ड्राइवर थे, गाड़ी चलाना मुनासिब नहीं होने पर पाढर में ब्रेललिपि सीखी और शिक्षा की रोशनी आत्मसात करने का इरादा किया। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पत्नी आशा ने उन्हें हिम्मत दी। इनके छोटे भाई पूरनसिंह की पत्नी अर्चना धाकड़ ने बताया कि उनके जेठ आंखों की रोशनी जाने से कभी विचलित नहीं दिखे। खुद का काम दूसरों के भरोसे सौंपना उन्हें नापसंद है।
दमुआ में ही इनसे 15 वर्ष छोटे राजीव हिवसे पक्के मित्र हैं। दो साल पहले राजीव संविदा शिक्षक की परीक्षा में इनके राइटर बने थे। उनका कहना है कि एक शक्ति जाने पर दूसरी शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं।