अभिमत
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि देश का महत्वपूर्ण चिकित्सा संस्थान एम्स उपलब्धियों के लिए कम विवादों के लिए अधिक जाना जाने लगा है। स्वास्थ्य मंत्री एम्स के अध्यक्ष होते हैं और इस नाते अंबुमणि रामदास जो स्वयं एक डाक्टर हैं का हस्तक्षेप एम्स प्रशासन को कभी गवारा नहीं रहा।
संस्थान के डायरेक्टर और प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. वेणुगोपाल और उनके बीच जो तनातनी पिछले कुछ समय से चल रही है उसे अहं का टकराव माना जाए या अधिकारों को कब्जाने की कोशिश, लेकिन इससे नुकसान संस्थान का हो रहा है। हाल के प्रसंग में स्वास्थ्य मंत्री के रुख को अदालत ने भी सही नहीं माना और महीनों से उनके पास पड़ी डिग्रियों पर 24 घंटे में हस्ताक्षर करने का आदेश दिया।
एम्स एक स्वायत्त संस्था है, जिस पर सरकार का सीधे नियंत्रण नहीं होता, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमोदन के बिना संस्थान व्यावहारिक रूप से काम नहीं कर सकता। एम्स की कार्यप्रणाली को लेकर स्वास्थ्य मंत्री के अपने खयालात हो सकते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे उन्हें लागू करने के लिए संस्थान के दैनंदिन कामकाज में अवरोध पैदा करें। यह तर्क भी दिया जाता है कि संस्थान को राजनेताओं से मुक्त रखा जाए, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी व हस्तक्षेप को नकारा जाना न तो संभव है और न वांछनीय। दूसरी ओर किसी संस्थान के स्वायत्त होने का भी यह अर्थ नहीं होता कि संस्था का प्रमुख कार्यकारी अधिनायक हो जाए।
एम्स के विवादों पर बार-बार अदालतों का हस्तक्षेप प्रिय नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि एम्स के संचालन की पद्धति व नियमों पर एक बार विस्तार से विचार किया जाए तथा आवश्यक हो तो उसमें रद्दोबदल भी इस तरह किया जाए कि दैनंदिन कार्यो के लिए विवाद की स्थिति न बने। इसकी पहल स्वयं स्वास्थ्य मंत्री ही कर सकते हैं अन्यथा इसके लिए भी अदालत को अपनी भूमिका निभानी पड़ सकती है।