क्रिकेट में मानवीय गलतियों के लिए स्थान स्वीकार करने का प्रबल समर्थक होने के बावजूद मुझे लगता है कि सातवें वनडे में अंपायर अलीम डार की भारी गलतियां पचाने के
योग्य नहीं हैं। शायद इससे तकनीक के उपयोग को मजबूत आधार मिलता है। अंपायरों के गलत निर्णयों से न केवल मैच के परिणाम व खिलाड़ियों के कैरियर पर असर पड़ता है, बल्कि दर्शकों का पैसा भी व्यर्थ जाता है। यदि तकनीक इस सबसे उबरने में सहायता देती है, तो फिर क्यों नहीं इसी का सबसे ज्यादा उपयोग किया जाए?
लॉर्डस में भारत की पारी में सचिन व राहुल द्रविड़ गलत निर्णय के शिकार हुए। दोनों ही निर्णय अंपायर अलीम डार ने दिए। सचिन के आउट होने से दर्शक भी खासे निराश हुए होंगे, जो लॉर्डस पर लिटिल मास्टर की शायद आखिरी पारी को यादगार पारी में बदलते देखने के लिए बेताब थे।
अलीम ने तेंडुलकर को विकेट के पीछे कैच आउट करार दिया, लेकिन गेंद उनके बल्ले के बाहरी किनारे से काफी दूर से निकली थी, तब तक सचिन 30 रन बना चुके थे और इससे भी ज्यादा रन बनाने के लिए काफी अच्छे फॉर्म में दिख रहे थे। बेचारे डार सचिन के बल्ले के पैड से टकराने की आवाज से मात खा गए, लेकिन कैमरे ने इसे स्पष्ट रूप से पकड़ लिया था। इससे कुछ ही समय पहले वे राहुल द्रविड़ को पगबाधा करार दे चुके थे।
स्पष्ट कहूं तो डार ने रॉबिन उथप्पा को आउट न देकर गलती की, जबकि एंड्रयू फ्लिंटॉफ की गेंद इस युवा बल्लेबाज के बल्ले का किनारा लेकर विकेटकीपर के पास गई थी, लेकिन ऐसे मामलों में एक खराब निर्णय आवश्यक रूप से दूसरे गलत निर्णय को खारिज नहीं कर सकता है। दर्शक बड़े सितारों को खेलते हुए देखने के लिए काफी पैसा खर्च करते हैं और जब दो बड़े स्टार खिलाड़ियों को गलत तरीके से आउट दे दिया जाए तो दर्शकों को ठगे जाने का विचार करने का पूरा अधिकार है।