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अपनी ही कसौटी पर साक्षरता

दृष्टिकोण
आज की व्यवस्था के संदर्भ में विचार करें तो साक्षरता एक बहुआयामी विचारधारा है, जिसके पीछे मुख्यत: सर्वसाधारण को मौजूदा प्रतिस्पर्धा में मनुष्य की गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने-योग्य बनाने का भाव है। हालांकि भारतीय परंपरा में शिक्षा का संबंध अनिवार्यत: साक्षरता से नहीं था एवं उसमें भी इसके लक्ष्यों में भौतिक उन्नति की कामना शामिल नहीं थीं। महर्षि अरविन्द ने इसी परंपरा में शिक्षा को मनुष्य की पूर्णता के प्रकटीकरण का माध्यम मात्र कहा है।

जिसे हम साक्षरता कह रहे हैं यानी अक्षर-ज्ञान, उसे महात्मा गांधी ने महत्वहीन करार दिया। उनके अनुसार, 'जब मैंने और आपने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया हो, जब हमने नीति की नींव मजबूत बना ली हो, तब अगर हमें अक्षर-ज्ञान पाने की इच्छा हो, तो उसे पाकर हम उसका अच्छा उपयोग कर सकते हैं। किंतु वह शिक्षा आभूषण के रूप में ही अच्छी लगती है।' लेकिन इन स्वाभाविक मान्यताओं के विपरीत हमने पश्चिम का अनुकरण करके अक्षर-ज्ञान को शिक्षा का पहला सोपान मान लिया और यह केवल शिक्षित होने का मापदंड ही नहीं है, आर्थिक विकास का आधार भी है, इसलिए साक्षरता की आवश्यकता नजर आती है।

पहले हम यह देखें कि साक्षरता के पुरोधाओं ने इसकी परिभाष क्या दी है। परिभाष ही साक्षरता के संदर्भ में मूल्यांकन की कसौटी हो सकती है। यूनेस्को की परिभाष में एक साक्षर व्यक्ति वह है, जिसने ऐसी सभी आवश्यक ज्ञान एवं कुशलता प्राप्त कर ली है, जो उसे उन सभी गतिविधियों में शामिल होने के योग्य बनाता है, जहां उसके समूह या समुदाय के प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए साक्षरता आवश्यक है तथा जिसने पढ़ने, लिखने एवं गणना करने में इतनी योग्यता प्राप्त कर ली है कि वह अपनी कुशलता का अपने या अपने समुदाय के विकास के लिए उपयोग कर सके। भारत के राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (एनएलएम) के अनुसार साक्षरता का अर्थ है व्यक्ति को प्रतिदिन के जीवन में काम आने के योग्य पढ़ने, लिखने एवं गणना करने में समर्थ बना देना। भारत के जनगणना आयोग ने साक्षरता की परिभाष को किसी भारतीय भाष में पढ़ने और लिखने की क्षमता तक ही सीमित किया है।

इसका महत्व इसलिए है कि साक्षरता से संबंधित सर्वाधिक विश्वसनीय तथ्य व आंकड़े जनगणना से ही प्राप्त होते हैं। किंतु एनएलएम ने साक्षरता की जो दूसरी श्रेणी निर्धारित की - क्रियागत साक्षरता (फंक्शनल लिटरेसी) की - उसकी परिभाष काफी व्यापक है। इसमें पढ़ने, लिखने एवं गणना में आत्मनिर्भर होने के साथ एक-अपने वंचित होने के कारणों की समझ एवं विकास की प्रक्रिया में भागीदारी करके अपनी स्थिति में सुधार करने की क्षमता हासिल होना दो-अपनी आर्थिक स्थिति एवं जीवनस्तर में सुधार करने की क्षमता हासिल करना, तीन-राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, नारी समानता, छोटे परिवार के मापदंड के पालन को आत्मसात करना आदि शामिल हैं।

2001 की जनगणना से मिले आंकड़ों के अनुसार 7 वर्ष और उससे ज्यादा उम्र की दो-तिहाई पुरुष आबादी एवं आधा से ज्यादा (54.2 प्रतिशत) महिला आबादी साक्षर है। पुरुष एवं महिला आबादी में साक्षरता का अंतर 1991 के 24.8 से घटकर 21.7 रह गया। पूरी आबादी में 7 वर्ष एवं उससे ज्यादा उम्र की 65.5 प्रतिशत आबादी साक्षर है, जबकि 1991 में 52.2 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता वृद्वि की दर पुरुषों की तुलना में ज्यादा है। यह स्थिति यकीनन उत्साहवर्धक है।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि 1991 के मुकाबले सभी राज्यों में साक्षर आबादी की संख्या बढ़ी है। राजस्थान में वृद्धि सबसे अधिक 22.5 प्रतिशत थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ में 22.3 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 19.4 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 17 प्रतिशत एवं उत्तरप्रदेश में 16.6 प्रतिशत की वृद्वि हुई। बिहार में सबसे कम 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी थी। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वृद्धि का कारण नगरीकरण में है न कि विकास दर में। बहरहाल, इस प्रवृत्ति को देखते हुए कहा जा सकता है कि सन् 2011 के जनगणना के आंकड़ों में ये तस्वीरें और चमकदार नजर आएंगी। निश्चित रूप से हमें इसके लिए शिक्षा के प्रसार संबंधी कार्यक्रमों, उसमें भी लड़कियों और महिलाओं के संदर्भ में सकारात्मक नीतिगत हस्तक्षेपों को श्रेय देना होगा।

लेकिन कई बार राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ें जितना बताते हैं, उससे ज्यादा छिपा जाते हैं। मसलन, अलग-अलग राज्यों में और राज्यों के भीतर अलग-अलग जिलों, तहसीलों और प्रखंडों की साक्षर आबादी में काफी असमानता है। उदाहरण के लिए यदि केरल देश में 90.9 प्रतिशत साक्षरता के साथ शीर्ष पर है तो बिहार 47.5 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे।

बिहार देश का अकेला राज्य है, जहां साक्षरों की संख्या अभी भी 50 प्रतिशत से नीचे है। केरल, मिजोरम, गोवा एवं दिल्ली के अलावा केवल चार संघशासित क्षेत्रों में ही 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी साक्षर है। यानी केरल के बाद देश का कोई भी बड़ा राज्य अभी तक साक्षरता के मामले में आदर्श स्थिति का प्राप्त नहीं कर पाया है। 13 राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों में साक्षरता दर औसत 65.4 प्रतिशत से कम है एवं यहां साक्षर पुरुष एवं महिलाओं के बीच की खाई भी चौड़ी है। बहरहाल, इन आंकड़ों से साक्षरता के संदर्भ में इस बात के अलावा कि पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है, बहुत साफ निष्कर्ष निकालना कठिन है। क्या स्वयं एनएलएम की क्रियागत साक्षरता की कसौटी पर ये साक्षर खरे उतरते हैं?

क्या यूनेस्को की परिभाष के अनुसार इन्हें साक्षर माना जाएगा? सच कहें तो जनगणना ने साक्षरता की भारत के संदर्भ मे सीमित पर व्यावहारिक मापदंड अपनाया है। हालांकि जनगणना में भी व्यक्तियों के बारे में मिलीं सूचनाओं की सच्चाई जानने का कोई माध्यम नहीं होता। परिवार का एक व्यक्ति जो कह रहा है, वह सही है, इसकी गारंटी नहीं होती। इसमें साक्षर कहे गए सदस्य को बुलाकर जांचने का कॉलम नहीं होता है। इसलिए जो आंकड़ें हैं उन्हें संदेहों के परे बिल्कुल नहीं माना जा सकता। इसके अलावा एक व्यक्ति को उसकी गरिमा के अनुरूप आत्मनिर्भर होने, एक आदर्श नागरिक के सभी दायित्वों को आत्मसात करने तथा अपने प्रति हुए अन्याय को समझते हुए इससे निकलकर जीवन स्तर सुधारने में सक्षम होने का जो लक्ष्य है, उसकी कसौटी पर साक्षरता अभी सफल नहीं मानी जाएगी। जब इस देश के तथाकथित उच्च शिक्षित इन वैचारिक पैमानों पर खरे नहीं उतरते तो सामान्य साक्षरों से हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं।

-लेखक सुपरिचित टिप्पीणीकार हैं।





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