सम्पादकीय परमाणु करार को लेकर विपक्ष के हमलों का निशाना बनी केंद्र सरकार ने एक और ऐसा कदम उठा लिया है, जो नए विवाद का कारण बन सकता है। इसका सीधा संबंध एक बड़े वोट बैंक से है। भाजपा जितना ज्यादा इसका विरोध करेगी, कांग्रेस को उतने ही अधिक लाभ की उम्मीद है। साथ में आव्श्रस्ति की बात यह भी है कि सरकार के सहयोगी वामपंथी और सोनिया गांधी के प्रबल विरोधी सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी शायद सरकार के इस कदम का विरोध नहीं कर पाएंगे। दरअसल केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नौकरी में मुस्लिमों को ही अधिक से अधिक मौका दिया जाए।
केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने राज्यों को भेजे पत्र में लिखा है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम पुलिसकर्मियों, शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों की अधिक से अधिक नियुक्ति की जानी चाहिए। लोकतंत्र में वोटबैंक को लुभाने वाली राजनीति करना नई बात नहीं है, लेकिन सरकार के स्तर पर कोई फैसला करते समय इस बात का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए कि वह प्रशासन के सामान्य सिद्धांतों के बिलकुल खिलाफ तो नहीं है। प्रशासन का सामान्य सिद्धांत कहता है कि कोई भी कर्मचारी केंद्र या राज्य सरकार का प्रतिनिधि होता है, किसी जाति या धर्म का नहीं। हिंदू पुलिसकर्मी, मुस्लिम शिक्षक या सिख स्वास्थ्यकर्मी जैसी कोई पोस्ट नहीं होती है। केंद्र का यह फैसला राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना के भी प्रतिकूल है।
एक तरफ तो हम कहते हैं कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है, दूसरी ओर ऐसे निर्देश देकर सरकार यह रेखांकित करना चाहती है कि ये इलाके आम इलाकों से अलग हैं और इन्हें अलग ट्रीटमेंट देने की जरूरत है। इन इलाकों को रेखांकित कर देने से अलगाववादी तत्वों को भी आसानी हो सकती है। अगर मुस्लिमों की सुरक्षा और प्रगति की दृष्टि से यह कदम उठाया जा रहा है तो इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इन इलाकों से बाहर रह रहे मुस्लिमों की सुरक्षा और प्रगति का क्या होगा?
इसके साथ ही एक सवाल यह भी है कि अन्य जाति-वर्ग के लोग भी अपनी-अपनी आबादी के हिसाब से अपने इलाकों में सरकारी कर्मचारियों की तैनाती की मांग करने लगेंगे, तब सरकार क्या करेगी? इससे देश के भीतर कई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, लिहाजा केंद्र को इससे जुड़े सभी पहलुओं पर एक बार फिर विचार करना चाहिए।