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अक्षर की खेती, समृद्धि की फसल

अजमेर: शिक्षा के साथ-साथ जीवन में आर्थिक संपन्नता भी आए इसी बात को ध्यान में रखकर सतत शिक्षा केंद्रों पर जिला साक्षरता समिति ने एसएचजी (स्वयं सहायता समूह) गठित कराए और उन्हें ऋण दिलाकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाने का लक्ष्य रखा। इनकी सफलता का आलम यह है, आज करीब एक लाख महिलाएं इन समूहों की सदस्य हैं।

किसान आज भी छोटे-मोटे कर्ज के लिए साहूकारों के जाल में फंसते हैं। इन हालात में स्वयं सहायता समूहों की उपयोगिता समझना बेहद आसान है। साल 2000 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के बारे में जिला साक्षरता प्रकोष्ठ के विशेषाधिकारी अब्दुल शकूर बताते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ शिक्षा को फैलाना नहीं था, बल्कि वे महिलाओं को वोकेशनल ट्रेनिंग देकर स्वावलंबी बनाना चाहते थे।

शुरुआत जरा मुश्किल
जब इस अभियान को लेकर सरकारी कारिंदे एक गांव पहुंचे तो पता चला कि वहां एक बीसी चलती थी, जिसका संचालक हाल ही ग्रामीणों को लूट कर चला गया। ऐसे में उनकी मंशा पर शंका जाहिर करते हुए ग्रामीणों ने पूछा कि सरकारी आदमी हमारी सहायता क्यों करना चाहते हैं। उन्हें स्वयं सहायता समूहों को मिलने वाले ऋणों और दूसरी सुविधाओं के बारे में बताकर किसी तरह उन्हें राजी किया गया। विशेषाधिकारी शकूर बताते हैं कि समूह के बाद पता चला कि कुछ संपन्न परिवारों की महिलाएं भी इसमें शामिल हो रही हैं। उन्हें भी अलग किया गया।

ये होता है समूह में
समूह की महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें उन्हें पशुपालन, खेती, सब्जियों के उत्पादन, सिलाई, वर्मी कंपोस्ट, पत्तल-दोना उत्पादन आदि की जानकारी दी जाती है। इसके बाद खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए सिर्फ एक एप्लीकेशन देने पर लोन भी उपलब्ध कराया जाता है।

आज आठ हजार समूह
अजमेर की तत्कालीन कलेक्टर उषा शर्मा द्वारा शुरू किए जाने के बाद एसएचजी के आंकड़े लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। साल 2002 में 2024 महिला समूह बनाए जा चुके थे वहीं अगले पांच साल पूरे होते होते यह संख्या चार गुना यानी 8003 पर पहुंच गई। फिलहाल इन समूहों से 97700 महिलाएं जुड़ कर आर्थिक स्वावलंबन पा रही हैं।

बैंक ऋण हाथों-हाथ
इन समूहों को बैंक से 47 करोड़ रुपए का ऋण दिलाया जा चुका है। इसके लिए उनमें किसी तरह की हिचक नहीं है, क्योंकि रकम वापसी की संभावना यहां 90 प्रतिशत से ज्यादा है। इसकी वजह है कि महिलाएं लोन लेने से पहले ही व्यावसायिक प्रशिक्षण ले चुकी होती हैं, ऐसे में उन्हें मुनाफा ही होता है।

पायलट प्रोजेक्ट में अजमेर
पिछले पांच सालों से लगातार अजमेर को राजस्थान में एसएचजी की गतिविधियों के लिए नाबार्ड द्वारा सम्मानित किया जा रहा है। नाबार्ड ने देश भर के 10 जिलों को अपने पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना है। यह गर्व का विषय है कि अजमेर भी इन दस जिलों में शामिल है। यहां सफल होने पर नाबार्ड की तैयारी इसे देश भर में लागू करने की है।

महिलाओं की स्थिति सुधरी
जब यह योजना शुरू की गई तो महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबन और शिक्षा देना उद्देश्य बनाया गया। लेकिन जल्द ही महसूस किया गया कि इससे महिला सशक्तीकरण भी हो रहा है। समूह में होने पर महिलाएं सामाजिक परेशानियों पर खुल कर चर्चा करने लगीं और हालात बेहतर हुए। वहीं पुरुषों को एसएचजी की गतिविधियां इसलिए अनुकूल लगीं क्योंकि उन्हें व्यापार के लिए अपनी पत्नियों के जरिए आसानी से पैसा उपलब्ध होने लगा।





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