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ये 'शोले' है, हाथ लगाओगे तो..

आपस की बातइस बार सचमुच बड़ी मुश्किल में हूं । आप सबकी मुहब्बत ने मुझे कुछ-कुछ बिगाड़ सा दिया है। नतीजे में कुछ Êयादा ही बतोला हो गया हूं। जी चाहता है बस बैठा रहूं और 'बक-बक बसंती' की तरह बोलता चला जाऊं। सो बहुत सारा व़क्त तो ़खुद को बहुत बोलने से रोकने में ही चला जाता है। ़गनीमत है कि मुझे ये मौ़का ह़फ्ते में एक बार मिलता है।

़खैर, बसंती का ़िजक्र आया है तो मतलब ऐसे ही थोड़ी आया है। अजी हुÊाूर, अभी थोड़े दिन पहले ही तो अपने 'रामू भैया' ने जीपी सिप्पी/ रमेश सिप्पी की 1975 में रिली़ज हुई महान फिल्म की 'पैरोडी'-'रामगोपाल वर्मा की आग' के नाम से रिली़ज की और अपने हाथ जलाए हैं। सो 'शोले' का ़िजक्र हो तो बिना बसंती कैसे हो सकता है। सो उसी के अंदा़ज में दोहराऊं? 'अब बसंती को बेफिजूल की बात करने की आदत तो है नहीं', सो सीधे मुद्दे पर ही आ जाते हैं।

बात यूं है कि रामू की फिल्म का हश्र देखकर मुझे एक बहुत पुराना ़िकस्सा याद आ गया। आप भी सुन लें। एक ़जमाना पहले हमारे देश के महान फिल्मकार वी. शांताराम ने प्रभात फिल्म्स के बेनर तले एक फिल्म बनाई थी 'धर्मात्मा' (1935)। इस फिल्म में उन्होंने एक नए कलाकार चंद्रमोहन को हीरो की भूमिका निभाने का अवसर दिया। अगले वर्ष इस टीम की एक और फिल्म आई 'अमर ज्योति', इस फिल्म के बाद चंद्रमोहन को सितारा हीरो का दर्जा प्राप्त हो गया। बा़जार में उन्हें उनकी मुंह मांगी फीस मिलने लगी। कुछ समय बाद शांताराम जी ने चंद्रमोहन को फिर से बुला भेजा। वे उसे अपनी अगली फिल्म के लिए नायक की भूमिका में लेना चाहते थे।बातचीत शुरू होते ही चंद्रमोहन ने आदर से कह दिया के वे सहर्ष भूमिका करने को तैयार हैं। शांताराम जी ने भी ़फौरन कांट्रैक्ट बनवा कर दस्त़खत करने को कहा। चंद्रमोहन ने देखा कि उसकी फीस वही रखी गई है जो उन्हें नए कलाकार के तौर पर दी गई थी और बहुत मामूली सी ऱकम थी। उसने झिझकते हुए कहा कि बा़जार में आजकल उनकी फीस बहुत ज़्यादा है। अगर उतनी नहीं तो कम से कम पहले से कुछ ज़्यादा फीस तो उन्हें Êारूर मिलनी चाहिए।

शांताराम जी इस बात से का़फी नारा़ज हुए। उन्होंने कहा कि किसी भी कलाकार के लिए उनकी फिल्म में काम कर लेना ही बड़ी इज़़्जत की बात है। सो वे पैसे तो उतने ही देंगे। चंद्रमोहन ने बड़ी विनम्रता से इंकार कर दिया। शांताराम जी ने क्रोध में चंद्रमोहन को चुनौती भरे अंदा़ज में कहा: 'अगर मैं एक चंद्रमोहन पैदा कर सकता हूं तो दूसरा भी कर सकता हूं। अब तुम देखते जाओ'।

अब तक चंद्रमोहन का़फी विनम्रता और सम्मान से पेश आ रहे थे। इस बात से वे भी उत्तेजित हो गए। वे खड़े होकर कहने लगे: 'मा़फ कीजिए, ऐसी कोशिश मेरे बाप ने भी की थी कि वे दूसरा चंद्रमोहन पैदा कर लें। उनकी कोशिश के नतीजे में बृजमोहन तो पैदा हो गया मगर चंद्रमोहन तो वो भी पैदा नहीं कर पाए। एक कोशिश आप भी कर के देख लें'।

अब पूरी तरह ठीक से तो याद नहीं है लेकिन शायद उस फिल्म में चंद्रमोहन की जगह शाहू मोडक को हीरो लिया था। जो बाद में धार्मिक-पौराणिक फिल्मों तक ही सिमट कर रह गए। चंद्रमोहन को याद करना चाहें तो उस दौर की अनेक सफल फिल्मों के अलावा फिल्म 'अनारकली' में उन्होंने अकबर और 'हम हिंदुस्तानी' में सुनील दत्त और जॉय मुखर्जी के पिता की भूमिका भी की थी।

अब बात करें रामू की। भाई को सिप्पी ़खानदान ने फिल्म बनाने से रोकने की कितनी कोशिश की मगर वो तो इसी बात पे अड़ा हुआ था कि वो फिल्म बनाएगा ही सही। अब उसे ये कौन समझाए कि सिप्पी परिवार ने भी दूसरी शोले बनाने की कोशिश की थी। मगर वो निकली 'शान'। 1980 में उतने ही बड़े सितारों और लागत से बनी यह फिल्म बुरी तरह फ्लाप हुई। यानी डब्बा गुल।

इसका मतलब तो यही हुआ कि 'सलीम! शाहकार बनाए नहीं जाते। बन जाते हैं'। अब देखिए न, यही संवाद अगर आपने पृथ्वीराज कपूर की आवा़ज में फिल्म 'मु़गल-ए-आ़जम' में सुना होता तो कितनी तालियां बजाते ।

न जाने कितने शोले?sholay_posterअब इस नई फिल्म में बात करने लाय़क तो कुछ है नहीं, मगर फिल्म 'शोले' की कहें तो इसमें न जाने कितने शोले हैं। इस फिल्म के बनने को लेकर एक किताब लिखी जा चुकी है। मेरा दावा है कि अब भी इस पर दस और किताबें लिखी जा सकती हैं।

यूं तो इस फिल्म में अनेक दृश्य ढेर सारी विदेशी फिल्मों से उठाए गए हैं, मगर जापान के महान फिल्मकार अकीरा कुरोसावा की 'सेवन समुराई' से ही इसकी मूल कथा ली गई थी। एक्शन दृश्यों में हालीवुड में जा बसे इटालियन फिल्मकार सर्जिओ लियोनी की फिल्मों से का़फी माल उठाया गया।

15 अगस्त, 1975 को जब यह फिल्म रिली़ज हुई तो इसकी पब्लिसिटी में बा़की बातों के अलावा '70 एमएम' और '6 ट्रेक स्टीरियोफोनिक साउंड' को बहुत प्रचारित किया गया था। बंबई में प्रमुख रूप से यह फिल्म मिनर्वा सिनेमा में रिली़ज हुई थी। जहां यह लगातार 5 साल तक चलती रही। म़जे की बात तो यह है कि मीडिया ने इस फिल्म को शुरूआत में असफल घोषित कर दिया था।

हालांकि ़खराब रिपोर्ट के बावजूद इसके सारे शो़ज फुल चल रहे थे। मगर इतनी ़खराब रिपोर्ट से घबराए सिप्पी़ज ने रिली़ज के चौथे दिन फिल्म के सारे सहयोगियों के साथ आधी रात में दुबारा से फिल्म देखी। घबराहट में कुछ हिस्से एडिट भी कर दिए। मगर फिल्म जो चली तो ऐसी चली कि बाद में निकाले हुए हिस्से फिर से जोड़कर लोगों को फिर से वापस सिनेमाघर में बुला लिया।

इस फिल्म के कुछ संवाद भी बदले और अंत भी दो शूट किए गए। सेंसर बोर्ड ने मूल रूप से चित्रित अंतिम दृश्य, जिसमें संजीव कुमार के हाथों अमजद मारा जाता है, हिंसक कहकर बदला था। अब नए डीवीडी में यह अंत मौजूद है। इसमें एक ़कव्वाली भी थी, जो लंबाई की वजह से काट दी गई थी।

फिल्म तो सुपर हिट हो गई, मगर आपको यह जानकर हैरत होगी कि इस फिल्म को उस साल कुल मिलाकर 1, जी हां, एक फिल्मफेयर अवार्ड मिला था। फिल्म के एडीटर एमएस शिंदे को। जबकि इसी साल रिली़ज हुई फिल्म 'दीवार' को पूरे 7 अवार्ड मिले थे। शुरू में अमजद ़खान की आवा़ज को लेकर बड़ी आलोचना हुई, लेकिन वही आवा़ज फिल्म का सबसे बड़ा ड्रा साबित हुआ। उसके संवादों की ऐसी धूम मची कि रमेश सिप्पी ने अपने साले (शायद उनका नाम रमेश पटेल था) की रिकॉर्ड कंपनी 'पोलीडोर' के Êारिए फिल्म के डायलाग्स के दो एलपी रिकॉर्ड जारी कर दिए।

यह रिकॉर्ड फिल्म के संगीत से भी ज़्यादा बिके और हिंदुस्तान के हर गली-कूचे में बजते रहे। छोटी-छोटी होटलों की बिक्री इन रिकॉर्डो की वजह से बढ़ गई। कई मर्तबा तो ऐसी भीड़ हो जाती कि ट्रेफिक की समस्या खड़ी हो जाती। इस सफलता के बाद कई सारी नई पुरानी फिल्मों के संवाद के रिकार्ड निकले जिनमें 'मुगल-ए-आ़जम' भी शामिल है, मगर 'शोले' का जादू फिर न जगा।

एक दिलचस्प बात और। 1953 में 'शोले' नाम से एक फिल्म बीआर चोपड़ा के निर्देशन में भी बनी थी। फिल्म के निर्माता हुदा बिहारी और कलाकार थे अशोक कुमार और बीना राय। संगीत दिया था धनीराम और नरेश भट््टाचार्य ने। यह फिल्म बाक्स-आफिस पर असफल सिद्ध हुई थी। इस फिल्म के बांबे सर्किट के वितरक थे जीपी सिप्पी जिन्होंने 22 साल बाद इस असफलता को सफलता में बदला। हालांकि दोनों फिल्म की कहानी अलग-अलग थी। अब कहने को तो ढेर सारी बातें हैं, मगर यहीं रुकता हूं।

और..और कुछ तो इस बार है ही नहीं। सो फिर 'शोले', बा़की सब लोगों की तरह मैंने भी यह बहुत बार देखी है। सच कहूं तो सौ बार देखी होगी। पहले दिन। दूसरे दिन। आ़िखरी दिन। सुविधा यह थी कि सिनेमा का मैनेजर बहुत ़करीबी दोस्त था। सो मामला फोकट का था। कभी एक टुकड़ा, कभी दो और कभी पूरी की पूरी। इस दौरान फिल्म के संवादों से मैच करते हुए इतने 'भोपाली' संवाद पब्लिक से सुने हैं कि याद करते ही पेट दुखने लगता है।

नमूने के तौर पर ़जरा यह मुलाहि़जा ़फरमाइए। फिल्म में एक दृश्य है जहां वीरू (धर्मेद्र) गब्बर की ़कैद में है। उसके हाथ ऊपर की और ़जंजीरों में बंधे हैं और उसकी प्रेमिका बसंती से गब्बर कहता है: '़जरा, हमको भी दिखाइ दियो दो-चार ठुमके'। इस पर आक्रोशित धर्मेद्र ची़खता है :'बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना'। सबसे आगे की क्लास में बैठे एक वीर दर्शक ने खड़े होकर चिल्लाया: 'अबे, नाचेगी कैसे नहीं। पूरे एक साठ दिए हैं'(उस समय आगे वाली क्लास का टिकट एक रुपए साठ पैसे था)। दूसरे ने ़िफ़करा कसा: 'ये साला तो कल भी रोक रिया था'। इसी बीच नाच शुरू और तालियां। सीटियां भी।

एकदम आ़िखरी बात और। इस फिल्म के कुछ समय बाद दारा सिंह की एक फिल्म 'ठाकुर जरनैल सिंह' दुबारा रिली़ज हुई । इस फिल्म में अमजद ़खान के पिता जयंत भी थे। सो फिल्म के रिली़ज से पहले अ़खबारों में एक विज्ञापन छपा। आ रहा है ..गब्बर सिंह का बाप..(छोटे से अक्षरों में लिखा था) जयंत..फिल्म 'ठाकुर जनरैल सिंह '। रिली़ज पर इस फिल्म में भी का़फी भीड़ थी।

अब मैं चलता हूं। शब्दों की का़फी भीड़ कर चुका हूं यहां। अब अगले छह दिन चुप रहूंगा और सातवें दिन..फिर 'आपस की बात'।नमस्कार!





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