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लूसिआनो पावरोती: ओपेरा का अंतिम आलाप

स्मृति शेष: मैं ओपेरा नहीं जानता, यही समझ पाता हूं कि वे स्वरलहरियों में गाए गए कुछ शास्त्रीय लेटिन संगीत नाटक हैं। ये मेरी कभी समझ में नहीं आया कि वे क्या कहना चाह रहे हैं। ओपेरा में मनुष्य होने के मूल भाव जैसे प्यार, विछोह, ट्रेजेडी और मौत जैसी बातें समझी जाएं या न जाएं, महसूस तो की ही जा सकती हैं। ये कितना दिलचस्प है कि बहुत ही बुनियादी कहानियों के बाद भी ओपेरा हमें अहसास के एक नए तलघर तक ले जाता है कई नई सतहों को फोड़ता, खोदता हुआ।

अगर रेडियो के बाद टीवी न आया होता तो मैं कभी न जान पाता कि लूसिआनो पावरोती कौन है। आप पहले उस पेटू को देखते हैं, जो एक खिलंदड़ ऐंद्रिकता लेकर आपके सामने प्रकट होता है, हंसती हुई आंखों और गोब्दू सा सूजा चेहरा लिए। लगता है वह सबकी खिल्ली उड़ाएगा।

वह किसी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में हार्डी के जोड़ीदार लॉरेल की जगह ले सकता था। उसका अंदाज बिलकुल ऐसा है जैसे भीड़ भरी बस में एक बड़े से आदमी का होता है, जो धक्का भी देता रहेगा और हंसता भी रहेगा। फिर वह धीरे से गाना शुरू करेगा। और जल्द ही उसकी आवाज नए और गहरे आकाश में उड़ान भरने लगेगी। उसकी आवाज आपके सुनने की क्षमता को नए आयाम देगी। उसकी आवाज आपके दुख को नए अर्थ देगी। उसकी आवाज आपको एक ऐसे मौन में टांग कर छोड़ आएगी, जहां से निकलने का आपके पास रास्ता शायद न हो। वह एक तिलिस्मी लोक में आपको ले जाएगा। वह यकायक बहुत संजीदा, गहराई में डूबा हुआ, गहरे-मुश्किल, पेचीदा जज्बात को जीता हुआ दिखाई देगा।

आप महसूस कर सकेंगे कि ऐसा करना उसके लिए आसान नहीं है, हालांकि सब कुछ सधा हुआ है। पर ऐसा न करना तो उसके लिए सजा होगी। वह धीरे-धीरे आपको संगीत के जादुई आलोक में ले जाएगा। उसके पास जो ऊंचाइयां हैं किसी के पास नहीं। युद्ध और प्यार के ऐसे किस्से जिन पर आपको न यकीन है, न जिनके लिए टाइम, यकायक रहस्यों की तरह आपके जहन में खुलने लगेंगे। ऐसे मायनों की तरह जिनका शायद आपको अंदाजा ही नहीं था कि वे खुलने के लिए किसी सुर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

लूसिआनो पावरोती के पास वे जादुई सुर थे। इस सबके बीच खाना, तानकर सोना, बेतरतीब रहना, कैंसर, फुटबाल और मौज-मस्ती थी। जो उसके नहीं गाने की वजह कभी-कभी बनती थीं, पर उसके गाने के बीच से हमेशा गैरहाजिर। पावरोती का आलाप किसी खास भाषा, किसी खास शब्द की बपौती नहीं था।

वह शायद उस आदिवासी समुदाय को भी समझ में आ सकती थी, जिसकी भाषा का पूरा विकास अभी नहीं हुआ है। आप सिर्फ तब मुस्करा सकते थे, जब वह गाना शुरू करता था, पर उसके बाद आप उसकी कैद में थे। इस सबके दौरान आप भूल जाएंगे उस मखौल उड़ाते मोटे मुसटंडे को, जिसके भीतर से लूसिआनो पावरोती की आत्मा गाती थी।

उसकी आंखों में, गले की खिंची हुई नसों में, कसी हुई मुट्ठी में, उसके पेट से तनी हुई स्वरलहरियों में इस वक्त वह रस्सी पर चल रहा बाजीगर होगा, एकाग्रता में डूबा हुआ और एक मेंढक में बदल गए राजकुमार की ट्रेजेडी बयान करता हुआ। पावरोती का जादू ये था कि वह सामान्य सी परीकथाओं को एक ऐसे अनुभव में बदल देता था, जो आपको झकझोर कर छोड़ देते थे। उसका संगीत आपको ऐसे मौन में छोड़ता था, जिसे तोड़ना आसान नहीं था। और तालियां उसकी भरपाई कभी नहीं कर सकती थीं।

उसके 71 साल जीकर चले जाने के बाद भी मुझे न तो ओपेरा समझ में आने लगेगा और न ही उसके महीन नुक्ते। पर अगर किसी देर रात लूसिआनो पावरोती किसी चैनल पर गाता दिखाई देगा, तो मैं रिमोट पर चैनल सर्फ करना बंद कर उसे अपनी बात पूरी कहने का इंतजार करूंगा। एक और शाम उसके स्वरों के जरिए उसके दिल से निकल बहती जिंदादिली और मनुष्यता अपने दिल में ढाल लूंगा।





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