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मत देखना चांद चतुर्थी को

गणेश चतुर्थी को चांद देखने से अपशकुन होता है। इसके पीछे कई तरह की कथाएं हैं। एक कहानी ऐसी भी है जिसे जानने के बाद पता चलता है कि गणेश के अभिशाप में कितनी शक्ति थी और कृष्ण भी गणोशजी को पूजते थे..

द्वारका के सत्रजीत के पास श्यामंत नामक एक चमकीला अद्भुत रत्न था। जब इसकी पूजा मन से की जाती थी तो यह प्रत्येक दिन सोना दिया करता था। एक दिन सत्रजीत का भाई प्रसेन उसे पहनकर शिकार ख्ेालने गया। वहां एक शेर ने उसे मार डाला और घसीटकर एक गुफा में ले गया। तभी जामवंत नामक भालू ने उस शेर को मार डाला और रत्न को ले जाकर अपने बच्चों को खेलने के लिए दे दिया। यह वही जामवंत था जो श्रीराम के कट्टर समर्थकों में से एक रहा।

इस बीच सत्रजीत को शक हो गया कि श्रीकृष्ण ने ही रत्न के लोभ में उसके भाई को मारा है। अफवाह फैलते देर नहीं लगी। श्रीकृष्ण ने कुछ भी गलत नहीं किया था, इसलिए वे प्रसेन को खोजने निकले। शीघ्र ही उन्होंने प्रसेन लाश को बरामद कर लिया। वहीं उन्हंे शेर के पंजों के निशान मिले। निशानों का पीछा करते कृष्ण जामवंत की गुफा तक पहुंचे। वहां जामवंत से उनकी लड़ाई २८ दिनों तक चली। जब जामवंत को पता चला कि कृष्ण ही भगवान राम हैं तो उन्होंने श्यामंत वापस कर दिया।

कृष्णा ने श्यामंतक रत्न को सत्रजीत को लौटाकर सारे अफवाहों पर विराम लगाया। उन्हं घोर आश्चर्य हुआ कि बिना कुछ किए वे कैसे इस मकड़जाल में फंस पड़े। पुराने ग्रंथों में बताया गया है कि यह गणोशजी के अभिशाप का नतीजा था क्योंेकि गणोश चतुर्थी के दिन कृष्ण ने चांद देख लिया था। तब कृष्ण ने गणेशजी की वंदना और क्षमायाचना की। तब से कहा जाता है कि जो कोई भी श्यामंतक की कहानी गणोश चतुर्थी के दिन सुनता है उस पर चांद देखने का बुरा असर नहीं होता है।





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