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काश! हर मुक्तिधाम ऐसा ही होता

पोरसा (मुरैना): रात में कोई मरघट का नाम भर ले दे बहुतों के शरीर में उसकी कल्पना मात्र से ही झुरझुरी आ जाती है। लेकिन पोरसा के श्मशान के बारे में ऐसा नहीं है। कारण है कि इस कस्बेका मुक्तिधाम हरे-भरे पेड़-पौधों और सुगंधित फूलों से आच्छांदित हैं।

पोरसा के बस स्टैंड से जौटई गांव को जो सड़क जाती है, उस पर ठीक एक किलोमीटर की दूरी पर ये श्मशान बना है। दो बड़े गेट इस मुक्तिधाम की विशालता को दर्शा देते हैं। एक मुख्य द्वार है जिससे हर किसी को प्रवेश है, दूसरा द्वार सत्यम गेट कहलाता है, जो तभी खुलता है जब कोई अर्थी अंत्येष्टि को आती है।

दोनों द्वारों के आजू बाजू में डिडोनिया, मेंहदी समेत कई पेड़-पौधों की कतार लोगों का स्वागत करती नजर आती है। मुख्य द्वार के बाद पहले गोलंबर पर बने चार द्वारों का नाम वेदों पर रखा गया है। इन द्वारों से ही बगीचों का रास्ता है। बगीचे की हरी घास के आसपास फूलों वाले पौधों, विशेषकर गुलाबों की भरमार है। इस क्षेत्र को सुंदरम नाम दिया गया है।

कैसे बना इतना सुंदर मुक्तिधाम
पहले किसानों ने मुक्तिधाम की सरकारी जमीन को घेर रखा था। फिर पोरसा में नगर रक्षा समिति के बैनर पर 23 सितंबर 1992 को एक मीटिंग राधाकृष्ण धर्मशाला में हुई, उसमें लोगों की सहमति बनी। फिर पोरसा के डा.अनिल गुप्ता ने इस काम को पूरा करने का चिंतन शुरू किया।

छह जनवरी 1995 को एक लावारिस लाश का अंतिम संस्कार करने के बाद इस श्मशान को एक अनूठा मुक्तिधाम बनाने पर काम शुरू हो गया। डा.गुप्ता को प्रशासनिक सहयोग मिला और लायंस क्लब की ओर से फिर इसका निर्माण कराया गया, जिसमें पोरसा के लोगों ने भी योगदान दिया। अब डा.गुप्ता ही इसे संचालित करते हैं।

योग-व्यायाम होता है मुक्तिधाम में
ऐसा मुक्तिधाम हो, जिसमें चारो ओर हरियाली हो, फूलदार पौधे हों तो क्या कहने। पोरसा के ऐसे श्मशान के बाहर की दीवारों पर ही व्यायाम की मुद्रा वाले चित्र पेंटिंग किए नजर आते हैं। मुक्तिधाम के संचालक डा.गुप्ता बताते हैं कि रोज सुबह यहां योग और व्यायाम कराया जाता है, जिसमें कई लोग आते हैं। शाम से रात तक यहां चिंतन मनन के लिए आते हैं। सत्संग भी होता है इस मुक्तिधाम में।

एक-एक चीज का उपयोग
ऐसा नहीं है कि लोग अपने परिजन की अंत्येष्टि के बाद जब सुबह फूल (अस्थियां) बीन ले जाते हैं तो उसके बाद की राख को कहीं फेंका जाए। आम तौर पर मरघटों में बाकी भस्मि पड़ी उड़ती रहती है, लेकिन यहां ये भस्मि पौधों की जड़ों में डाली जाती है, जिससे उनकी बढ़वार होती है। इसके अलावा जो बांसों का विमान बचता है, उसके बांसों से मुक्तिधाम में टटिया आदि बनाई जाती है, झाड़ू भी उन्हीं बांसों से बनती है।

शिव का प्रशासन होता है श्मशान में : मिश्र
देवीशक्ति विभूषित पं.रामदत्त मिश्र आचार्य थरा वाले कहते हैं कि श्मशान में भगवान शिव का प्रशासन होता है। पोरसा का जो मुक्तिधाम है उसकी तो शोभा ही अलग है। ऐसा श्मशान यहां के अलावा तो कहीं देखा नहीं जिसमें कि सत्यम शिवम सुंदरम नाम के तीन क्षेत्र हों, और तीनों ही इतने व्यवस्थित हों। असली बात ये है कि हर श्मशान में भगवान शंकर का फेरा लगता है, तो शिवजी यहां पोरसा के इस मुक्तिधाम को देखकर कितने खुश होते होंगे। कि धन्य हैं तंवरघार के लोग जो मरघट को भी चमन बनाए हुए हैं।





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