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युद्ध के मैदान पर ट्रेनिंग कैंप

रायपुर: naxal बस्तर में पिछले दो माह में फोर्स तथा गांवों पर हुए हमलों में बड़ी संख्या में नक्सली शामिल हुए। देश की आला इंटेलिजेंस एजेंसियों के पास पक्की सूचना है कि इन हमलों में ऐसे नक्सली बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं, जो खासतौर से ट्रेनिंग के लिए बस्तर भेजे गए। बड़े हमलों में अब तक नक्सली अपने साथ बड़ी संख्या में ग्रामीणों और संघम सदस्यों को सामने रखते थे। धीरे-धीरे ग्रामीणों को हटाकर उनकी जगह प्रशिक्षु नक्सलियों को लगाया जा रहा है, जो बेरहमी से फोर्स तथा लोगों का कत्ल कर रहे हैं।

बस्तर में नक्सलियों के डेढ़ दर्जन दलम सक्रिय हैं। इन दलमों में नक्सलियों की संख्या 50 से ज्यादा नहीं है। खुफिया सूत्रों के अनुसार नक्सली दलम तथा मिल्रिटी कमीशन को मिलाकर इनकी गिनती 600 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह नफरी 3000 तक पहुंच गई। नक्सलियों ने यह संख्या लोकल युवक-युवतियों से नहीं बढ़ाई है।

कुछ माह पहले शीर्षस्थ खुफिया संस्थाओं को सूचना मिली थी कि बस्तर में लड़ाई तेज करने के लिए कई राज्यों से नक्सली घुसे हैं। अब पिन पाइंटेड सूचनाएं मिल रही हैं कि नक्सलियों ने पूरे देश में बस्तर को एकमात्र युद्ध भूमि माना है। इसीलिए यहां ट्रेनिंग के लिए ज्यादा से ज्यादा युवक भेजे जा रहे हैं। युद्ध भूमि में वे बेहतर सीख सकते हैं। नक्सलियों का बस्तर में जोरदार युद्ध का उद्देश्य भी ऐसा करके पूरा हो जाएगा।

कई शिविर ध्वस्त
नक्सली बस्तर के जंगलों में ट्रेनिंग कैंप बड़े पैमाने पर चला रहे हैं। दो महीने में पुलिस ने बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों में करीब डेढ़ दर्जन छोटे ट्रेनिंग कैंपों को निशाना बनाया। अरपलमेटा में नक्सलियों ने हमला तब किया था, जब फोर्स एक ट्रेनिंग कैंप ध्वस्त कर लौट रही थी। बस्तर आईजी आरके विज ने माना कि बीजापुर और दंतेवाड़ा के कई इलाकों में फोर्स ने ट्रेनिंग कैंपों पर धावा बोलकर हथियार वगैरह जब्त किए हैं।

बालाघाट से भी
पुलिस ने कुछ दिन पहले नक्सलियों का एक संदेश पकड़ा है। इससे खुलासा हुआ कि अन्य राज्यों के सीमावर्ती जिलों में भी नक्सलियों गुपचुप तरीके से भर्ती अभियान छेड़ रखा है। सूचना मिली थी कि मध्यप्रदेश के नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट से जंगलों के रास्ते नक्सली बस्तर पहुंच गए हैं।

पुलिस मुख्यालय के अफसरों ने इस मामले में तीन दिन पहले बालाघाट पुलिस से संपर्क किया था। वहां से पुष्टि हुई कि बालाघाट में नक्सल मूवमेंट ठंडा है। वहां के नक्सली छत्तीसगढ़ में दाखिल हो चुके हैं। गौरतलब है, बालाघाट की सीमाएं राजनांदगांव जिले से लगी हैं।

रोकने की रणनीति
डीजीपी विश्व रंजन को छत्तीसगढ़ में कई राज्यों से नक्सलियों के घुसने की सूचना तब मिली थी, जब वे इंटेलिजेंस ब्यूरो, दिल्ली में एडिशनल डायरेक्टर थे। छत्तीसगढ़ में डीजीपी बनने के बाद आईबी को मिली बेहद महत्वपूर्ण जानकारियों का यहां विश्लेषण शुरू हुआ है।

पुलिस यह रणनीति बनाने में जुट गई है कि घुसपैठ किस तरह रोकी जाए। डीजीपी पहले भी कह चुके हैं कि पुलिस अब आक्रमण की रणनीति पर काम कर रही है। जंगलों में घुसने से नक्सली बौखला गए हैं। नक्सली छिपे हैं, इसलिए शुरुआती नुकसान के बाद आंध्रप्रदेश की तरह पुलिस कामयाब होने लगेगी।

एसटीएफ तैयार
छत्तीसगढ़ नक्सलियों से लड़ाई के लिए सेना की मदद नहीं लेना चाहता। आला अफसरों का मानना है कि सीआरपीएफ और सीएएफ के साथ गोरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षित लड़ाकों की फौज इसके लिए पर्याप्त है। छत्तीसगढ़ का एसटीएफ 1000 लड़ाकों के साथ कुछ दिन में शेप ले लेगा। एसटीएफ की तैनाती में यहां थोड़ी देर हुई।

पहला प्रपोजल 1997 में बना था। वर्ष 2004-05 में बस्तर के तत्कालीन आईजी गिरिधारी नायक ने एसटीएफ की तत्काल जरुरत बताई थी। ताजा स्थिति ये है कि एसटीएफ के 500 लड़ाके तैयार हैं। दो-तीन माह में इनकी संख्या 1000 हो जाएगी। इनकी जंगल वाली वर्दी पहनेंगे। एसटीएफ को अलग नाम दिया जाएगा।





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