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सफलता में छिपी संघर्ष गाथा

मुंबई. आशा भोंसले आज देश की भले ही सबसे बेहतरीन पाश्र्व गायिकाओं में से एक हों लेकिन उनकी जादुई आवाज की सफलता के पीछे अस्तित्व के लिए संघर्ष और गरीबी से बाहर निकलने की उत्कट अभिलाषा की कहानी छिपी हुई है। हाल में ही 74 साल की हुईं आशा ताई ने अपने सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम में श्रोताओं को अपने शुरूआती दिनों के संघर्ष के बारे में बताया।

उन्होंने बताया कि मेरे पति को पगार के तौर पर सिर्फ 100 रुपए मिलते थे। हम बोरीवली के उपनगरीय इलाके में एक कमरे के छोटे से मकान में रहते थे। सिर्फ मैं जानती हूं कि उन दिनों हमने कैसे संघर्ष किया। उन्होंने कहा मैं भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में अपने छोटे बच्चे को लिए एक रिहर्सल से दूसरे रिहर्सल, एक रिकार्डिंग से दूसरी रिकार्डिंग के लिए समूचे मुंबई की यात्रा करती थी, लेकिन उसमें गरीबी से बाहर निकलने और अपने बच्चे को बेहतर परवरिश देने की छटपटाहट छिपी हुई थी। अपने भावुक भाषण में मखमली आवाज की धनी आशा भोंसले ने कहा कि अनेक आलोचकों ने कैबरे गीत गाने और गंभीर काम नहीं करने के लिए उनकी आलोचना की।

उन्होंने कहा मैंने कभी नहीं सोचा कि किस तरह का गीत मैं गाना चाहती हूं, जो कुछ भी मेरे पास आया उसे मैंने गाया क्योंकि मेरे लिए मेरे बच्चे की शिक्षा और उसका भविष्य ज्यादा महत्वपूर्ण था। इस दौरान उन्होंने गणपतराव भोंसले से असफल विवाह का भी उल्लेख किया। गणपतराव के साथ उन्होंने 16 साल गुजारे। उन्होंने कहा मेरा मानना था कि प्यार और ताजा हवा के बल पर जिया जा सकता है लेकिन यह सिर्फ फिल्मों में संभव है। असली जिंदगी में जब गरीबी की मार पड़ती है तो इसका सामना करना बड़ा कठिन होता है। लेकिन मैंने सभी मुश्किलों में हंसना सीखा है।





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