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लठैतों के जरिए वसूली और उपभोक्ता के अधिकार

आलेख: काफी समय से हम बैंकों और वित्तीय कंपनियों द्वारा दिए गए ऋण या बकाया किस्तें वसूलने के लिए ग्राहकों को धमकाने और जबरन वसूली के लिए गुंडों या लठैतों का सहारा लेने की खबरें सुनते आ रहे हैं। इस वर्ष फरवरी में बेंगलूर निवासी रेनुकप्पा को ‘रिकवरी एजेंट्स’ द्वारा की गई निर्मम पिटाई के बाद अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

जून में, हैदराबाद के यादैया को रिकवरी एजेंट इसलिए उठाकर ले गए क्योंकि वह एक बैंक का १५000 रुपए का ऋण नहीं चुका पाया था। उसकी बीवी उसे छुड़ाने के लिए पैसों का इंतजाम कर पाती, इससे पहले ही उसे एक हॉस्पिटल से सूचना मिली कि उसका पति मर चुका है। भविष्य में अब किसी संस्थान ने जबरन वसूली का रास्ता अपनाया, तो उसे परिणाम भुगतने होंगे।

ऐसी जोर-जबरदस्ती का कड़ा संज्ञान लेते हुए शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने यह साफ कर दिया है कि कोई भी वित्तीय संस्थान, जो बिना किसी पूर्व नोटिस के जबरन सामान उठा लेता है, उसे ग्राहक को इसका हर्जाना देना होगा। बिना पूर्व नोटिस जबरन वसूली के मामलों में कंपनियां ग्राहकों से बकाया राशि पाने का अधिकार खो बैठेंगी। उन्हें ग्राहकों को वसूल किए गए सामान के बाजार मूल्य के साथ इस दौरान हुई शर्मिदगी तथा मानसिक वेदना का हर्जाना भी देना पड़ सकता है।

शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने दिल्ली में रहने वाली एस. विजयलक्ष्मी द्वारा सिटीकॉर्प मारुति फायनेंस के खिलाफ दायर याचिका के तहत उन बैंकों व वित्तीय कंपनियों को कड़ी फटकार लगाई, जो वसूली के लिए अवैध तरीके अपनाते हैं। विजयलक्ष्मी ने १,८२,३९६ रुपए का ऋण लेकर एक मारुति ओम्नी खरीदी। जिसके लिए ४,६0४ रुपए की साठ मासिक किस्तों में कुल २,७१,६३६ रुपए चुकाने थे।

मई २000 से जनवरी २00३ तक उन्होंने लगातार किस्तें चुकाईं, लेकिन जनवरी २00३ में पति का एक्सीडेंट हो जाने की वजह से वे आगे की कुछ किस्तें नहीं चुका सकीं। इसके बाद उन्होंने बैंक के अधिकारियों से एकमुश्त कोई रकम तय करने की बात की और बैंक ६0,000 रुपए पर राजी हो गया।

हालांकि रकम चुकाने के लिए दी गई मियाद से पहले ही दो व्यक्तियों ने विजयलक्ष्मी के निवास पर आकर उनकी वैन को कब्जे में ले लिया। इसके बाद विजयलक्ष्मी और उनके पति से कहा गया कि वे उनके साथ बैंक तक आएं। रास्ते में उन्होंने वैन रोककर विजयलक्ष्मी को उतार दिया और यह कहते हुए पति को साथ ले गए कि पैसा मिलने के बाद वे उन्हें छोड़ देंगे।

६ जून को विजयलक्ष्मी को सूचित किया गया कि वैन ७0,000 रुपए में बिक चुकी है और उन्हें बकाया ५१,000 रुपयों का भुगतान करना होगा। इसके बाद विजयलक्ष्मी ने वैन की वापसी या उसकी तत्कालीन अनुमानित बाजार कीमत के रूप में डेढ़ लाख रुपए पाने हेतु जिला उपभोक्ता अदालत ने अपील दायर की।

जिला अदालत ने कंपनी को वैन की कीमत के तौर पर १.५ लाख रुपए और शिकायत दर्ज कराने की तिथि से ९ फीसदी ब्याज देने का आदेश दिया। स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स र्रिडेसल कमीशन ने कंपनी की अपील को खारिज कर दिया वरन उसे ‘सामाजिक विवाद को सड़कों पर आपराधिक ताकतों द्वारा निपटारा करने की कोशिश’ पर जमकर लताड़ भी लगाई। कंपनी पर ५0,000 रुपए का अर्थदंड भी लगाया गया।

वित्तीय कंपनी ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दाखिल करते हुए तर्क दिया कि फायनेंसर को कोर्ट की दखलंदाजी के बिना गिरवी रखे गए सामान को अपने अधिकार में लेने का कानूनी अधिकार है। वसूली के तौर-तरीकों के बचाव में कंपनी का कहना था कि मौजूदा कानूनी ढांचा बदलती वाणिज्यिक प्रक्रियाओं और वित्तीय क्षेत्र में हो रहे सुधारों के साथ नहीं चल सकता, जिससे बकाया ऋणों की वसूली की रफ्तार धीमी है।

इन तर्को को खारिज करते हुए शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने कहा कि अनुबंध भले ही सामान को अपने अधिकार में लेने का हक देता हो, लेकिन यह उसको वसूली के लिए जोर-जबरदस्ती या अवैध तरीके अपनाने की छूट नहीं देता। यदि वसूली की कानूनी प्रक्रिया धीमी है, तो यह विधायिका का काम है कि वह इसे तेज करने के रास्ते तलाशे, लेकिन पैसा उधार देने वालों, फायनेंसरों और बैंकों को कानून अपने हाथ में लेने और सामान की जबरन वसूली की इजाजत नहीं दी जा सकती।

शीर्ष अदालत ने जिला फोरम के निर्णय को बरकरार रखते हुए लागत के तौर पर एक लाख रुपए मंजूर किए लेकिन राज्य अदालत द्वारा लगाए गए अर्थदंड को गैरजरूरी मानते हुए माफ कर दिया। शीर्ष उपभोक्ता अदालत के इस निर्णय की रोशनी में निश्चित ही बैंक और फायनेंस कंपनियों को ठंडे दिमाग से अपने वसूली के तौर-तरीकों पर गौर करना चाहिए। (सिटीकॉर्प मारुति फायनेंस कंपनी बनाम एस विजयलक्ष्मी, पीआर नं. ७३७ ऑफ २00५, निर्णय हुआ २७ जुलाई, २00७)

लेखिका उपभोक्ता मामलों की जानकार हैं।





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