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दागी अफसरों पर सरकार मेहरबान

भोपाल: एक कथित आतंकवादी को मुठभेड़ में मारने वाले गुजरात के आईजी डीजी बंजारा समेत एक दर्जन पुलिसकर्मी भले ही जेल की सलाखों के पीछे हों, लेकिन मध्यप्रदेश में फर्जी मुठभेड़ के शिकार हुए सहायक उपनिरीक्षक दिवारीलाल रावत की संदिग्ध मौत के आरोपी पुलिस वाले अब भी आजाद घूम रहे हैं।

इस मामले की छानबीन करने के लिए गठित एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग ने चंबल रेंज के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक से लेकर समूचे दस्यु विरोधी दल के सदस्यों की भूमिका पर प्रश्न चिह्न् लगाए हैं। इसके उलट राज्य सरकार ने संदिग्ध मौत के कारण तलाशने की बजाय आयोग की रिपोर्ट को उपसमिति के हवाले कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

आरोपी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होना तो दूर वे पदोन्नति पाते जा रहे हैं। श्योपुर जिले में 31 जनवरी 2004 को हुई इस घटना के लिए जनवरी 2006 में सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीएम गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग बनाया गया था।

इसकी रिपोर्ट आने के चार माह बाद सरकार ने उसे मंत्रिमंडल के सामने रखा। फिर उसे मंत्रियों की समिति के हवाले कर दिया,जबकि गृह विभाग रिपोर्ट के अधिकांश बिंदुओं से सहमत था।

>> उपसमिति शीघ्र अपनी रिपोर्ट देगी। इस मामले के किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
-हिम्मत कोठारी, गृहमंत्री

क्या कहती है रिपोर्ट
>> चंबल रेंज के तत्कालीन आईजी वीके पंवार ने डकैत महावीरा जाट के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दस्यु विरोधी दल का गठन कर उसमें रावत को सोची-समझी नीति के तहत शामिल किया। रावत की मृत्यु डकैतों से मुठभेड़ में नहीं हुई थी।

>> श्री पंवार द्वारा मुहिम में असावधानी के लिए 15 दिन पहले श्री रावत को निलंबित करना और फिर बिना किसी जांच-पड़ताल के बहाल कर डाकू विरोधी दल में शामिल करना अविवेक पूर्ण था।

>> तत्कालीन डीआई जी गाजीराम मीणा द्वारा पुलिस महानिदेशक को वर्ष 2004 में 6 एवं 7 फरवरी को दो रिपोर्ट भेजने और इसमें तथ्य अलग-अलग होने का औचित्य क्या है?

तत्कालीन एसपी सीएस मालवीय ने इस मामले की जानकारी आईजी से मिलने के बावजूद तुरंत थाना प्रभारी को इससे अवगत नहीं कराया। वे डीआईजी को भी कथित मुठभेड़ की जानकारी तत्काल न देने के लिए जिम्मेदार हैं। मालवीय घटनास्थल पर मुठभेड़ के निशान न मिलने के बावजूद दल गठित कर उससे फायरिंग कराने सहित कर्तव्य पालन में कोताही बरतने के दोषी हैं।

उस समय के एसडीओपी टीएस नागराज ने डीआईजी द्वारा जांच सौंपने पर भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच रिपोर्ट नहीं दी। तत्कालीन थाना प्रभारी डीएस परिहार ने झूठी रिपोर्ट करने पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। एसपी के आदेश पर कथित मुठभेड़ दिखाई और फायरिंग कराई। वे कर्तव्य पालन में उदासीनता बरतने और शून्य पर कायमी कर एक हफ्ते तक रिपोर्ट राजस्थान के किशनगंज थाने न भेजने के दोषी हैं।

ग्राम रक्षा समिति के अधिकारी का क्षेत्राधिकार संबंधित जिले तक सीमित होता है, लेकिन सबइंस्पेक्टर हरीश शर्मा को दस्यु विरोधी दल में शामिल कर अन्य जिलों में भेजना विशेष उद्देश्य की पूर्ति का परिचायक है। दल के सदस्यों द्वारा मुठभेड़ का घटनास्थल बदलने, सत्यता छिपाने और साक्ष्य परिवर्तित करने के प्रयासों के बावजूद उन पर किसी तरह की वैधानिक एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई न करना श्री पंवार की लापरवाही को इंगित करता है।

हरीश शर्मा गलत घटनास्थल बताने और सत्य घटना छिपाने के लिए जिम्मेदार हैं। दल के अन्य सदस्यों ने भी श्री शर्मा की बात का समर्थन कर आपसी साजिश कर गंभीर कदाचरण किया है, कर्तव्यों के पालन में उदासीनता बरती है। शर्मा ने राजस्थान की सीमा में प्रवेश कर डकैत महावीरा जाट को पकड़ने के लिए मुठभेड़ की सूचना राजस्थान पुलिस को नहीं दी।

प्रशंसा भी
आयोग ने गाजीराम मीणा को इस बात के लिए सराहा है कि वे घटनास्थल पर तत्परता से पहुंचे। उन्होंने ही डॉक्टरों के पैनल से शव परीक्षण कराकर यह तथ्य उजागर कराया कि श्री रावत की संदिग्ध मौत 9एमएम पिस्टल की गोली लगने से हुई है।





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